कश्मीर का भारत के साथ सम्बन्ध | - श्रीमती क्षमा कौल

कश्मीर भारतीयता का, भारतीय मनीषा, चिंतन, संस्कृति, धर्म के उत्स का वह बिंदु है जहाँ यह विकासोत्सव अपने चरम पर पहुंचता है | अतः वह उसका...


कश्मीर भारतीयता का, भारतीय मनीषा, चिंतन, संस्कृति, धर्म के उत्स का वह बिंदु है जहाँ यह विकासोत्सव अपने चरम पर पहुंचता है | अतः वह उसका उत्सव स्थल है | कश्मीर और भारत का संबंध सिर और धड वाला है, अनन्य है, अकाट्य है | प्राण और शरीर का संबंध है यह | मगर राजनीति ने इसे कंपा के रखा है, लगभग मिटा के रखा है | विशेषकर 1947 के बाद कीई राजनीति ने |

कश्मीर का भारत के साथ संबंध प्रागैतिहासिक है | तब से जब संसार बन ही रहा था | यह प्रथ्वी धीरे धीरे पानी में से निकल कर बाहर आ ही रही थी | हिमगिरि का वह उत्तंग शिखर कश्मीर का वह क्रम्सर नाग ही था, जहां मनु ने नाव बांधी | जिसे नौबंधन कहते हैं | वह खूंटी आज भी जस की तस है | जहां हर वर्ष हजारों लाखों यात्री जाया करते थे और गत वर्ष जब हिन्दुओं का एक जत्था जाने वाला था, तो उस समय के मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला ने यात्रा की अनुमति रद्द कर दी | उसने यात्रा के आदेश को निरस्त किया तो जिहादियों ने मस्जिद की नींव रखकर वहां नमाज पढी | हम कश्मीरी हिन्दू हताश, निराश, लावारिस और परास्त कर दिए गए राजनीति के हाथों |

अगले दो दिनों में ऐसी पौराणिक बिजलियाँ कड़कीं और ऐसी एतिहासिक बाढ़ उसी स्थल से कश्मीर में आ गई | मैं कहना यह चाहती हूँ कि पृकृति बारम्बार इस बात पर अपने हस्ताक्षर कर रही है कि यह ईश्वरीयता, या सनातन धर्म अध्यात्म का उत्स है, मगर कृषकाय भारतीय राजनीति का क्या करें ?

इस उत्स से जो कुछ प्रवाहित होता रहा, वह मानव जीवन का स्वर्णाभ तत्व था, प्राणवायु थी | वह सभ्यता और संस्कृति की महान धरोहर थी, जिससे आज तक कोई स्पर्धा नहीं कर पाया | वह शिव दर्शन था | वह शिवदर्शन में निहित अंतरदृष्टियों का रश्मिपुंज था | वे महान मानव मूल्य थे | वह वह विज्ञान था जिससे मनुष्य जीवन के उदात्त रहस्यों को देखता भी है और दिखाता भी |

कश्मीर का दूसरा नाम शारदा पीठ है, अर्थात ज्ञान का पीठ, SEAT OF KNOWLEDGE | आज भी भारत के प्रबुद्ध, सचेत एवं ज्ञानी लोग कश्मीर की दिशा में प्रणाम कर कहते हैं – “नमस्ते शारदे देवि, काश्मीर पुरवासिनी” | 

आदरणीय श्री रामेश्वर मिश्र पंकज तथा आदरणीया कुसुमलता केडिया जी द्वारा लिखित अद्भुत पुस्तक “भारत” में लिखा है कि – अठारह हजार वर्ष पूर्व जब वेदों की श्रुति परंपरा में चिरकाल तक रहने के बाद लिपिबद्ध करने की योजना बनी, तो इसके लिए स्थल कश्मीर के सुरम्य सरोवरों के तटों को चुना गया | कितनी अद्भुत बात है ? आध्यात्मिक विज्ञान की सशक्त प्रयोगशाला कश्मीर थी | जैसे जलधार का प्रवाह नीचे की ओर होता है, उसी नियम में कश्मीर की संस्कृति का आवेगमय अमृत प्रवाह समूचे भारतवर्ष में हुआ | भारतवर्ष से मेरा अभिप्राय है आर्यावर्त, सचमुच अखंड भारत, जिसमें आधुनिक अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बाग्लादेश, मारीशस इत्यादि सभी समाविष्ट हैं |

प्रागैतिहासिक युग के बाद मैं प्रविष्ट होती हूँ वहां, जहां से लिखित इतिहास उपलब्ध है | और वह प्रारंभ होता है भगवान् श्रीकृष्ण की उपस्थिति से | कश्मीर के तत्कालीन राजा गोनंद ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया तो वहां बलराम के हाथों उसका बध हुआ, क्योंकि रिश्तेदारी के कारण गोनंद कौरवों की ओर से लड़े | उस समय गोनंद की पत्नी यशोवती गर्भवती थी | श्री कृष्ण ने गोनंद के गर्भस्थ शिशु का ही राज्याभिषेक करने हेतु कश्मीर जाने का निर्णय लिया तो मित्रगणों ने कहा कि आप क्यों जा रहे हैं ? उन्होंने तो कौरवों का पक्ष लिया था | अतः किसी और को भेजना ही उचित होगा | किन्तु भगवान् कृष्ण बोले – या उमा शैव कश्मीरा | अर्थात कश्मीर की धरती स्वयं पार्वती है, अतः वहां के राजा का अभिषेक मैं स्वयं करूंगा | कल्हण ने राजतरंगिणी का सूत्र यहाँ से लिया है और अपने जीवन काल के अंत तक उस समूचे इतिहास का प्रामाणिक रूप से अंकन किया है | राज तरंगिणी कश्मीर का राजनैतिक इतिहास मात्र ही नहीं, अपितु समूचे भारत का राजनीतिक, धार्मिक वृतांत है | कल्हण का हर श्लोक, हर पद कश्मीर के भारत के साथ गहरे और अकाट्य संबंध को ही बताता है | अंततः यहीं से हमें पता चलता है कि जिस शक्तिशाली सूत्र से आर्यावर्त एक होकर आपस में बंधा गुंथा था, वह धर्म, दर्शन एवं संस्कृति ही है |

अतः भारत एवं कश्मीर के सभ्यतागत एकता का सबसे बड़ा सूत्र है, सामूहिक चेतना, जिसके घटक हैं अध्यात्म अथवा धर्म | मिथक, भाषा, तीर्थ, देवी-देवता, दर्शन, काव्य शास्त्र तथा तत्संबंधी सौन्दर्यशास्त्र | कश्मीरी भाषा स्वयं संस्कृत गोत्रजा है | आपको आश्चर्य होगा यह जानकर कि कश्मीरी भाषा सीधे ऋग्वेद से आई है तथा ऋग्वेद के बहुत सारे शब्द इसमें बिना किसी परिवर्तन के अक्षुण्ण हैं | ऋग्वेदिक विशिष्ट ध्वनियाँ भी बनी हुईं हैं | राज्ञी का प्रादुर्भाव होने पर भगवान् श्रीराम उन्हें हनुमान जी के कन्धों पर बैठाकर सबसे पवित्र एवं सुरक्षित स्थली कश्मीर के तुलमुल में भेजते हैं | उत्तर भारत का यह श्रेष्ठ तीर्थस्थल क्षीरभवानी नाम से प्रसिद्ध है | इससे यह भी सिद्ध होता है कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता कितनी प्राकृतिक एवं सहज थी | 

नीलमत पुराण में जहां “या उमा सैव कश्मीरा” कहा गया, वहीं ऋग्वेद के नदी सूत्र में जो वर्णन वितस्ता का है, उसके विषय में नीलमत पुराण बताता है – सती देवी नदी भूत्वा, कश्मीरायां विनिर्गता.....” अतः सती स्वयं नदी है .... वितस्ता नदी जो कश्मीर में प्रवाहित हो गई | शांडिल्य ऋषि द्वारा स्थापित शारदा तीर्थ आज पाकिस्तान में जीर्ण अवस्था में पडा है | शारदा देवी स्वयं समुद्र मंथन से जुडी हैं | शांडिल्य ऋषि सम्पूर्ण भारतीय सभ्यता में एक गोत्र प्रवर्तक ऋषि रहे हैं | यही शारदा तीर्थ परशुराम से भी सम्बंधित है, जहां उन्होंने शस्त्र त्याग किया | तथा हरमुकुट गंगा की तलहटी के रामराघन नामक स्थल पर तपोलीन हो गए | बेहद दुर्गम स्थल होने के कारण हमें वहां से निकाले जाने तक “रामराघन” नाम अपरिवर्तित था, किन्तु जिहादियों के सांस्कृतिक संहार कार्यक्रम के चलते अब इसका नाम क्या रखा गया होगा, ज्ञात नहीं |

अब अनन्तनाग का वर्णन लें, जोकि भगवान व्यास ने श्रीमद्भागवत्गीता में विभूतियोग में किया | भगवान् विष्णु ने अनंत द्वारा ही सतीसर का जल निकलवाया | भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि “नागानां अनंत यास्मि” अर्थात नागों में मैं अनंत हूँ | श्रीनगर से लगभग पचास किलोमीटर दूर पूरे जनपद का यही नाम है | सांस्कृतिक संहार के अंतर्गत इसका नाम भी इस्लामावाद रखने की अत्याधिक कोशिश की जा रही है, जिसमें प्रदेश सरकार की भी सहमति प्राप्त है | 

कश्मीर का भारत ही होना उस काव्यशास्त्र से स्पष्ट है, जिसके सभी सम्प्रदायों का प्रवर्तन कश्मीर के विद्वानों ने किया | और ये सभी सम्प्रदाय भारतीय काव्यशास्त्र के सम्प्रदाय कहलाते हैं, न कि कश्मीर के | जिसमें रस, अलंकार, ध्वनि सम्मिलित हैं | यह एक्य धर्माधारित सांस्कृतिक चेतना ने ही संभव किया, जोकि सुदीर्घ काल तक अर्थात निकट अतीत तक अजस्त्र, अकाट्य एवं निर्बाध बनी रही | अर्थात राजनीति धर्मविहीन नहीं थी | इस पर यदि कोई गाज गिरी तो वह सेक्यूलरिज्म की थी | 

समूचे कर्नाटक संगीत के आधार ग्रन्थ संगीत रत्नाकर के रचयिता कश्मीर के श्री पंडित सारंगदेव थे | यह ग्रन्थ पंद्रहवी शती में रचा गया | मुझे स्मरण है कि कुछ वर्ष पूर्व श्री पंडित भीमसेन जोशी ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पंडित शारंगदेव न होते, उनकी संगीत रत्नाकर ना होती तो मैं भीमसेन जोशी भी न होता | विश्व भर के सारस्वत ब्राह्मण अथवा कश्यप गोत्रज अपना मूल उद्गम कश्मीर में प्राप्त करते हैं | जब तक संविधान न था, या उसमें धर्म निरपेक्ष शब्द न था, तब तक धर्म भारत को प्रकृत्यः धारण किये हुए था | धर्मनिरपेक्ष शब्द राजनैतिक शब्दजाल की चाल ही है |

मैंने यह ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक भूमिका इसलिए आपके सामने रखी, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि कश्मीर का भारत के साथ कितना गहरा, गाढ़ा सम्बन्ध है | कश्मीर भारत है और भारत कश्मीर | कश्मीर भारत का सर है, यह कोई काव्यात्मक वाक्य नहीं है, यह सत्य है, यही तथ्य है, भौगौलिक और सामरिक दृष्टि से यही सटीक है | कश्मीर वह कंठ है, जिसमें भगवान् शिव, विष को रोके रख सृष्टि की रक्षा करते हैं, तप करते हैं | यह तप हम सभी को करना है | राजनीति पर पैनी दृष्टि गढ़ाए रखकर तथा गलत बात का विरोध करने के लिए कटिबद्ध रहकर |

यदि कश्मीर में या कश्मीर को लेकर कोई समझौता किया गया तो यह विष शरीर में अर्थात शेष भारत के मैदानों में उतरने में क्षण भर की देरी नहीं करेगा, और सम्पूर्ण देश के अस्तित्व को गहरे संकट में डाल देगा |

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