कोई बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी |

भारत प्राचीन देश है, इसका आदि पता नहीं ! कहते हैं अट्ठाईसवां युग है ! उसके भी युगाव्द ५११४ बीत चुके हैं ! राम और कृष्ण तो इस कलियुग के भ...


भारत प्राचीन देश है, इसका आदि पता नहीं ! कहते हैं अट्ठाईसवां युग है ! उसके भी युगाव्द ५११४ बीत चुके हैं ! राम और कृष्ण तो इस कलियुग के भी पूर्व के अर्थात लाखों वर्षों का इतिहास ! कोई भी चिंतन, परम्परा संस्कृति कुछ वर्षों में नहीं वनती ! जिस प्रकार संविधान में परिवर्तन होते रहते हैं, उस प्रकार संस्कृति में परिवर्तन संभव नहीं ! छोटे छोटे आघातों से इस प्रकार बनी संस्कृति अप्रभावित रहती है ! भारत मृत्युंजय है ! हम गर्व से कहते हैं कि हम अमृतपुत्र हैं ! दाहिर राजा की कन्याओं ने वलिदान दिया ! पद्मिनी के साथ हजारों महिलाओं ने जौहर किया ! शरीर समाप्त हुआ पर आत्माएं तो आती रहीं ! देवभूमि, पुण्यभूमि, महामंगल भूमि, मोक्ष भूमि ! यह केवल गपोडबाजी या अहंकार नहीं, सिद्ध हो चुका है ! जो दुर्बल थे, वे विश्व रंगमंच पर समाप्त हो गए ! नाम सुनते हैं पर वे संस्कृति लुप्त हो गईं ! रोम, ग्रीक, मिश्र, यूनान कौन जानता है अब ?

यूनान मिश्र रोमां, सब मिट गए जहां से,
कोई बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी !

आकाश की बिजली के समान कुछ समय चमक कर ये चले गए ! सिकंदर विश्व विजय की कल्पना से निकला ! भारत नहीं आता तो कर भी लिया था ! वह आज कहाँ है ? बेबीलोनिया की सभ्यता हजारों साल पहले ही खत्म हो गई ! रोमन साम्राज्य जो कभी वैभव, संपन्नता, प्रभुत्व के चरम पर था, देश समाप्त, सभ्यता समाप्त ! क्या वे सभ्यतायें जहां पनपी, वो भूमि अब नहीं है, समुद्र के अंदर चली गई हैं ? ऐसा नहीं है ! फिर उनमें से क्या गया ? उनकी परम्पराएं समाप्त हो गईं !

किन्तु हम जीवित हैं ! थोड़ा पीछे की तरफ देखें ! राम हमारे इतिहास पुरुष, आराध्य ! लंका विजय हेतु चले तो रामेश्वरम में रेत का शिवलिंग बनाकर उसका पूजन किया ! यह काल गणना के अनुसार साढे सत्रह लाख वर्ष पूर्व के त्रेतायुग की घटना ! उस समय का समाज शिव का आराधक था, आज भी है ! ५००० वर्ष पूर्व श्री कृष्ण गोपियों के साथ होली खेलते थे ! होली मनाने की परम्परा तब से आज तक है और आगे कब तक रहेगी, कहा नही जा सकता ! हमारे आराध्य, हमारी परम्परा शास्वत हैं !

संस्कृति सबकी एक चिरंतन, खून रगों में हिन्दू है !

अन्य परम्पराएं समाप्त हो गईं, पर हम हैं ! इसका मूल कारण यह है कि दुनिया में जितने भी संघर्ष हुए वे राज्यों के लिए हुए ! राजा समाप्त तो राज्य समाप्त ! भारत को लूटकर जाने बाले सोचते थे कि इन की संपत्ति लूट ली तो ये समाप्त हो जायेंगे ! उनको लगा कि इन्हें मंदिरों के कारण शक्ति मिलती है तो मंदिर तोड़े, पर समाज समाप्त नहीं हुआ ! महमूद गजनवी ने सोलह बार सोमनाथ को तोड़ा, पर हर बार बह नवनिर्मित हो पहले से विशाल बन जाता ! नालंदा ग्रंथालय जला दिया गया ! राजा को मार दो, संपत्ति लूट लो, मंदिर तोड़ दो, ग्रंथों को जला दो, ये समाप्त हो जायेंगे ! पर यह नहीं हुआ ! समाज जीवन अखंड चलता रहा ! कुछ दुर्बल पराजित हो यहीं के हो गए, समाज जीवन के अंग बन गए ! 

सौ वर्ष पूर्व यू. एन. ओ. का गठन हुआ ! राष्ट्रों का संघ ! राष्ट्र और राज्य का घालमेल ! राज्य व्यवस्था है जो किसी देश के नागरिकों का नियमन करती है ! पारस्परिक संघर्ष ना हों, वाह्य शक्तियां आक्रमण न कर सकें, क्षेत्र का समाज सुखपूर्वक जीवन यापन कर सके, यह राज्य व्यवस्था है ! यू. एन. ओ. वस्तुतः राज्यों का संघ है ! राज्य का क्षेत्र, कार्य प्रणाली, विचार प्रणाली बदलती रहती है, जबकि राष्ट्र लंबी प्रक्रिया से निर्मित होते हैं ! साथ रहते रहते जीवन जीने की पद्धति, विचार, पूर्वज, उनके प्रति श्रद्धा, वाह्य शक्तियों के प्रति समान शत्रु मित्र भाव, चिरंतन विचार के प्रति प्रतिवद्धता, यही राष्ट्र का मूल भाव है !

वेद और उसके ज्ञान विज्ञान को पश्चिम भले ही आठ हजार वर्ष पूर्व का माने, किन्तु उसे विकसित होने में हजारों वर्ष लगे होंगे ! यूनान मिश्र रोमां की आधार व्यवस्था राज्य ही थे ! राजा और राज्य परम्परा खतम तो बह व्यवस्था स्वतः खतम ! हमारे यहाँ राजा केंद्रित व्यवस्था नहीं थी ! आदर्श व्यवस्था थी – “ना राज्यं, न च राजासीत, न दण्डयो न च दाण्डिकः” ! ना राज्य, ना राजा,ना दंड व्यवस्था, ना दंड देने बाला ! तो कैसे संचालित होता था तंत्र ? चिरंतन विचार से ! बह क्या ? सृष्टि का उदय, ईश्वर की रचना, अव्यक्त से व्यक्त होने की कल्पना ! एकोहं बहुश्यामः ! यही मूल विचार ! सारी दुनिया में जो कुछ है, जीव जंतु से मनुष्य तक, सूर्य, चन्द्र, गृह, उपग्रह, ये सब ईश्वर की अभिव्यक्ति, अंश !

बच्चे गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करते ! साधू संत, मठ मंदिरों की मालिका ! १८ पुराण कब लिखे गए पता नहीं ! व्यास कब हुए किसे मालूम ! इन आस्थाओं को तोड़ा नहीं जा सकता ! “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का विचार उसमें से ही निकला ! सब एक और सबके अंदर एक ही आत्मा ! ज्ञानदेव की चुनौती – भेंसे से वेदपाठ कराया ! नामदेव भोजन करने बैठे और कुत्ता रोटी लेकर भागा तो ये घी की कटोरी लेकर पीछे पीछे – प्रभु रूखी रोटी क्यों खाते हो घी तो लगा लेने दो ! सबमें बही है, यह भाव प्रबल !

एक पौराणिक आख्यान है ! ब्रह्माजी ने देवताओं और राक्षसों को एक साथ भोजन पर बुलाया ! राक्षसों ने पहले खाने की जिद की तो पहले राक्षसों को षटरस व्यंजन परोसे गए ! किन्तु एक अजीब शर्त रख दी गई ! कोहनी को लकड़ी से बाँध दिया गया और कहा गया कि बिना कोहनी मोडे खाओ ! क्या विचित्र द्रश्य सामने आया ! राक्षस ऊपर से भोजन को मुंह में गिराते, आधा मुंह में जाता तो आधा या तो जमीन पर गिरता अथवा नाक गाल पर ! सबकी शक्ल विदूषकों जैसी हो गई !
अब देवताओं की बारी थी ! ये दो पंक्तियों में बैठे और प्रत्येक ने स्वयं ना खाकर सामने वाले को खिलाया ! सबने छककर भरपेट भोजन किया ! 

जो सबका विचार करके भोजन करे बह संस्कृति, स्वयं भोजन करना प्रकृति, दूसरे का छीनकर खाना विकृति ! बसुधैव कुटुम्बकम ! ग्लोबलाईजेशन में बह भाव नहीं है ! बह तो एक समझौता है ! डंकल समझौता ! परिवार में क्या समझौते होते हैं ? हमारे यहाँ समाज एक राष्ट्र पुरुष अतः समरस समाज की कल्पना ! एकात्म समाज से वसुधैव कुटुम्बकम ! इस चिरंतन विचार के कारण ही परकीय बैचारिक आक्रमणों के बाद भी हम कह सकते हैं की – कोई बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी !

यहाँ राजा के अधीन सब कुछ नहीं था ! यह प्रक्रिया अंग्रेजों के आने के बाद प्रारम्भ हुई ! पंचायतें, जातीय पंचायतें फिर राज्य स्तरीय व्यवस्था थी ! स्वतन्त्रता का आंदोलन भी राजनैतिक व्यवस्था परिवर्तन के लिए कभी नही रहा ! तिलक ने गणेशोत्सव, राम नवमी, शिवाजी जयन्ती प्रारम्भ कीं ! राक्षसों का संकट मिटाने के लिए विश्वामित्र ने राजकुमारों से उनका निवारण करबाया ! राम और रावण, कृष्ण और कृष्ण, कौरव पांडव युद्ध भी सत्य और असत्य, व्यष्टि और समष्टि का युद्ध था ! कंस से प्रताडित ग्वालों का युद्ध था !

संत कभी भी सीमा में नहीं बंधे ! वे देश के एक कोने से दूसरे कोने तक स्वच्छंद विचरण करते थे ! कौपीनधारी का स्वागत राजा भी करता था ! दरबार में गद्दी छोड़ देता था ! शिवाजी ने पराक्रम से बनाया राज्य समर्थ रामदास की झोली में डाल दिया और आगे उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया ! यही सांस्कृतिक चेतना हमारा आधार है !

प्राचीनकाल से मृत्यु भय का कारण नही रही ! मदनलाल ढींगरा फांसी के तख्ते पर गीता हाथ में लेकर बोले – भारत मां की बेडियाँ ना कट जाएँ तब तक बार बार जन्म लूं ! हम जियेंगे तो सर्वे भवन्तु सुखिनः के महत उद्देश्य के लिए ! चींटी से लेकर हाथी तक के भोजन की व्यवस्था ! पहले अतिथि को भोजन की परम्परा ! हमारा चिरंतन विचार – हम ईश्वर की संतान ! सबमें आत्मरूप, पर पीड़ा को सबसे अधम समझने की भावना ! इस सांस्कृतिक अवधारणा के कारण हम चिरंतन ! संस्कृति के परिष्कार की व्यवस्था ! किसी भी मार्ग से ईश्वर तक पहुँचाने की अवधारणा –

रुचीनां वैचित्र्या द्रजुकुटिल नानापथजुषाम,

नृणामेकोगम्यस्त्वमसिपय सामर्णव इव !

संघर्ष का कारण सदैव सत्य और असत्य, इसी कारण अपराजेय !

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