मध्य प्रदेश में संघ कार्य के आधार स्तंभ - तिजारे जी

१९३७ में तिजारे जी स्वयंसेवक बने ! १९३९ संघ शिक्षा वर्ग समापन के समय डाक्टर साहब ने सबसे पूछा कि संघ कार्य के लिए कौन निकलेगा ? दूसरी कक्ष...


१९३७ में तिजारे जी स्वयंसेवक बने ! १९३९ संघ शिक्षा वर्ग समापन के समय डाक्टर साहब ने सबसे पूछा कि संघ कार्य के लिए कौन निकलेगा ? दूसरी कक्षा तक पढ़े तिजारे जी ने कहा कि मैं निकलूँगा किन्तु मुझे उज्जैन भेजें ! डाक्टर साहब ने पूछा उज्जैन ही क्यों ? तिजार जी ने कहा कि बहां विक्रमादित्य का बह टीला है जिस पर बैठकर अनपढ़ चरवाहा भी न्याय कर सका, फिर मैं तो दूसरी क्लास तक पढ़ा हूँ ! मैं बहीं जाऊंगा !

डाक्टर साहब की अनुमति से उज्जैन पहुंचे ! कोई जान पहचान नही ! मराठी के अतिरिक्त कोई भाषा भी नही आती थी ! अनजान जगह, पर दिल में काम करने का जज्बा ! महाकाल मंदिर में दर्शन किये ! भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया ! पर मुख्य बात शाखा लगना कैसे शुरू हो ? मंदिर के सामने मैदान में कुछ बच्चे फ़ुटबाल खेलते दिखे ! पर समस्या यह कि उनसे बातचीत कैसे शुरू हो ? इन्हें हिन्दी नही आती और खिलाड़ियों को मराठी का ज्ञान नही था ! अचानक फ़ुटबाल इनकी तरफ आई ! इन्होने उसे पकड़ लिया ! सब बच्चे आये और फुटबाल माँगी ! इन्होने कहा नहीं दूंगा, पहले मेरी बात सुनो ! बच्चों ने मारना शुरू कर दिया ! बच्चों की मार से तिजारे जी के वलिष्ठ शरीर पर क्या असर होता ? 

चुपचाप पिटते रहे और कहते रहे कि भले मार लो, पर फुटबाल तभी मिलेगी, जब मेरी बात सुन लोगे ! थक कर बच्चों ने कहा, कहो क्या कहना चाहते हो ! बस तिजारे जी फूट पड़े ! भारत माता जंजीरों में जकड़ी हुई है और तुम खेल खेलने में लगे हुए हो ! क्या तुम्हे माँ की मुक्ति का प्रयत्न नही करना चाहिए ? बच्चों ने पूछा भला हम लोग क्या कर सकते हैं ! इन्होने जबाब दिया संगठित होकर देशसेवा करना चाहिए ! संघ की शाखा लगाना चाहिए ! एक वालक बोला हाँ हाँ मेरे पिताजी भी एक बार कह रहे थे ! सब मिलकर उस वालक के पिताजी के पास पहुंचे ! उन्होंने कहा कि एक बार मैं नागपुर गया था, बहां संघ के विषय में सूना था ! यह अच्छा संगठन है ! फिर क्या था हो गई उज्जैन में शाखा शुरू ! जो वालक पहला स्वयंसेवक बना बह थे राजाभाऊ महाकाल ! जो आगे चलकर संघ के प्रचारक बने और गोआ मुक्ति आंदोलन में शहीद हुए !

दत्तात्रय गंगाधर कस्तूरे उपाख्य भैयाजी कस्तूरे ! माता पिता बचपन में ही चल बसे ! इन्हें व बड़े भाई दिगंबर कस्तूरे को चाचा साथ तो ले आये पर निभा नही पाए ! विवश दोनों भाई अनाथ स्थिति में हो गए ! तभी उनका संपर्क तिजारे जी से आया ! वे उन दिनों विनोद मिल में स्वीपर की नौकरी करते थे ! वे स्वयं केवल दूसरी कक्षा तक ही पढ़े थे ! उन्होंने इन दोनों से कहा कि मैं तो नही पढ़ पाया किन्तु तुम लोग पढ़ो और सुयोग्य बनकर देश की सेवा करो ! तुम्हारा व्ययभार मैं उठाऊंगा ! पढाई पूरीकर दोनों भाई संघ प्रचारक बने ! बड़े दिगंबर तो कुछ समय बाद महामंडलेश्वर अखंडानंद सरस्वती के रूप में परिवर्तित हुए, किन्तु भैयाजी आजीवन प्रचारक रहे !

उज्जैन में संघ कार्य प्रारम्भ करने के बाद तिजारे जी देवास पहुंचे और एक परिचित के माध्यम से शाखा शुरू की ! भगवा ध्वज लगाकर बच्चों और नवयुवकों को लाठी सिखाना और कवड्डी खेलना शुरू किया ! एक बार देवास के राजा की सवारी उधर से निकली ! राजा का भी ध्वज भगवा ही था ! उन्हें अचम्भा हुआ कि उनका झंडा लगाकर यह क्या चल रहा है ? कौन है यह आदमी ! उन्होंने तिजारे जी को बुलवा कर पूछताछ की ! इन्होने जबाब दिया कि हिन्दू समाज का संगठन करने के लिए नागपुर से आया हूँ ! बच्चों को लाठी, छुरिका, खेल आदि सिखाता हूँ ! 

राजा ने कहा कि ठीक है, लेकिन तुम्हे परिक्षा देना पड़ेगी ! अगर तुम हमारे पहलवान को हरा दोगे तो ही यहाँ रह पाओगे और शाखा चला पाओगे ! सबके बीच में राजा का पहलवान आया और राजा को प्रणाम कर लाठी घुमाने लगा ! तिजारे जी ने एक दुबले पतले किन्तु फुर्तीले स्वयंसेवक को समझा बुझाकर खडा किया ! उसने आकार तिजारे जी को प्रणाम किया और सिद्ध स्थिति में पहलवान के सामने खडा हो गया ! पहलवान ने लाठी घुमाते हुए सर पर प्रहार किया ! किन्तु स्वयंसेवक ने एक तरफ झुक कर उसका वार बचाया और जन्घास्थी लंगडी मार मारी ! पहलवान ऊ ऊ करता बैठ गया ! फिर क्या था जनता ने तिजारे जी को कन्धों पर उठा लिया ! बाद में राजा ने भी अपने साथ हाथी पर बैठाकर तिजारेजी का सम्मान किया ! देवास में संघ कार्य की धाक जम गई !

उज्जैन संघ शिक्षा वर्ग के बाद प्रचारकों की बैठक हुई ! सर कार्यवाह एकनाथ जी रानाडे ने प्रारंभ में ही कहा की बैठक में केवल प्रचारक ही बैठेंगे, शेष सब जाएँ ! तिजारे जी ही वर्ग की व्यवस्था की सम्पूर्ण देखभाल कर रहे थे अतः उन्हें नहीं लगा कि यह उनसे कहा गया है ! किन्तु रानाडे जी ने उनसे सीधे ही कहा कि आप तो प्रचारक नहीं है, आप जाएँ ! जो व्यक्ति नागपुर से आकार संघ कार्य हेतु वर्षों से उज्जैन में स्वयं को खपा रहा था, उसके दिल पर क्या गुज़री होगी, यह सहज कल्पना की जा सकती है ! तिजारे जी अतिशय दुखी हुए ! कमरे में जाकर खूब रोये ! किन्तु दूसरे दिन सुबह फिर पूर्ववत काम में जुटे दिखाई दिए ! चहरे पर शिकन भी नहीं ! किसी ने पूछा कि कल तो इतने दुखी थे आज क्या हुआ ? जबाब दिया – रात को ऐसा लगा जैसे डाक्टर साहब पूछ रहे होँ – क्यों दिगू जब हिन्दू संगठन के लिए घर छोड़कर निकले तब क्या यह सोचा था कि कोई जब प्रचारक मानेगा तभी काम करोगे ? बस मन शांत हो गया ! मजे की बात यह कि उसी दिन उन्हें विभाग प्रचारक घोषित कर दिया गया !

एक बार तिजारे जी उज्जैन से अकस्मात मुम्बई चले गए ! उसके पीछे भाव यह था कि मुम्बई स्थित देश का सबसे बड़ा स्लाटर हाउस उडाया जाए ! जानकारी मिलने पर डाक्टर साहब ने मुम्बई जाकर उनसे भेंट की और कहा कि अंग्रेजों के राज में एक स्लाटर हाउस उड़ाओगे तो दस नए बन जायेंगे ! इसलिए अच्छा यही है कि स्वयंसेवक खड़े करो !

तिजारे जी को उज्जैन से इंदौर भेजने की योजना बनी, किन्तु उनको यह कहने की हिम्मत किसी की नही हो रही थी ! एकनाथ जी भी उनसे कह नही पा रहे थे अतः उनसे बात नहीं कर रहे थे ! उनका बात ना करना तिजारे जी को असह्य हो गया ! उन्हें लगा कि एकनाथ जी उनसे नाराज हैं ! उन्होंने एकनाथ जी को रास्ते में रोका और कहा कि झाबुआ के जंगलों में चला जाऊंगा और जब कभी बहां आओगे तो बंदरों से प्रणाम करबाऊंगा ! (उन दिनों प्रचारक प्रणाम के अधिकारी थे ! यह प्रथा बाद में प.पू.श्री गुरूजी ने बंद कारबाई)! बताओ क्या नाराजी है ! गदगद एकनाथ जी ने उन्हें गले से लगा लिया और बताया कि आपको इंदौर के मील क्षेत्र में संघ कार्य विस्तार के लिए भेजने की योजना है, किन्तु कहने में संकोच हो रहा था ! स्वाभाविक ही तिजारे जी हंसी खुशी इंदौर पहुँच गए !

बड़े ही अल्हड और अलमस्त थे तिजारे जी ! गोआ मुक्ति आंदोलन की सफलता के पश्चात जगन्नाथ राव जोशी जी के इंदौर आगमन पर उनकी शोभायात्रा निकाली गई ! हाथी पर बैठे हुए जोशी जी के आगे आगे कार्यकर्ता जगन्नाथराव जोशी जिंदाबाद के नारे लगाते चल रहे थे, किन्तु जोशी जी लघुशंका जाने को परेशान थे ! उन्होंने धीरे से तिजारे जी को अपनी कठिनाई बताई ! तिजारे जी हंस कर बोले ऊपर हाथी के हौदे में कौन देख रहा है, कर लो ! जोशी जी बोले लोग क्या कहेंगे ? तिजारे जी बोले और क्या कहेंगे, यही कहेंगे कि हाथी को पसीना आ गया !· तिजारे जी जब भोपाल प्रचारक बने तब उज्जैन से पैदल भोपाल आये ! रास्ते में पडने बाले सभी गाँवों में मिलते जुलते और संघ कार्य का सन्देश देते हुए ! श्री गुरूजी के ५१ वे जन्म दिवस पर एकत्रित श्रद्धानिधि से प्रथम प्रतिवंध काल में संघ पर हुए कर्जे को निबटाया गया ! श्रद्धानिधि एकत्रित करने के लिए गुरूजी का चित्र रखकर उसके सामने एक चादर बिछा दिया जाता ! फिर एक स्वयंसेवक गुरूजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की जानकारी देता और लोग अपनी अपनी क्षमता वा भावना के अनुसार राशि समर्पित करते ! समाज के हर वर्ग से सहयोग लेने की खातिर यह किया गया !

भोपाल आकर भी उनके तेवर यथावत रहे ! गुरू पूर्णिमा उत्सव पर स्वयं आने के स्थान पर तत्कालीन मुख्य मंत्री ने गुरू दक्षिणा का लिफाफा भेज दिया! बस फिर क्या था तिजारे जी आग बबूला हो गए ! जैसे ही समय मिला वे मुख्य मंत्री के पास पहुंचे और वह लिफाफा उनकी टेबल पर फेंक दिया (जनश्रुति के अनुसार उनके मुंह पर फेंका) और बोले गुरू दक्षिणा भावना प्रधान है अर्थ प्रधान नहीं ! परम पूज्य भगवा ध्वज को प्रणाम किये बिना गुरू दक्षिणा कैसी ?

डाक्टर साहब की स्मृति में नागपुर में संघ कार्यालय स्मृति मंदिर का निर्माण प्रारम्भ हुआ ! सर संघचालक प.पू. गुरूजी ने सभी स्वयंसेवकों से आग्रह किया कि अपनी अपनी भावना के अनुरूप धनराशि इस कार्य हेतु भेजें ! सबने धनराशि भेजी ! गुरूजी ने जब सूची देखी तब उसमें तिजारे जी का मनीआर्डर देखकर उन्हें अचम्भा हुआ ! सोचा इनके पास पैसे कहाँ से आये होंगे ? मालूम किया तो ज्ञात हुआ कि तिजारे जी ने अपना खून बेचकर यह राशि भेजी है ! वे दुखी भी हुए और तिजारे जी पर नाज भी हुआ ! बाद में मिलने पर गुरूजी ने तिजारेजी को समझाया कि प्रचारक का तो शरीर भी संघ का ही होता है अतः तुमने जो खून बेचा बह भी संघ का ही था तुम्हारा कहाँ ?

सीहोर का किस्सा भी कम रोचक नही है ! संघ कार्य शुरू हुआ ! थोड़ी गति पकड़ी ! काम को और मजबूती देने के लिए नगर में संचलन निकालना तय किया ! प्रथम संचलन ! संघ का गणवेश किसी पर नही ! किन्तु जैसे तैसे कुछ लोगों ने बनबाया ! किन्तु समस्या आई जूतों की ! संघ गणवेश के लॉन्ग बूट दैनिक जीवन में रोज तो पहने नही जाते थे ! इसलिए कार्यकर्ताओं ने पुलिस कर्मचारियों से मांगकर काम चलाने की योजना बनाई ! जब संचलन प्रारम्भ हुआ तो नगर में सबको बहुत अचम्भा हुआ ! इस तरह का आयोजन पहली बार नगरवासी देख रहे थे ! सो पूरा शहर देखने उमड़ पड़ा ! 

किसी ने मुस्लिम थानेदार को शिकायत कर दी कि स्वयंसेवक सिपाहियों के जूते पहने हुए है ! थानेदार ने यह मालूम करने के लिए कि किस किस ने जूते दिए हैं, सभी सिपाहीयों की आकस्मिक कालिंग कर दी ! अब एक तरफ तो संघ का पथ संचलन निकल रहा था और दूसरी तरफ सिपाही संचलन के साथ साथ अपने जूते माँगते चल रहे थे ! बड़ी ही रोचक हास्यास्पद स्थिति बन गई ! एक साथ दो संचलन चलने जैसा नजारा था ! माँगने बालों का संचलन भी साथ चलता दिखाई दे रहा था ! तिजारे जी ने बीच संचलन में जूते वापस लौटने से साफ़ मना कर दिया ! थानेदार ने स्वयंसेवकों को जूते उधार देने बाले सभी सिपाहियों पर जुर्माना कर दिया ! यह अलग बात है कि जुर्माने की रकम सभी स्वयंसेवकों ने प्रदान की !

तिजारे जी की कार्य निष्ठा तथा समर्पण को देखकर स्वयंसेवकों में भी बही भावना बढती गई ! जो उनके संपर्क में आया उसमें उनका अंश दिखाई देने लगा ! सीहोर के स्वयंसेवक बिट्ठलदास नमकीन बहुत अच्छा बनाते थे ! वे अत्यंत स्वादिष्ट कचोडी और मंगोडे आदि बनाते थे ! यहाँ तक कि कभी बैठकों आदि में मिलने पर गुरूजी भी उनसे हंसकर पूछ लेते थे कि कुछ नमकीन हमारे लिए नहीं लाये क्या ? लोग आत्मीयता से उन्हें बिट्ठल गुरू कहकर बुलाते थे ! उन्होंने सीहोर जिले में घूम घूम कर संघ कार्य के विस्तार को ही अपना मुख्य काम बना लिया था ! प्रवास हेतु लगने बाले व्यय की व्यवस्था हेतु उन्होंने अदभुत मार्ग खोजा था ! एक हाथ ठेला लेकर वे उस पर मंगोड़े बनाकर बेचते ! अच्छे कारीगर होने के कारण उनके बनाए मंगोड़े हाथों हाथ बिच जाते ! किन्तु उनका उद्देश्य मंगोड़े बेचकर कमाई करना तो था नही ! जैसे ही उनके पास १०० रु. जमा होते वे निकल पड़ते जिला प्रचारक के साथ प्रवास पर ! जब तक पास में पैसे रहते प्रवास कर संघ कार्य विस्तार का काम चलता रहता ! जैसे ही पैसे ख़तम होते, फिर लौट आते सीहोर और फिर शुरू हो जाता मंगोड़े का ठेला ! यह क्रम वर्षों तक चला ! 

अपनी कारीगरी के हुनर से संघ कार्य में आने बाली अड़चने दूर करने में वे सिद्ध हस्त थे ! वे इस हेतु से बेझिझक किसी भी प्रकार का काम करने को तैयार हो जाते थे ! एक बार आष्टा में शीत शिविर लगा ! उनकी शिविर में सम्मिलित होने की इच्छा थी किन्तु जेब खाली ! उन जैसी ही स्थिति के चार अन्य स्वयंसेवक भी थे ! शिविर में सम्मिलित होने के लिये आवश्यक गणवेश, शुल्क तथा बहां जाने की व्यवस्था के लिये उन पांचो ने पास के एक गाँव में हो रहे तेरही के भोज हेतु भोजन बनाने का ठेका ले लिया ! दिन भर बहां भोजन बनाया और पारिश्रमिक प्राप्त होते ही अपना समान उठा चल पड़े पैदल ही आष्टा की ओर ! सुबह शिविर प्रारम्भ होने के पूर्व आष्टा पहुँच अपनी थकान भूल कार्यक्रमों में सम्मिलित हो गए !

१९७३ में श्री दिगंबर राव तिजारे जी का देहांत हुआ ! वे कहा करते थे कि स्वयंसेवक को उसके कार्य का सर्टीफिकेट उसकी म्रत्यु के बाद ही मिलता है ! और सत्य ही उनकी म्रत्यु के बाद श्री गुरूजी ने उन्हें जिस प्रकार भावभीनी श्रद्धांजली अर्पित की, उससे उनकी कही बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई !


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