एक प्रेरक व्यक्तित्व - शंकरलाल शर्मा "दद्दा"

मकर संक्रांति संवत १९७७ तदनुसार १४ जनवरी १९२० रविवार को शंकरलाल जी का जन्म हुआ ! बचपन में ही चेचक के प्रकोप के कारण चहरे पर दाग रहे किन्तु...



मकर संक्रांति संवत १९७७ तदनुसार १४ जनवरी १९२० रविवार को शंकरलाल जी का जन्म हुआ ! बचपन में ही चेचक के प्रकोप के कारण चहरे पर दाग रहे किन्तु जीवन शुचिता की मिसाल रहा ! उनका प्रारंभिक शिक्षण भोपाल के फूल महल स्कूल तथा जहान्गीरावाद हाई स्कूल में हुआ ! भोपाल हमीदिया कालेज से बी.ए. स्नातक तथा रात्री कालेज में अध्ययन रत रहकर डी.एच.बी. (डाक्टर ऑफ होम्योपेथिक बायोकेमिक) की परिक्षा भी उत्तीर्ण की ! उन्हें आयुर्वेद का भी अच्छा अध्ययन था ! भोपाल की नबाबी रियासत में रहकर हिन्दू हितों की रक्षा में तत्पर रहने बाले प. उद्धवदास जी मेहता के आयुर्वेद चिकित्सालय के विस्तार में शकरलाल जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा ! फलस्वरूप वे मेहता जी के घनिष्ठ मित्र तथा परिवार के सदस्य जैसे हो गए ! बाद में उन्हें संघ के प्रति आकर्षित करने में भी शंकरलाल जी की ही प्रमुख भूमिका रही !

शंकरलाल जी दद्दा के काका श्री लक्ष्मीनारायण जी एक विद्वान ब्राह्मण, अच्छे गायक तथा कुशल संगठन कर्ता थे ! वे भोपाल में संघ कार्य के प्रारंभिक स्वयंसेवकों में से एक थे ! चौक क्षेत्र की चार रात्री शाखाओं के प्रमुख भी थे ! शंकर लाल जी का भी संघ शाखा जाना उसी समय प्रारम्भ हुआ ! हाई स्कूल पास करने के बाद घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए दद्दा ने नौकरी की तलाश प्रारम्भ की ! उनकी नौकरी बैरागढ़ की ई.एम.ई. मिलिट्री केन्द्र में लग भी गई ! वे बहां भी अपनी पारंपरिक पोशाक धोती कुडते को ही धारण करते थे ! अंग्रेज सैन्य अधिकारियों द्वारा सूट पेंट टाई पहिनकर ही कार्य करने का आदेश दिए जाने पर दद्दा ने एडवांस लेकर सूट सिलवा तो लिया, किन्तु बह सूट अपने त्यागपत्र के साथ अंग्रेज अधिकारी को ही सोंप दिया ! उन्होंने त्यागपत्र में लिखा था कि श्रीमान को किसी परिश्रमी और ईमानदार कर्मचारी की आवश्यकता नहीं है, अतः अब मेरे स्थान पर यह सूट ही श्रीमान की सेवा करेगा ! 

१९४५ में श्री गुरूजी के भोपाल प्रवास का एक रोचक प्रसंग है ! श्री गुरूजी जिस ट्रेन से मद्रास जा रहे थे, उसका ड्राईवर संघ का स्वयंसेवक था ! संघ कार्यकर्ताओं के अनुरोध पर बह निश्चित समय से १५ मिनट पूर्व ट्रेन को भोपाल स्टेशन पर ले आया ! ट्रेन को २० मिनट स्टेशन पर रुकना था ! व्यवस्थित रूप से स्वयंसेवकों द्वारा, अन्य यात्रियों को बिना असुविधा उत्पन्न किये, गुरूजी को प्लेटफार्म से बाहर बने मंच तक लाया गया ! स्वागत, संक्षिप्त बौद्धिक तथा प्रार्थना का आयोजन हुआ ! गणवेश पहने बाल, तरुण स्वयंसेवकों ने सारा कार्यक्रम अत्यंत सुचारू रूप से, सम्पादित किया ! समूचा कार्यक्रम अत्यंत प्रभावोत्पादक रहा !

१९५४-५५ में शंकरलाल जी दुबारा मध्यप्रदेश विद्युत मंडल में पदस्थ हुए तथा फिर लगभग २५ वर्षों तक इसी विभाग में उच्च श्रेणी लिपिक, कोषागार अधिकारी आदि उत्तरदायी पदों पर रहे ! इसी अवधि में विभाग के कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान हेतु म.प्र. विद्युत कर्मचारी संघ का गठन हुआ तथा शंकरलाल दद्दा उसके प्रांतीय महासचिव नियुक्त हुए ! किन्तु इससे चिढकर कांग्रेसी शासन ने उनका स्थानान्तरण रायपुर कर दिया ! तत्कालीन विद्युत मंत्री कृष्ण नारायण प्रधान ने सन्देश भेजा की दद्दा अगर युनियन बदल लें तो स्थानांतरण रुक सकता है ! किन्तु दद्दा ने यह पेशकश ठुकरा कर त्यागपत्र का मार्ग चुना और इस प्रकार एक बार फिर दद्दा वेरोजगार हो गए ! किन्तु अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया !

१९७५ में आपातकाल के दौरान दद्दा तथा उनके प्रचारक पुत्र चंद्रशेखर की गिरफ्तारी के वारंट जारी हुए ! अतः परिवार की आर्थिक कठिनाईयां और बढ़ गईं ! दोनों को लंबे समय तक भूमिगत रहना पड़ा ! कुछ स्थिति सामान्य होने पर भारत टाकीज तथा गोविन्दपुरा की इंसलरी फेक्ट्री एक्सल प्रोसेस में एकाउंट आफीसर के रूप में नियुक्ति हो जाने से स्थिति में थोड़ा सुधार आया ! किन्तु तभी १९७७ में जीवन संगिनी लंबी वीमारी के बाद साथ छोड़ गईं ! संघ स्वयंसेवकों तथा प्रचारकों का अपनत्व सदा ही दद्दा के साथ रहा ! वे उनके घर को अपना ही घर समझते थे ! बाबा साहब नातू उन दिनों विभाग प्रचारक थे ! परेशानी की इस बेला में उनके सहयोग से दद्दा को पारिवारिक उत्तरदायित्व पूर्ण करने में सफलता मिली ! १९७९ में उनकी बड़ी पुत्री का विवाह योग्य व सुसंस्कृत परिवार में सानंद संपन्न हुआ !

बाद में विधायक विश्राम गृह स्थित भाजपा विधायक दल की व्यवस्था श्री शंकरलाल जी ने लंबे समय तक संभाली ! १३ फरवरी १९९६ वसंत पंचमी को केशव नीडं संघ कार्यालय के वस्तु भण्डार की जिम्मेदारी दद्दा ने संभाली ! २ नवंबर १९९८ बैकुंठ चतुर्दशी को हरफनमौला, जुझारू, आत्म सम्मानी, प्रेरणापुंज व्यक्तित्व दिव्य ज्योति में लीन हो गया ! उनके देहावसान के पश्चात जो भावांजली विभिन्न व्यक्तियों ने समर्पित की बह वस्तुतः उनके तपस्वी जीवन को रेखांकित करती हैं –

श्री उत्तम चंद इसरानी – कष्टों में हंसते हंसते कैसे जीना, इस बात के वे आदर्श प्रतीक थे ! उनका संघ जीवन लोक संग्रही, मिलनसार, अच्छे गीत गायक और ध्येय निष्ठा परिपूर्ण रहा ! भोपाल के प्रथम स्वयंसेवकों में उनका नाम था ! हिन्दू महासभा के प्रमुख नेता प.उद्धवदास मेहता तथा समाज सेवी सरदारमल लालवानी को संघ से जोडने तथा संघचालक बनने हेतु सहमत करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही ! आदर्श स्वयंसेवक के नाते वे सदैव स्मरण किये जायेंगे !

श्री अनंत शंकर नातू – सन १९४५ में लिप्टन चाय कंपनी में नौकरी पर आने के बाद कदर मियाँ का महल (आज अग्रवाल विश्रान्ति भवन) में लगने बाली शाखा का नियमित स्वयंसेवक था ! दद्दा भी उसी शाखा के नियमित स्वयंसेवक थे ! अतः साथ साथ घूमना फिरना तथा चिंतामन चौराहे पर जाकर गुलाब जामुन खाना, लगभग नित्य का क्रम था ! मैं नौकरी छोडकर संघ प्रचारक हो गया और उन्होंने भी नौकरी छोड़ दी ! घर की विषम परिस्थिति में भी उत्साह तथा उमंग से भरे दद्दा ! कंट्रोल से मिलने बाली काली ज्वार की रोटियां ! सब्जी का ठिकाना नहीं ! पानी में नमक वा एक चुटकी लाल मिर्च डालकर उसके साथ रोटी खा कर आनंद से मस्त ! बही रूखी सूखी किन्तु सम्मान की रोटी संघ प्रचारकों को बहां मिलती थी ! 

धीरे धीरे संघ कार्य बढ़ा ! उसका श्रेय दद्दा को ही देता हूँ ! उनके उत्साह, उमंग एवं व्यापक संपर्क के कारण शाखाओं का फैलाव हुआ ! इनके कारण ही गौरी शंकर, रामदयाल, रमेश सिंघल, लक्ष्मीनारायण गुप्ता, मानकचंद चौबे, दद्दू रामनाथ, अमृतलाल नेमा, बाबूलाल चपल, राम प्रसाद पहलवान, हरिनारायण वर्मा, गिरजेश नारायण, बाबूलाल गौर, बाबूलाल गुप्ता, भगत सिंह, जवाहर चौक में मदनलाल गर्ग, बाबूलाल सिंघल, रणछोड सोनी, सोहनलाल आदि संघ स्वयंसेवक बने ! उनकी आत्मीयता, स्नेह, अपनत्व पूर्ण व्यवहार एवं सबकी चिंता करने बाले स्वभाव के चलते दद्दा का जीवन प्रचारकवत ही रहा ! वे एक गृहस्थ प्रचारक थे !

श्री नेमीचंद कक्कर – उत्तर प्रदेश से आये एक विस्तारक महावीर सिंह जी ने १९३७-३८ में हिन्दू नवयुवकों के लिए लाठी-क्लास, साप्ताहिक व पाक्षिक बौद्धिक वर्ग, गीता समिति, रामायण मंडल जैसे कुछ कार्यक्रम चलाये थे ! १९३९ में उन्ही के प्रयत्नों से गौशाला (मंदिर श्री कमाली जी के अहाते में) तथा कदर मियाँ के महल (वर्त्तमान में अग्रवाल विश्रान्ति भवन) आदि स्थानों में व्यवस्थित शाखाएं लगने लगीं ! 

इनमें सर्वश्री पांडुरंग वैद्य, डा,कन्हैया द्विवेदी, शंकरलाल दद्दा के साथ मेरा जाना भी होता था ! उस समय बने वातावरण में ही श्री प्रभाकर पाटनकर तथा बाबासाहब नातू जैसे प्रतिभाशाली प्रचारक प्राप्त हुए ! इसी कड़ी में श्री नारायण प्रसाद गुप्ता, श्री सनत कुमार बैनर्जी, डा. कन्हैया द्विवेदी, श्री वैद्य तथा शंकरलाल दद्दा प्रचारक बने ! शंकरलाल जी को सीहोर भेजा गया ! सीहोर में पहली शाखा सुनारों के मंदिर छावनी में लगी ! प्रारंभिक स्वयंसेवकों में सर्व श्री विरादीचंद गांधी, मंगली प्रसाद चौरसिया, गेंदाला वर्मा, बद्रीप्रसाद शर्मा, राधाकिशन गुप्ता, बिट्ठल दास शर्मा, जगन्नाथ वशिष्ठ, कस्तूरचंद परिहार, नरेंद्र चौरसिया आदि प्रमुख थे !

नबाबी शासन में सीहोर के हिन्दू बहां के अत्याचारी व क्रूर मुस्लिम पुलिस अधिकारी से भयभीत रहते थे ! एक बार बडियाखेडी के श्री हनुमान मंदिर में संघ का एकत्रीकरण था ! सूचना मिलाने पर बह पुलिस अधिकारी बहां दल बल सहित पहुंचा ! उसकी मंशा बहां मारपीट कर दहशत फ़ैलाने की थी ! किन्तु दद्दा के साथ उपस्थित बाबूलाल बंसल ने बिजली सी फुर्ती से उसे जीप से खींचकर पिटाई कर दी और खुद भागकर सिरोंज जा पहुंचे ! इस घटना से सीहोर में संघ की धाक जम गई और हिन्दुओ में चेतना जाग्रत हुई ! इसी प्रकार एक बार मुस्लिमों द्वारा जामा मस्जिद के आसपास बने स्थानीय जैन मंदिरों को भ्रष्ट करने का प्रयास विफल किया गया ! इन घटनाओं ने ना केवल सीहोर वल्कि भोपाल में भी शाखाओं की संख्या वृद्धि में योगदान दिया !

श्री नारायण प्रसाद गुप्ता – १९४५ में मैंने भोपाल में मिडिल स्कूल की परिक्षा पास कर ली थी ! शाखा का अनियमित स्वयंसेवक था ! शंकरलाल जी मेरे ना पहुँचाने पर बेझिझक आकर मुझसे मिलते तथा शाखा आने को प्रेरित करते ! एक दिन दद्दा तांगा लेकर आये और मेरा संक्षिप्त सामान कार्यालय ले गए ! बस बहीं से मेरी प्रचारक यात्रा प्रारम्भ हुई !

श्री बाबूलाल गौर – हमारे भौतिक साधन, हमारी कार्य दक्षता को बढाते हैं ! किन्तु जब साधन नहीं हों, उस समय एक व्यक्ति इतना कुछ कर जाए तो विश्वास ही नहीं होता की हाड मांस का यह पुतला इतना बड़ा कालजयी हो सकता है ! क्रिया भवति सत्वेन, नोपकरणे ! 

गौरीशंकर कौशल – श्री शंकर लाल शर्मा १४ जनवरी १९२० को भोपाल के चौक मोहल्ले में तब्बा मियाँ के महल से लगे हुए एक बहुत छोटे मकान में श्री माधव प्रसाद जी शर्मा की गोद में आये ! तब लोग हंस रहे थे, खुशी मना रहे थे और नवागंतुक शिशु शंकर रो रहा था ! और जब २ नवंबर १९९८ को दद्दा महाप्रयाण कर रहे थे तब लोग रो रहे थे और वे खामोश थे ! यार पैदल चल रहे थे और वे थे कन्धों पे सवार ! 

इस ७८ वर्ष के गौरवपूर्ण जीवन में वाल्य्काल के २० वर्षों को निकाल भी दें तो भी उन्होंने ५८ वर्ष तक इस हिन्दू समाज की अथक रूप से मन वचन और कर्म से सेवा की ! दद्दा अभावों में भी भाव पैदा करने की क्षमता रखते थे ! वे स्वाभिमानी थे पर घमंडी नहीं ! वे फक्कड और मस्तमौला थे ! जहां रहते अट्टहास गूंजते ! दद्दा की कार्य कुशलता और बाबा साहब नातू की नीतिनिपुणता के कारण ही नगर के प्रसिद्द हिन्दू नेता प. उद्धवदास मेहता, लक्ष्मीनारायण जी सिंघल और परमानंद जी शास्त्री जैसे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी व अनेक प्रवुद्ध जन संघ से जुड़े !

इसी काल का एक संस्मरण है की प.पू. गुरूजी के भोपाल आगमन के समय हिन्दू राष्ट्र सेना के कार्यकर्ताओं ने उनके समक्ष प्रश्न रखा की भोपाल में हिन्दू राष्ट्र सेना की भी शाखा लग रही है और संघ की भी ! उत्तम हो की आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा बंद कर दें ! एक ही उद्देश्य के लिए कार्य करने बाले दो संगठन अच्छे नही लगते ! पूजनीय गुरूजी ने उत्तर दिया की मैं यहाँ कार्य बंद करने को तैयार हूँ, पर एक शर्त है कि पहले आप आजीवन कार्य करने बाला एक प्रचारक मुझे दें और साथ ही यह आश्वासन कि आपका काम कभी बंद नही होगा ! ऐसा ना हो कि संघ शाखाएं भी बंद हो जाए और हिंदू राष्ट्र सेना की भी ! किन्तु हिन्दू राष्ट्र सेना इन शर्तों को पूरा नही कर सकी !

जुगल किशोर भार्गव – १९४२ में हम पांच बच्चे देहात से भोपाल शिक्षा ग्रहण करने आये ! शाहगंज से मैं और मेरे बड़े भाई स्व. चुन्नीलाल जी तथा नसरुल्लागंज से नारायण प्रसाद गुप्ता, नार्वदाप्रसाद किंकर व उनके बड़े भाई रामेश्वर जी ! पढाई के दौरान ही हमारी भेंट दद्दा से हो गई वा हमारा कदर मियाँ के महल बाली शाखा में जाना शुरू हो गया ! उन्ही के प्रयास से १९४८ में मेट्रिक पास कर मैं प्रचारक बना तथा बेगमगंज क्षेत्र में संघ कार्य किया !

नर्मदा प्रसाद किंकर – दद्दा के आग्रह से अहमदावाद संघ शिक्षा वर्ग करने के लिए मैंने २५ दिन कुलीगिरी करके आवश्यक धन एकत्रित किया और संघ शिक्षा वर्ग किया ! उनमें दद्दा कहलाने के समस्त गुण विद्यमान थे ! उन्होंने समाज व संघ कार्य के लिए अपने जीवन को तिल तिल कर गलाया !

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