भारत का संविधान - पंडित दीन दयाल उपाध्याय का अभिमत

भारत का संविधान विश्व में सबसे दीर्घ, सबसे बड़ा और सबसे विस्तृत लिखित संविधान है | अमरीका का संविधान उसमें किये गए संशोधनों सहित केवल 20 ...


भारत का संविधान विश्व में सबसे दीर्घ, सबसे बड़ा और सबसे विस्तृत लिखित संविधान है | अमरीका का संविधान उसमें किये गए संशोधनों सहित केवल 20 पृष्ठों का है | सन 1946 के चौथे फ्रांसीसी गणराज्य का संविधान 25 पृष्ठों का है | सन 1947 का इतालवी गणराज्य का संविधान 35 पृष्ठों का है | सन 1949 का संघीय गणराज्य जर्मनी का संविधान 45 पृष्ठों का है | भारत के संविधान की मूल पृष्ठ संख्या 250 से ऊपर है |

संविधान इतना लंबा चौड़ा होने पर भी उसके स्वरुप के बारे में नक्सलवादी नागी रेड्डी से लेकर संविधान विशेषज्ञ कोटेश्वर राव तक विभिन्न विचारवंतों ने विभिन्न कारणवश असंतोष व्यक्त किया है | विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि इन लोगों में डॉ. सच्चिदानद सिन्हा, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एवं स्वयं श्री बाबा साहब अम्बेडकर का समावेश है | चिंतामणी और मसानी ने तो एक छोर पर जाकर ऐसे तर्क दिए हैंकि यह संविधान विभिन्न प्रणालियों की त्रुटियों का संयोजन है | (A scheme which is a combination of drawbacks of different systems)

हमारा संविधान मुख्यतः 1935 के भारत शासन अधिनियम पर आधारित है | ब्रिटिश संसद द्वारा पारित यह शायद सबसे लंबा विधान है | संविधान विशेषज्ञ श्री बसु ने कहा था कि इसका तीन चौथाई भाग 1935 के भारत शासन अधिनियम पर आधारित है |

पंडित दीनदयाल जी का संविधान के विषय में मुख्य आक्षेप यह था कि उसका स्वरुप भारतीय नहीं है | भारत की संस्कृति, परम्परा, मानसिकता, आज की आवश्यकताओं एवं भावी आकांक्षाओं का इस संविधान में प्रतिबिम्ब नहीं है |

महर्षि अरविंद के अनुसार – 

“Each nation is a Shakti or power of the evolving spirit in humanity and lives by the principles which it embodies.” 

अर्थात प्रत्येक राष्ट्र विकासोन्मुख मानवात्मा की एक शक्ति के रूप में अभिव्यक्ति है, तथा वह उन सिद्धांतों के आधार पर ही जीता है, जिनका वह मूर्तिमान रूप है | 

भारत की भी अपनी एक प्रकृति है, अपनी एक आत्मा है | उसके साक्षात्कार के बाद ही हम अपनी समस्याओं का समाधान कर सकेंगे, अपने देश की समृद्धि तथा जन के सुख और हित की व्यवस्था कर सकेंगे, तथा मानव की प्रगति में अपना कुछ योगदान दे सकेंगे | अंग्रेजों के जाने के बाद गांधी जी ज्यादा दिन ज़िंदा नहीं रह पाए, तथा राजसत्ता जिनके हाथ में आई, वे भारत की भाषा और भावना को न तो समझ पाए और ना ही उन्होंने समझना चाहा | अंग्रेजों के जाने से पहले भले ही हमने स्वदेशी का नारा लगाया हो, किन्तु उनके जाने के बाद हमारी आँखों पर अंग्रेजियत का ही चश्मा चढ़ गया | फलतः हमारी राजनीति, अर्थनीति, समाज व्यवस्था, साहित्य और संस्कृति पर अंग्रेजियत की गहरी छाप है | हमारा संविधान भी मुख्यतः 1935 के इंडिया एक्ट का ही थोड़ा सा सजा संवरा रूप है |

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क्रांतिदूत: भारत का संविधान - पंडित दीन दयाल उपाध्याय का अभिमत
भारत का संविधान - पंडित दीन दयाल उपाध्याय का अभिमत
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