प्राकृतिक आपदाओं एवं सरकारी उपेक्षा के चलते अपने वजूद की लड़ाई लड़ता ब्रह्मपुत्र नदी का द्वीप माजुली

असम के जोरहाट जिले में ब्रह्मपुत्र के बीच स्थित दुनिया के सबसे बड़े ताज़ा पानी के द्वीप में से एक द्वीप माजुली अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा ...


असम के जोरहाट जिले में ब्रह्मपुत्र के बीच स्थित दुनिया के सबसे बड़े ताज़ा पानी के द्वीप में से एक द्वीप माजुली अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है ! माजुली जोरहाट शहर से 20 किलोमीटर दूर ब्रह्मपुत्र नदी का यह समृध्द सांस्कृतिक विरासत वाला द्वीप है ! सत्ता में आने वाली राजनीतिक पार्टियों की उपेक्षा से इस द्वीप के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा हुआ है ! माजुली को बाढ़ और भूमिकटाव से बचाने के लिए दो एजंसियां हैं ! लेकिन किसी ने भी अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं की है ! यही वजह है कि माजुली का काफी हिस्सा नदी में समा गया है !

कहा जाता है असम की सांस्कृतिक राजधानी

माजुली प्राकृतिक और मानवजनित कारणों से दिन प्रतिदिन सिकुड़ रहा है ! माजुली को असम की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है एवं यह पूर्वी असम का नव वैष्णव विचारधारा का मुख्य केंद्र है ! इस स्थान पर साल भर कोई ना कोई उत्सव चलता रहता है ! साल दर साल ब्रह्मपुत्र का जलस्तर बढ़ने से ये छोटा सा द्वीप धीरे धीरे नदी में समा रहा है ! माजुली में सन्यासियों द्वारा बसाये गए कई मठ है, जिनमे से कुछ प्रकृति की मार से बच शेष नहीं है ! वर्ष १८५३ में माजुली का कुल क्षेत्रफल १२४६ वर्ग किमी (४८३ वर्ग मील) था ! परन्तु प्रतिवर्ष बाढ़ और भूकटाव के चलते यह सिमट कर (२००१ के सर्वे के अनुसार) मात्र ४२१.६५ वर्ग किमी (१६३ वर्ग मील) रह गया है ! इस द्वीप के 23 गांवों में लगभग डेढ़ लाख लोग निवासरत हैं !

यह द्वीप अपने वैष्णव सत्रों के अलावा रास उत्सव, टेराकोटा और नदी पर्यटन के लिए मशहूर है ! मिसिंग,देउरी, सोनोवाल, कोच, कलिता, नाथ, अहोम,नेराली और अन्य जातियों की मिली-जुली आबादी वाले माजुली को मिनी असम और सत्रों की धरती भी कहा जाता है ! असम में फैले लगभग 600 सत्रों में 65 माजुली में ही थ ! राज्य में वैष्णव पूजास्थलों को सत्र कहा जाता है !

माजुली द्वीप के दक्षिण में ब्रह्मपुत्र नदी और उत्तर में खेरकुटिया खूटी नामक धारा अवस्थित है ! खेरकुटिया खूटी ब्रह्मपुत्र नदी से निकलती है और आगे चलकर फिर उसी में प्रवेश करती है ! उत्तर में सुबरनसीरी नदी खेरकुटिया खूटी से जुड़ जाती है ! माजुली द्वीप कालांतर में ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों विशेषकर लोहित नदी के दिशा और क्षेत्र परिवर्तन की वजह से बनी है ! माजुली का जिला मुख्यालय जोरहाट शहर है जो यहाँ से २० किमी की दूरी पर है ! माजुली जाने के लिए फेरी लेना जरुरी है क्योंकि यहाँ नदी पर पुल नहीं है ! असम की राजधानी गुवाहाटी से माजुली द्वीप लगभग २०० किलोमीटर पूर्व में है !

माजुली के विनाश की कहानी

ऐतिहासिक ग्रंथों में उल्लेख और लोककथाओं से पता चलता है कि १६६१-१६९६ की अवधि में लगातार भूकंप आये थे और इस वजह से कई विनाशकारी बाढ़ आई ! इसी तरह की एक भयंकर बाढ़ १७५० में आई जिसने १५-२० दिनों तक तबाही मचाई थी ! इसी बाढ़ की वजह से ब्रह्मपुत्र दो भागों में विभक्त होकर पुन: प्रवेशी सोतों में बदल गयी ! इनमे से एक मुख्य धारा उत्तर की तरफ से बहने लगा जबकि दूसरा दिहिंग नदी के साथ मिलकर दक्षिण की ओर से बहने लगा और माजुली द्वीप विशाल भूखंड बन गया ! कालांतर में उत्तरी चैनल जहाँ ब्रह्मपुत्र का मुख्य धारा थी, वहाँ के प्रवाह में कमी आई और इसे लुईत खूटी फिर खेरकटिया खूटी कहा जाने लगा ! दक्षिणी चैनल जहाँ से दिहिंग नदी ब्रह्मपुत्र के एक अन्य धारा के साथ बहती थी, समय के साथ उसका भूकटाव के कारण विस्तार होता गया और यह ब्रह्मपुत्र की मुख्य धारा बन गयी !

मिट्टी और रेत के लगातार जमाव से यह भूमि उपजाऊ होने लगी और एक बड़े हिस्से को जन बसती के लिए उपयुक्त बनाया ! प्राकृतिक संसाधनों के विविध रूपों ने इस जगह के समग्र पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है !

माजुली में रहते है अधिकतर विलुप्त आदिवासी जातियों के लोग

इस द्वीप पर रहनेवाले लोगों में से अधिकतर लोग विलुप्त आदिवासी जातियों के है जो बहुत पहले अरुणाचल प्रदेश से पलायन करके आ गए थे ! इन्होनें माजुली के शानदार सांस्कृतिक विरासत के लिए अमूल्य योगदान दिया है ! द्वीप में ४७% जनसंख्या अनुसूचित जनजाति की है जिनमें मिसिंग, देउरी और सोनोवाल-कछारी शामिल हैं ! माजुली की आबादी में असमिया के अन्य जाति उपजाति जैसे-कलिता, कोंच, नाथ, अहोम, चुतिया, मटक और ब्राह्मण भी रहते हैं ! इन के अलावा, कमोवेश संख्या में चाय जनजाति के लोग, नेपाली, बंगाली, मारवाड़ी और मुसलमान भी वर्षों से यहाँ बसोवास कर रहे हैं !

माजुली में मिसिंग समुदाय के लोगों की संख्या लगभग ६८,००० के आसपास है (२०११ जनगणना के आधार पर) मिसिंग जनजाति को “मिरी” भी पुकारा जाता है ! यह संख्या द्वीप की कुल आबादी का ४१ प्रतिशत है ! मिसिंग समुदाय के लोग वास्तव में बर्मा(वर्तमान म्यांमार) से ताल्लुक रखने वाले मंगोल मूल के लोग हैं ! लगभग ७०० साल पहले वे बेहतर जीवन की तलाश में अरुणाचल प्रदेश के रास्ते होते हुए असम आये और ब्रह्मपुत्र नदी के सहायक नदियों जैसे दिहिंग, दिसांग, सुवनशिरी, दिक्रंग के इर्द गिर्द बसने लगे ! इसी क्रम में माजुली में भी मिसिंग समुदाय के लोग बहुतायात में बस गए ! नदी के किनारे बसने के कारण वे बहुत कुशल नाविक और मछुआरे होते हैं ! माना जाता है कि हर दूसरा मिसिंग बच्चा बढ़िया तैराक होता है ! ये लोग नदीकिनार की ज़िन्दगी के आदी हो गए हैं और नदी को अपना जीवनदाता मानते हैं ! नदी की विभीषिका और इससे उपजने वाली विषम परिस्थितियों को ये जीवन का अंग मानते हैं आजीवन इससे संघर्ष करते हैं !

विश्व धरोहरों की सूची में माजुली को स्थान दिलाने के सभी प्रयास हुए है असफल

विश्व धरोहरों की सूची में माजुली को स्थान दिलाने हेतु भी तमाम प्रयास किये जा चुके है परन्तु यह प्रयास अभी तक असफल रहे है ! यूनेस्को की बैठकों के दौरान राज्य सरकार ने या तो ठीक से माजुली की पैरवी नहीं की या फिर आधी-अधूरी जानकारी मुहैया कराई जिसके कारण यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा देने का अनुरोध ठुकरा दिया है ! राज्य सरकार ने इस द्वीप को बचाने की पहल के तहत कुछ साल पहले माजुली कल्चरल लैंडस्केप मैनेजमेंट अथारिटी का गठन किया था ! बावजूद इसके इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हुआ है !

यहाँ के लोगों का जीवन बेहद काठी है ! प्रति वर्ष बारिश के मौसम में तो यहाँ कमर तक पानी भर जाता है ! एक गांव से दूसरे गांव तक जाने का रास्ता टूट जाता है और दूरसंचार सुविधायें भी काम नहीं करती ! बाढ़ और भूमिकाटव की वजह से इसका कुछ हिस्सा हर साल नदी के साथ बह जाता है ! अब तो यह घट कर आधा रह गया है ! बरसात के चार महीनों के दौरान बाहरी दुनिया से इस द्वीप का संपर्क कट जाता है और लोगों का जीवन दूभर हो जाता है ! इस द्वीप की अस्सी फीसदी आबादी रोजी-रोटी के लिए खेती पर निर्भर है ! माजुली में बाढ़ हर साल आती है, परन्तु माजुलिवासियों को कोई भी सहायता नहीं मिलती है !

राज्य में एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने इस ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया ! नतीजतन जिस माजुली को दुनिया के सबसे आकर्षक पर्यटन केंद्र के तौर पर विकसित किया जा सकता था वह आज अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है ! यहां पर्यटन का आधारभूत ढांचा तैयार करने में किसी ने कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई ! द्वीप पर समुचित सुविधाओं का भारी अभाव है ! अगर सरकार ने समय रहते व्यवस्था की होती तो इस द्वीप को नदी में डूबने से बचाया जा सकता था !

माजुली के बारे में एक दिलचस्प तथ्य

माजुली के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि माजुली में जितनी नावें हैं उतनी शायद इटली के वेनिस में भी नहीं हैं ! द्वीप का कोई भी घर ऐसा नहीं है जहां नाव न हो ! नावें यहाँ के लोगों के जीवन का अभिन्न अंग ! लोग कार, टेलीविजन और आधुनिक सुख-सुविधा की दूसरी चीजों के बिना तो रह सकते हैं लेकिन नावों के बिना नहीं ! हर साल आने वाली बाढ़ पूरे द्वीप को डुबो देती है ! इस दौरान अमीर-गरीब और जाति का भेद खत्म हो जाता है ! महीनों तक नावें ही लोगों का घर बन जाती हैं ! उस समय माजुली में आवाजाही का एकमात्र साधन भी लकड़ी की बनी यह नौकाएं ही होती हैं ! अगर इस द्वीप को बचाने के लिए जल्दी ही ठोस कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नहीं है जब यह धरोहर पूरी तरह ब्रह्मपुत्र में समा जाएगी !


ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी और दक्षिणी किनारों पर दलदली इलाकें हैं जो की ऐसे जल प्रणाली की विशेषता होती है ! ऐसे दलदली इलाकों को यहाँ की भाषा में “बील” कहते हैं ! ये बील वनस्पतियों और जीव के प्रजनन और विकास के लिए उत्तम वातावरण प्रदान करते हैं !

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क्रांतिदूत: प्राकृतिक आपदाओं एवं सरकारी उपेक्षा के चलते अपने वजूद की लड़ाई लड़ता ब्रह्मपुत्र नदी का द्वीप माजुली
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क्रांतिदूत
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