तसलीमा नसरीन द्वारा टाईम्स ऑफ़ इंडिया को दिया गया बेबाक साक्षात्कार |

अब तक लगभग 30 लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिये हैं. सरकार ने उनके इस कृत्य को जबरदस्ती का बनाया हुआ विरोध बताया है । इस...

अब तक लगभग 30 लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिये हैं. सरकार ने उनके इस कृत्य को जबरदस्ती का बनाया हुआ विरोध बताया है । इस विषय पर निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहीं ख्यातनाम लेखिका तसलीमा नसरीन ने टाईम्स ऑफ़ इंडिया के लिए सागरिका घोष को दिए एक साक्षात्कार में अपने विचार व्यक्त किये । भारत में अनेक लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिये है, इसपर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

लेखकों ने अन्याय के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। कभी-कभी किसी एक का विचार दूसरों को भी अच्छा लगता है। क्या आप सरकार के इस अभिमत से सहमत हैं कि यह एक राजनीतिक एजेंडे के तहत विनिर्मित विरोध है? मुझे ऐसा नहीं लगता। लेखक राजनीतिक और सामाजिक रूप से जागरूक लोग हैं। क्या आपको ऐसा लगता है कि जब आपको निशाना बनाया गया तब ये लेखक चुप थे ?
 जब मेरी किताब को पश्चिम बंगाल में प्रतिबंधित कर दिया गया था, जब मेरे खिलाफ भारत में 5 फतवे  जारी किए गए थे, जब मुझे पश्चिम बंगाल से बाहर फेंक दिया गया था, जब मुझे महीनों तक दिल्ली के घर में नजरबंद रखा गया था और भारत छोड़ने के लिए विवश किया गया था, जब मेरे मेगा धारावाहिक को टीवी पर प्रतिबंधित कर दिया गया था, ज्यादातर लेखकों चुप रहे । मैं यहाँ रहने के अधिकार के लिए और अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए अकेले संघर्ष करती रही । वे न केवल चुप रहे, बल्कि सुनील गांगुली और शंख घोष जैसे प्रसिद्ध लेखकों ने मेरी किताब पर प्रतिबंध लगाने के लिए पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य से अपील भी की।

क्या लेखक असंतोष व्यक्त करने को लेकर दोहरा मापदंड अपनाने के दोषी हैं ? हाँ मैं सहमत हूँ। जब असंतोष की बात आती है, तब कई लेखक दोहरा मापदंड अपनाने के दोषी होते हैं। क्या भारत में असहिष्णुता बढ़ रही है – जैसा कि दादरी मामले में दिखा ?

हां, मुझे यही डर है। आपने हाल ही में ट्वीट किया है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता को जिस प्रकार व्यक्त किया जा रहा है, उसके कारण समस्या है ... हाँ। अधिकाँश धर्मनिरपेक्ष लोग मुस्लिम समर्थक और हिंदू विरोधी हैं। वे हिंदू कट्टरपंथियों के कृत्यों का तो विरोध करते हैं, किन्तु मुस्लिम कट्टरपंथियों के जघन्य कृत्यों का बचाव करते हैं । क्या विरोध व्यक्त करने के लिए लेखकों को अपने पुरस्कार वापस करना चाहिए?
 अरे छोडिये जी, वे सयाने लोग हैं । अगर उनकी इच्छा है तो पुरस्कार वापस करें । मैं उन्हें क्या सलाह दे सकती हूँ ।

क्या आपको ऐसा लगता है कि भारतीय प्रधानमंत्री को भारत में मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाली हिंसा को लेकर अधिक संवेदना से बात करनी चाहिए? भारत में राजनेता वोट के लिए मुसलमानों को खुश करने का प्रयत्न करते हैं । मुसलमानों को मिलने वाला यह अतिरिक्त सहयोग कई हिन्दुओं को क्रोध दिलाता है । यह सही है कि कभी कभी मुसलमानों पर केवल मुसलमान होने के कारण अत्याचार होते हैं । लेकिन यह दूसरे धार्मिक समुदाय के लिए भी होता है। 2013 में पश्चिम बंगाल में एक हिंदू गांव कैनिंग को मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा जला दिया गया था | अगर भारत में मुसलमानों को बेरहमी से सताया जा रहा होता तो वे भी उसी प्रकार भारत छोड़ गए होते, जैसे कि विभाजन के बाद से लगातार पडौसी मुस्लिम देश बांग्लादेश और पाकिस्तान से हिंदू अल्पसंख्यक छोड़ते आये हैं ।

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क्रांतिदूत: तसलीमा नसरीन द्वारा टाईम्स ऑफ़ इंडिया को दिया गया बेबाक साक्षात्कार |
तसलीमा नसरीन द्वारा टाईम्स ऑफ़ इंडिया को दिया गया बेबाक साक्षात्कार |
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क्रांतिदूत
http://www.krantidoot.in/2015/10/Indian-writers-guilty-of-double-standards-Taslima-Nasrin.html
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