पराभव की छाया में आत्मविश्वास का सूर्योदय – हिन्दू साम्राज्य दिवस

१६७४ ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी अर्थात आज ही के दिन रायगढ़ के विशाल प्रांगण में राजे रजबाडों की सहभागिता तथा जीजा माता एवं शम्भाजी की उपस्थि...



१६७४ ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी अर्थात आज ही के दिन रायगढ़ के विशाल प्रांगण में राजे रजबाडों की सहभागिता तथा जीजा माता एवं शम्भाजी की उपस्थिति में शिवराज का राज्याभिषेक हुआ ! इसके पीछे के पराभव की सुदीर्घ एतिहासिक प्रष्ठभूमि में यह एक गौरवपूर्ण क्षण था ! मुहम्मद बिन कासिम सातवीं सदी में आक्रमण करने आया तब से १७ वीं सदी तक पददलित रहे ! महिलाओं का अपमान तो आम बात थी ! पराक्रम की शक्यता व क्षमता होते हुए भी उसका चिन्ह दिखाई नहीं देता था ! छुटपुट प्रयास या बड़े प्रयास, यहाँ तक कि महाराणा प्रताप का पराक्रम भी यह दाग धो नहीं सका था ! विजय नगर साम्राज्य एवं देवगिरी साम्राज्य भी अल्पकाल में लुप्त हो गए थे ! निराशाजनक स्थिति थी ! पराक्रम के वाबजूद कुंठा का भाव था ! 

न्यायमूर्ति रानाडे ने उन्नीसवीं शताव्दी के अंत में हिस्ट्री ऑफ ग्रेट मराठा लिखी ! उन्होंने पुस्तक लिखने का कारण भी लिखा ! देश की आगामी पीढ़ी पर पराभूतता की छाया नहीं रहे ! पुस्तक की अंतिम कड़ी है विजय ही विजय – शिव राज्याभिषेक ! लोकमान्य तिलक ने भी सार्वजनिक रूप से गुलामी काल में हिन्दू साम्राज्य दिवस के नाम से यह उत्सव प्रारम्भ किया ! आज भी परिवेश भिन्न, किन्तु संकट बरकरार ! आज भी आधी अधूरी विजय ! आज भी निराशा का वातावरण ! 

राम गणेश गडकरी के मराठी नाटक शिव संभव का एक दृश्य है – गर्भवती जीजामाता से उनकी इच्छा पूछकर होने बाले बच्चे के स्वभाव का पूर्वानुमान लगाया जाता है ! जीजा माता सहेलियों को अपनी इच्छा बताती हैं कि शेर पर सवार, १८ भुजाओं में शस्त्र लेकर बैठी हूँ ! यह उनकी इच्छा किन्तु समाज में साहस नहीं ! समर्थ रामदास रामराय से प्रार्थना करते – जनहित में करो राम दाया, मेरा मन तड़प रहा है ! अवतार लेना होगा ! शिव बा से कहते थे साम्राज्य स्थापित करो, शपथ लो उंगली चीरकर ! जीजा माता भी कहतीं, यही मेरा भी सपना है ! जीजामाता कहतीं थीं चाकरी नहीं राज करने को पैदा हुआ है ! वहां से विजय पथ प्रारम्भ हुआ ! क्षत्रपति शिवराय का प्रयास समाज का खोया आत्मविश्वास पुनः जागृत करने का ! 

शिवाजी स्वराज की संकल्पना का जन (mass) के साथ साथ गण (Class) में सम्प्रेषण सफलता पूर्वक इस कारण कर पाए, क्योंकि उन्होंने यह नहीं कहा कि “स्वराज मेरी अवधारणा है” | उन्होंने हमेशा स्पष्ट स्वरों में कहा कि “स्वराज यह श्री की इच्छा है” | जबकि आज देश में दृश्य ठीक विपरीत है | सरकार हो या संगठनों के नेता, हर योजना को अपनी बताते हैं, उसके लिए विज्ञापन, होर्डिंग तथा मार्केटिंग के विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करते हैं | योग्य नायक एक विचार को सबका संकल्प बनाने की योग्यता रखता है | शिवाजी के शासन तंत्र में सिपाही से सेनापति तक, नागरिक से नायक तक सभी अगर आत्मविश्वास से भरे थे तो उसका प्रमुख कारण था, उनकी स्वराज में आस्था | यह आस्था शिवाजी ने भाषण देकर या चौराहों पर स्वयं के चित्र लगाकर खडी नहीं की थी, शिवाजी के मन में स्वराज को लेकर जो पवित्र भाव था, वह सूक्ष्म तरंग बनकर दूर दराज तक फैले स्वराज के हजारों लाखों लोगों के ह्रदय में समा गया था और उसके ही कारण अद्भुत पराक्रमी साथी निकले ! 

बेटे रायबा की शादी का निमंत्रण देने आये तानाजी, पर सिंहगढ़ जीतना पहले जरूरी मान जा पहुंचे युद्धभूमि में ! गढ़ तो आया पर सिंह गया ! बलिदान हो गए ! बाजी प्रभू देशपांडे ने कहा जान भी चली जाए पर लडता रहूँगा ! शीश कटा पर देह लड़ी थी, कोंडाना पर गाज गिरी थी ! हजारों के साथ २० – २२ रणबांकुरे भिडे ! सर बिहीन धड लडता रहा ! बालाजी निम्बालकर, कान्होजी आंग्रे - पराक्रम की मालिका ! बैदनी नायक औरंगजेब के यहाँ की खबरें निकालकर लाते रहे ! एसी सेना, संतों की इच्छा, जीजामाता का सपना ! तुकाराम के भजन गाते ! ईश्वर को मस्तक पर रखो फिर पराक्रम करो ! स्वयं शिवाजी का आगरा से बापिस आना किसी चमत्कार से कम नहीं था ! 

काशी विश्वनाथ मंदिर उखाड फेंकने से व्यथित हुए बाघा भट्ट महाराष्ट्र आकर शिवाजी से मिले और बताया कि मंदिरों की मूर्तियों से मस्जिदों की सीढियां बन रही हैं ! आप राजा बनो ! प्रेरणा देने बालों की मालिका ! उत्तर से कवि भूषण ! औरंगजेब की नौकरी करते किन्तु कभी उसकी स्तुति नहीं गाई ! उससे कहा आप स्तुति लायक नहीं ! बहां से निकलकर शिवबा के पराक्रम पर काव्य रचा ! 

राज्याभिषेक से प्रेरणा लेकर देश के अन्य भागों में भी सफल प्रयत्न हुए ! राजस्थान में दुर्गादास राठौर ने कलह मिटाकर सब राजाओं को जोड़ा और राज्य कायम किया ! छत्रसाल पिता की मृत्यु के बाद शिवराज से मिले और कहा आप आयें ! हम आपके मांडलिक बनने को तैयार हैं ! बाद में शिवाजी महाराज की प्रेरणा से बुंदेला राजा बने ! आसाम में चक्रधर सिंह, कूच बिहार में सत्य सिंह इन सबके प्रेरणा स्त्रोत बने शिवाजी ! प्रयत्न सबको जोडने का ! मिर्जा राजा जयसिंह को पत्र लिखा – चाहो तो आप राजा बन जाओ पर शत्रु की चाकरी मत करो ! 

आज भी समाज भ्रष्टाचार, लालच, निराशा, पराक्रम और आत्मविश्वास के अभाव से जूझ रहा है ! इसमें परिवर्तन की आवश्यकता है ! हिन्दू साम्राज्य दिवस इसी सत्व ओ तत्व की प्रेरणा देने वाला दिवस है ! समाज सातत्य से प्रेरणा लेता रहे यही इस उत्सव का उद्देश्य ! महान रणनीतिकार क्षत्रपति शिवाजी ! जिन तुलजा भवानी से तलवार प्राप्त की उनका ही मंदिर ध्वस्त हुआ, पंढरपुर में बिठोबा का मंदिर तोड़ा गया ! लोगों ने कहा, क्या कर रहे हो, कैसे राजा हो ? उनकी योजना में जल्दबाजी को स्थान नहीं था ! अफजल खान के सम्मुख शरण आने का नाटक रचा और उसे पहाड़ प्रतापगढ़ में लाए, जहां उसका वध किया ! निजाम ने हिंदुओं को मारा, पुणे को जलाकर शहर पर गधों से हल चलबाया ! बाद में कोंडदेव और जीजामाता की उपस्थिति में सोने का हल फिरा ! वही पुणे आगे चलकर पेशवाओं की राजधानी बना ! शाइस्ता खान का प्रसंग भी समाज में आत्म विश्वास पैदा करने बाला हुआ ! पुर्तगीज रिकार्ड में शिवराज का एक पत्र है ! उनसे पूछा गया कि आपका छोटा राज्य दक्षिण, फिर आप पूरे देश की बात क्यों करते हैं ? शिवराज ने उत्तर दिया – सिंधु नदी के उद्गम से लेकर कावेरी तक आसेतु हिमाचल हमारी धरती है ! 

उस समय हरेक जागीरदार की अपनी सेना हुआ करती थी ! मनसबदार भी हजार दस हजार सेना रखते थे ! शिवराज ने व्यवस्था बदली ! सेना सब केन्द्र की, सिंहासन की, हिन्दवी स्वराज्य की ! समुद्र में विजय दुर्ग, सिंधु दुर्ग बने ! कैसे बने होंगे सोचकर हैरत होती है ! सामान्य लोगों को साथ लेकर उन्हें तज्ञ बनाकर ये असंभव कार्य किये ! चिपलुण में परशुराम मंदिर तोड़ा गया तो बहां जाकर छोटी लड़ाई लड़ी ! बहां के शिलालेख में तारीख एवं प्रसंग अंकित है ! यह सब करते हुए भी और अधिक करने की चुनौती ! क़ुतुब शाह से बीजापुर मिलने गए बहां येशाजी कंक ने उसके पहलवान को परास्त किया ! पुणे के पास रानेगांव का जागीरदार पाटिल अत्याचारी था ! एक महिला के साथ दुर्व्यवहार किया तो पकड़ मंगवाया ! हाथ पाँव दोनों कटवा दिए ! 

खंडोजी खोपडे के साथ भी यही किया ! अफजलखां से हुए युद्ध के बाद जब धटनाओं का विश्लेषण किया गया तो यह बात ध्यान में आई कि खंडोजी खोपडा का आचरण स्वराज के विरुद्ध रहा, उसने राष्ट्र द्रोह किया है | कान्होजी जेधे स्वराज के वरिष्ठ व्यक्ति थे | शिवाजी के पिता शाहजी के संगीसाथी थे | उन्होंने शिवाजी से निवेदन किया कि खंडोजी की जान बख्श दी जाए | सबके सामने अपने वरिष्ठ सहयोगी का मान तो शिवाजी ने रख लिया, किन्तु वे अन्दर से हिल गए | कुछ दिन बाद जैसे ही एक दिन खंडोजी खोपडा उनके सामने पडा शिवाजी ने उसके अपराध पर निर्णय लेते हुए आदेश दिया कि जिस बाएं पैर से यह दुश्मन की ओर बढ़ा था, उसे काट दो और जिस दाहिने हाथ से इसने दुश्मन का सहयोग व स्वराज्य का अहित करने के लिए तलवार उठाई, वह हाथ भी काट दो | आदेश का तत्काल पालन हुआ | व्यथित कान्होजी जेधे शिवाजी के सामने आये और बोले “महाराज ये क्या किया” ? शिवाजी ने कहा कि “आपको इसे मृत्युदंड न देने का वचन दिया था सो उसका पालन किया, किन्तु अगर कोई भी दण्ड ना दिया जाता तो यह सन्देश जाता कि देशद्रोह से परिचय बड़ा है | क्या यह स्वराज्य के लिए उचित होता ?” 

खिरकिणी नामक एक गुजरनी महल में दूध बेचने आती थी ! एक बार सूर्यास्त के बाद दरबाजे बंद हो जाने के कारण रात को घर नहीं जा पाई ! घर पर बीमार बच्चा अकेला था ! ममता की मारी किसी प्रकार दीवार फांदकर घर पहुँच गई ! शिवाजी को मालुम हुआ तो उसे बुलाया ! उसकी ममता का तो सम्मान किया किन्तु उससे बह मार्ग भी पूछा जहां से बह गई थी ! जब वो जा सकती है तो शत्रु भी उस मार्ग से आ सकता है ! बहां आज भी खिरकिणी बुर्ज है ! इतनी सतर्क दृष्टि ! 

राज्याभिषेक के समय भी यह स्मरण रहा कि किस विचार को लेकर कार्य कर रहे हैं ! उसे शिव राज्याभिषेक नही कहा, हिन्दवी स्वराज्य कहा ! उत्तर में बादशाह, दक्षिण में ५ सुलतान फिर भी यह राज्य बने यह श्री की इच्छा ! सबके लिए अवतार, श्रीमंत योगी, उपभोग शून्य स्वामी, म्लेच्छ संहारक ! शिवराय ने आज्ञापत्र जारी किया – कर प्रणाली, शासन के कर्तव्य, गौहत्या बंदी, कम जमीन बाले के लिए कम कर, अधिक जमीन बाले के लिये अधिक कर ! 

बही इतिहास पुनरावर्त इसलिए इस दिन का स्मरण आवश्यक ! दिल्ली का तख़्त तोडने बाले पेशवा घरभेदी के कारण पानीपत में परास्त हो जाते हैं ! १८५७ में यशस्वी योजना के अभाव के कारण सैनिकों में उठाव होता है किन्तु जन उठाव नही हो पाता ! ब्रिटिश म्यूजियम में एक चित्र है ! ध्वज स्तंभ पर जरीपट ध्वज उतर रहा था और अंग्रेज ध्वज चढ रहा था ! चढाने और उतारने बाले दोनों ही हिन्दू थे ! आज भी बही चक्र चल रहा है ! शिवाजी के समान पराक्रम के लिए समाज संगठन आवश्यक है ! संगठन के अभाव के कारण ही भ्रष्टाचार, सामाजिक विषमता आदि दिखाई देती हैं ! पराक्रमी इतिहास की पुनरावृत्ति हो ! विनम्र अभिवादन ! 

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क्रांतिदूत: पराभव की छाया में आत्मविश्वास का सूर्योदय – हिन्दू साम्राज्य दिवस
पराभव की छाया में आत्मविश्वास का सूर्योदय – हिन्दू साम्राज्य दिवस
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