विलुप्ति की कगार पर संपाति और जटायु के वंशज

भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ अरुण के छोटे भाई हैं ! धर्म ग्रंथों में अरुण की दो संतानें बताई गई हैं- जटायु और संपाति ! जटायु और संपाती द...

भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ अरुण के छोटे भाई हैं ! धर्म ग्रंथों में अरुण की दो संतानें बताई गई हैं- जटायु और संपाति ! जटायु और संपाती दोनों विंध्याचल पर्वत की तलहटी में रहने वाले निशाकर ऋषि की सेवा करते थे ! वृत्रासुर का छलकपट से वध कर लौटते समय इंद्र की भेंट इन दोनों से हुई ! इंद्र के छलकपटपूर्ण व्यवहार को लेकर इनकी इंद्रा से बहस हुई और फिर युद्ध हुआ ! इस युद्ध में इंद्र ने अपने वज्र के प्रहार से संपाति को घायल कर दिया और जटायु का पीछा किया, तब संपाति ने अपने पंख फैलाकर भाई जटायु की रक्षा की ! इस युद्ध में अत्याधिक घायल हुए जटायु बस्ती में और संपाति निशाकर ऋषि के आश्रम के पास गिरे ! 

'वाल्मी‍कि रामायण' के अनुसार सीता का हरण कर रावण जब लौट रहा था तो जटायु ने पहले रावण को उपदेश देकर समझाया जटायु द्वारा रावन को दिए गए उपदेश में रावण को वेदतत्व बताकर परायी स्त्री का अपहरण करना पाप बताया ! जटायु ने रावन से कहा - 'हे रावण किसी पराई स्त्री का जबरन अपहरण करना महा पाप है अतः तुम सीता को छोड़ दो, अगर तुम ऐसा नहीं करते तो इसका परिणाम अच्छा न होगा !' रावण जटायु की बात नहीं माना, तब दोनों में युद्ध हुआ ! जटायु ने अपने नाखूनों और चोंच से रावण को घायल कर दिया ! रावण ने भी जटायु के पंख काटकर उसे अधमरा करके छोड़ दिया और सीता को लेकर चला गया ! राम-लक्ष्मण जब सीता माता को खोजते हुए जटायु के पास पहुंचे तब जटायु ने उन्हें माता सीता की जानकारी दी और प्राण त्यागे ! स्वयं भगवान् श्री राम ने जटायु का दाह-संस्कार किया !

संपाति के पुत्र सुपार्श्व ने भी सीता माता का अपहरण कर ले जा रहे रावण को रोका और उससे युद्ध के लिए तैयार हो गया ! किंतु रावण के गिड़गिड़ाने पर वहाँ से बचकर निकल आया ! सीता माता की खोज करते हुए जब अंगद और अन्य राम भक्त संपा‍ति से मिले तो उन्होंने जटायु की मृत्यु का समाचार दिया ! संपा‍ति ने तब अंगद को रावण द्वारा सीता हरण की पुष्टि की और अपनी दूरदृष्टि से देखकर बताया कि वह अशोक वाटिका में सुरक्षित बैठी हैं ! रामकथा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्ध-बंधु संपाति और जटायु अमरत्व को प्राप्त हुए ! गिद्ध या गरुड़ को विष्णु की सवारी माना जाता है और यह भगवान् विष्णु के ध्वज के शीर्ष पर विद्यमान है !

आज जटायु और संपाती के वंशज गिद्ध विलुप्ति की कगार पर है ! दिनों दिन इनकी संख्या में कमी आ रही है ! गिद्ध हमारे वनों में पर्यावरण को शुद्ध और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं ! गिद्ध पक्षी जगत का एक बड़ा पक्षी है और यह जंगल में जानवरों को खाकर पर्यावरण को प्रदूषित होने से रोकता है ! गिद्ध अपमार्जक होते है और यह ऊँची उड़ान भरकर इंसानी आबादी के नज़दीक या जंगलों में मृत पशु को ढूंढ लेते हैं और उनका आहार करते हैं ! इनके चक्षु बहुत तीक्ष्ण होते हैं और काफ़ी ऊँचाई से यह अपना आहार ढूंढ लेते हैं ! यह प्रायः समूह में रहते हैं ! भारतीय गिद्ध का सर गंजा होता है, उसके पंख बहुत चौड़े होते हैं तथा पूँछ के पर छोटे होते हैं ! इसका वज़न ५.५ से ६.३ कि. होता है। इसकी लंबाई ८०-१०३ से. मी. तथा पंख खोलने में १.९६ से २.३८ मी. की चौड़ाई होती है ! गिद्द के पंखों का रंग हल्का मटमैला होता है ! पंखों के अंदर एक सफेद रंग का पट्‍टा होता है !

उंचाई पर उड़ता हुआ गिद्ध जब किसी पशु शव को देखता है तो वह पशु शव की ओर तेज गति से आता है अपने साथी की यह क्रिया देख अन्य गिद्ध भोजन उपलब्ध होने का अनुमान लगा लेते हैं और कुछ ही समय में बड़ी संख्‍या गिद्ध वहाँ पहुँच जाते हैं ! गिद्ध पशु शव का मांस अत्यंत तीव्र गति से खाते हैं और कुछ ही समय में पशु शव के स्थान पर केवल हड्‍डियों का कंकाल शेष नजर आता है !

'प्राकृतिक सफाई दरोगा' कहे जाने वाले भारतीय गिद्ध कुछ वर्षों पूर्व तक प्रचुर मात्रा में पाए जाते थे ! १९९० के दशक में इस जाति का ९७% से ९९% पतन हो गया है ! इसका प्रमुख कारण पशु दवाई डाइक्लोफिनॅक (diclofenac) है जो कि पशुओं के जोड़ों के दर्द को मिटाने में मदद करती है ! जब यह दवाई खाया हुआ पशु मर जाता है और उसको मरने से थोड़ा पहले यह दवाई दी गई होती है और उसको भारतीय गिद्ध खाता है तो उसके गुर्दे बंद हो जाते हैं और वह मर जाता है ! अब नई दवाई मॅलॉक्सिकॅम (meloxicam) बाजार में उपलब्ध है ! यह गिद्धों के लिये हानिकारक भी नहीं हैं ! जब इस दवाई का उत्पादन बढ़ जायेगा तो सारे पशु-पालक इसका इस्तेमाल करेंगे और शायद गिद्ध बच जायें ! शहरी क्षेत्रो में बढता प्रदूषण, कटते वृक्षों से गिद्धो के बसेरे की समस्या भी इस शानदार पक्षी को बड़ी तेजी से विलुप्ती के कगार पर धकेल रही है !
रेगिस्तानी इलाकों के मुख्यतया पाए जाने वाले गिद्धों की संख्या सिर्फ गुजरात में ही 2500 से घटकर 1400 रह गई है ! कभी राजस्थान व मध्यप्रदेश में भी गिद्ध भारी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन अब बिरले ही कही दिखाई देते हों ! गिद्धों की जनसंख्या को बढ़ाने के सरकारी प्रयासों को मिली नाकामी से भी इनकी संख्या में गिरावट आई है ! 

गिद्ध दीर्घायु होते हैं लेकिन प्रजनन में बहुत समय लगाते हैं ! गिद्ध प्रजनन में ५ वर्ष की अवस्था में आते हैं ! एक बार में एक से दो अण्डे पैदा करते हैं लेकिन अगर समय ख़राब हो तो एक ही चूज़े को खिलाते हैं ! यदि परभक्षी इनके अण्डे खा जाते हैं तो यह अगले साल तक प्रजनन नहीं करते हैं ! यही कारण है कि भारतीय गिद्ध अभी भी अपनी आबादी बढ़ा नहीं पा रहा है !

गर्म क्षेत्रों के लिए गिद्ध सफैकर्मी के रूप में बेहद जरूरी है क्यूँकि इनके आमाशय में बेहद संछारक अम्ल होता है ! यह हैजा एवं एंथ्रेक्स जैसे विषाणुओं को भी नष्ट करता है ! यह मांस अन्य सफाईकर्मी पक्षियों के लिए हानिकारक हो सकता है ! यह अपने आमाशयी अम्ल का उपयोग खुद की रक्षा के लिए भी करते है ! ख़तरा मंडराने पर शत्रु के सम्मुख वामन कर डराते है ! गिद्ध जनसँख्या कमी से स्वच्छता और हाइजीन बनाए रखना आसान नहीं है क्यूँकि अब पशुओं के शव चूहे या कुत्ते खाकर नष्ट करते है जिससे रेबीज के बढ़ने का खतरा रहता है ! 

गिद्धों की लगातार घटती जनसँख्या से पारसी समाज भी बेहद चिंतित है ! इस समाज की परम्परानुसार शव को ऊंची मीनार पर रखा जाता है ! गिद्ध शव का मांस पूरी तरह से खा कर केवल हड्डियों को छोड़ देते है ! इसी प्रकार तिबत्तियों में भी यही परंपरा है ! हाल ही में गिद्धों की कमी से चिंतित पारसी समुदाय के लोगों ने ईराक से बड़ी संख्या में गिद्धों का आयात किया है !    

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