भारतीय वीर जवान जसवंत सिंह जिसे शहीद होने के बाद भी मिलती है पदोन्नति और अवकाश

यह सच्ची गाथा है एक वीर सैनिक की ! भारत मां के इस सच्चे सपूत की जिंदगी तो देश की रक्षा के लिए समर्पित थी ही, यह सैनिक शहीद होने के बाद भ...

यह सच्ची गाथा है एक वीर सैनिक की ! भारत मां के इस सच्चे सपूत की जिंदगी तो देश की रक्षा के लिए समर्पित थी ही, यह सैनिक शहीद होने के बाद भी आज तक सीमा की सुरक्षा में लगा है ! यह जांबाज सैनिक था जसवंत सिंह रावत ! इसकी बहादुरी के चलते सेना ने जसवंत के शहीद होने के 40 साल बाद रिटायरमेंट देने की घोषणा की ! इस बीच जसवंत को पदोन्नति भी दी जाती रही ! देश के इतिहास में यह एक मात्र उदाहरण है ! वह सिपाही के रूप में सेना से जुड़े और सूबेदार के पद पर रहते हुए शहीद हुए और अब वो मेजर की पोस्ट पर कार्यरत है !

महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह ने वर्ष 1962 में हुए युद्ध में अकेले ही चीन की सेना को 72 घंटो तक रोके रखा था ! अरूणाचल में इस जवान को बाबा के नाम से पुकारा जाता है और वहां जसवंत बाबा का मंदिर भी है ! जसवंत देशभर में अकेले ऐसे सैनिक रहे जिन्हें मरने के बाद भी प्रमोशन और सालाना छुट्टियां मिलती रही ! राइफलमैन से वो अब मेजर जनरल बन चुके हैं ! वहां बिना बाबा को याद किए सैनिक राइफल नहीं उठाते ! बाबा की याद में वहां एक मंदिर बनाया गया है ! 

जसवंत सिंह के लिए बनाए गए कमरे में आज भी उनके जूतों को पॉलिश करके रखा जाता है ! उनके कपड़ों को भी धोकर और प्रेस कर रखा जाता है ! लोगों का कहना है कि रात में रखे गए जूते और कपड़ों को जब सुबह देखा जाता है तो ऎसा लगता है कि उनका इस्तेमाल किया गया है ! कपड़े मैले और जूते गंदे मिलते हैं ! जसवंत सिंह के लिए हर रोज बिस्तर भी लगाया जाता है ! यह बिस्तर भी सुबह ऎसा लगता है कि यहां कोई सोया था ! लोगों का मानना है कि क्योंकि सुबह चादर में सिलवट होती है ! कमरे में प्रेस कर रखी गई शर्ट भी मैली होती है !

भारत और चीन के बीच नवंबर 1962 में हुए युद्ध में चौथी गढ़वाल राइफल इंफेंटरी रेजीमेंट के जसवंत सिंह 10000 फीट की ऊंचाई पर स्थित नूरानांग पोस्ट पर तैनात थे ! चीनी सेना तवांग जिले से होते हुए नूरानांग तक पहुंच गई ! 17 नवंबर को चीनी और भारतीय सेना में नूरानांग में लड़ाई छिड़ गई ! इस लड़ाई में लांस नायक त्रिलोकी सिंह नेगी, परमवीर चक्र विजतेा जोगिंदर सिंह और राइफलमैन गोपाल सिंह गोसाई सहित अन्य सैनिक शहीद हो गए ! इससे सारी जिम्मेदारी जसंवत सिंह पर आ पड़ी ! सेला टॉप के पास की सड़क के मोड़ पर वह अपनी लाइट मशीन गन के साथ तैनात थे ! चीनियों ने उनकी चौकी पर बार-बार हमले किए लेकिन उन्होंने पीछे हटना क़बूल नहीं किया !

जसवंत सिंह ने गजब का शौर्यप्रदर्शन करते हुए लगातार 3 दिनों तक चीनी सेना से मुकाबला किया ! जसवंत सिंह ने समझदारी का परिचय देते हुए अलग-अलग बंकरों से जा कर गोलीबारी की ! रायफलमैन जसवंत सिंह रावत ने मोर्चा सम्भाल लिया ! वहां पर पांच बंकरों पर मशीनगन लगायी गयी थी और रायफलमैन जसवंत सिंह छिप छिपकर और कभी पेट के बल लेटकर दौड़ लगाते रहे और कभी एक बंकर से तो कभी दूसरे से और तुरन्त तीसरे से और फिर चैथे से, अलग अलग बंकरों से शत्रुओं पर गोले बरसाते रहे !

पूरा मोर्चा सैकड़ों चीनी सैनिकों से घिरा हुआ था और उनको आगे बढ़ने से रोक रहा था तो जसवंत सिंह का हौसला, चतुराई भरी फुर्ती, चीनी सेना यही समझती रही कि हिंदुस्तान के अभी कई सैनिक मिल कर आग बरसा रहे हैं ! जबकि हकीकत कुछ और थी, इधर जसवंत सिंह को लग गया था कि अब मौत निश्चित है अतः प्राण रहते तक माँ भारती और तिरंगे की आन बचाए रखनी है ! जितना भी एमुनिशन उपलब्ध था, समाप्त होने तक चीनियों को आगे नहीं बढ़ने देना है ! रणबांकुरा बिना थके, भूखे-प्यासे पूरे 72 घंटे (तीन दिन तीन रात) तक चीनी सेनाओं की नाक में दम किये रहा ! जब उनको लगा कि चीनी उन्हें बंदी बना लेंगे तो उन्होंने अंतिम बची गोली से अपने आप को निशाना बना लिया !

उनके बारे में एक और कहानी प्रचलित है. पीछे हटने के आदेश के बावजूद वह 10000 फीट की ऊंचाई पर मोर्चा संभाले रहे ! वहाँ उनकी मदद दो स्थानीय बालाओं सेला और नूरा ने की ! इन दोनो लड़कियों को भी सम्मान दिया गया ! यहां के एक दर्रे का नाम शैला रखा गया और हाईवे का नाम नूरा ! 

उनको राशन पहुँचाने वाले एक व्यक्ति ने चीनियों से मुख़बरी कर दी कि चौकी पर वह अकेले भारतीय सैनिक बचे हैं ! यह सुनते ही चीनियों ने वहाँ हमला बोला ! चीनी कमांडर इतना अधिक क्रोधित था कि उसने जसवंत सिंह का सिर धड़ से अलग कर दिया और उनके सिर को चीन ले गया ! लेकिन वह चीनी कमांडर भी जसवंत सिंह की बहादुरी से इतना प्रभावित हुआ कि लड़ाई ख़त्म हो जाने के बाद उसने जसवंत सिंह की प्रतिमा बनवाकर भारतीय सैनिकों को भेंट की जो आज भी उनके स्मारक में लगी हुई है ! 

पहली चाय की प्याली का भोग जसवंत बाबा को

जसवंत सिंह के स्मारक को देखने आने वालों के लिए सिख रेजीमेंट चाय, नाश्ता और भोजन की व्यवस्था करती है ! जसवंत सिंह की शहादत के सम्मान में चाय की पहली प्याली, नाश्ते की प्लेट और भोजन का पहला भोग उनको लगाया जाता है ! इसके बाद ही वहां उपस्थित लोग चाय, नाश्ता और भोजन करते हैं ! यही नहीं जसंवत सिंह को सुबह 4.30 बजे चाय, 9 बजे नाश्ता और शाम 7 बजे भोजन परोसा जाता है ! इस काम और देखरेख के लिए यहां चौबीसों घंटे 5 सैनिक डयूटी देते हैं !

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क्रांतिदूत: भारतीय वीर जवान जसवंत सिंह जिसे शहीद होने के बाद भी मिलती है पदोन्नति और अवकाश
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