पानी बना नीला सोना - प्रमोद भार्गव

देश की महत्वपूर्ण रेलों में ‘रेल नीर’ आपूर्ति से जुटे भ्रष्टाचार के संबंध में सीबीआई द्वारा की गई छापेमारी के दौरान घोटाले में भी घोटाला...


देश की महत्वपूर्ण रेलों में ‘रेल नीर’ आपूर्ति से जुटे भ्रष्टाचार के संबंध में सीबीआई द्वारा की गई छापेमारी के दौरान घोटाले में भी घोटाला सामने आया है। इस मामले में बरामद की गई 27 करोड़ की नगद धनराशि में 4 लाख रुपए के नोट जाली मिले हैं। इस मामले में सीबीआई ने आरके एसोसिएटस और वृंदावन फूड प्रोडक्ट के मालिक श्याम बिहारी अग्रवाल और उनके पुत्र अभिषेक अग्रवाल को हिरासत में लिया है। साथ ही भारतीय रेल यातायात सेवा (आईआरसीटीसी) के अधिकारी संदीप सिलास और एमएस चालिया को भी गिरफ्तार किया गया है। ये दोनों मुख्य वाणिज्यिक अधिकारी के पद पर तैनात थे। इन्होंने कैटरिंग ठैकेदार अग्रवाल से सांठगांठ करके राजधानी और शताब्दी जैसी प्रमुख रेलों में रेल नीर की बजाय सस्ता बोतलबंद पानी एवं पाउच उपभोक्ताओं को बेचे। सीबीआई ने जांच के बाद पाया कि आईआरसीटीसी ने फैसला लिया था कि वह निजी कंपनियों को रेल नीर 10.50 रुपए में प्रति बोतल की दर से देगी। उन्हें यह पानी रेलों में 15 रुपए में यात्रियों को देना होगा। किंतु ठेकेदार और रेल अधिकारियों की मिलीभगत से गुणवत्ता की परवाह किए बिना सस्ता बोतलबंद पानी बेचा जाने लगा। इस बोतल की कीमत महज 5.70 रुपए थी। इस गोरख धंधे के चलते 10 साल के भीतर ही ठेकेदार 500 करोड़ का आसामी हो गया।

संविधान के अनुच्छेद-21 में प्रत्येक नागरिक को जीने के अधिकार की मान्यता दी गई है। लेकिन जीने की मूलभूत सुविधाएं क्या हों, इनके औचित्य को तय करने वाले न तो बिंदु तय किए गए और न ही उन्हें बिंदुवार परिभाषित किया गया। इसीलिए आजादी के 68 साल बाद भी जल की तरह भोजन, आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे जीने के बुनियादी मुद्दे पूरी तरह संवैधानिक अधिकार हासिल कर लेने से वंचित हैं। यही वजह रही कि जब 2002 में केंद्र में अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार थी, तब औद्योगिक हितों को लाभ पहंुचाने वाली ‘जल-नीति’ वजूद में लाई गई और पेयजल के दोहन का व्यापार करने की छूट देशी व विदेशी निजी कंपनियों को दे दी गई। भारतीय रेल भी ‘रेलनीर’ नामक उत्पाद लेकर बाजार में उतर आई। इस कारोबार की शुरुआत छत्तीसगढ़ से हुई। यहां शिवनाथ नदी पर देश का पहला बोतलबंद पानी का संयंत्र स्थापित किया गया। इस तरह इकतरफा कानून बनाकर मानव समूहों को जल के सामुदायिक अधिकार से अलग करने का सिलसिला चल निकला। यह सुविधा योरोपीय यूनियन के दबाव में दी गई थी। पानी को विश्व व्यापार के दायरे में लाकर पिछले एक-डेढ़ दशक के भीतर एक-एक कर विकासशील देशों के जल स्त्रोत उन्मुक्त दोहन के लिए इन कंपनियों के हवाले कर दिए गए। विकसित पश्चिमी देशों के लिए इसी योरोपीय यूनयन ने पक्षपाती मानदण्ड अपनाकर ऐसे नियम-कानून बनाए हुए हैं कि विश्व के अन्य देश पश्चिमी देशों में आकर पानी का कारोबार न करने पाएं। 

यह यूनियन विकासशील देशों के जल का अधिकतम दोहन करना चाहती है, जिससे इन देशों की प्राकृतिक संपदा का जल्द से जल्द नकदीकरण कर लिया जाए। क्योंकि पानी अब केवल पेय और सिंचाई-जल मात्र नहीं रह गया है, बल्कि विश्व बाजार में ‘नीला सोना’ के रुप में तब्दील हो चुका है। भारत समेत दुनिया में जिस तेजी से आबादी बढ़ रही है और जल स्त्रोतों के घटने के साथ निजीकरण हो रहा है, उतनी ही चालाकी से पानी के लाभ का बाजार तैयार किया जा रहा है, जिससे एक बड़ी आबादी को जीवनदायी जल से वंचित कर दिया जाए और आर्थिक रुप से सक्षम व्यक्ति जल उपभोक्ता बन जाए। यही कारण है कि दुनिया में देखते-देखते पानी का कारोबार 37 हजार 500 अरब डॉलर का हो गया है। मसलन पानी की हर बूंद बिकने लगी है और हर घूंट पानी की कीमत वसूली जाने लगी है।

भारत में पानी और पानी को शुद्ध करने के उपकरणों का बाजार लगातार फैल रहा है। देश में करीब 85 लाख परिवार जल शोधित (प्यूरीफायर) उपकरणों का प्रयोग करने लगे हैं। इस बाजार पर यूरेका फोर्ब्स का कब्जा है। करीब 75 लाख घरों में इसी का इस्तेमाल किया जाता है। बीते चार साल में हिंदुस्तान यूनीलीवर ने भी करीब 15 लाख प्यूरीफायर बेचे हैं। बोतल और थैली में बंद पानी का भारत में एक हजार करोड़ का बाजार तैयार हो चुका है। इसमें हर साल 40 से 50 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो रही है। देश में इस पानी के करीब एक सौ ब्रांड देशव्यापी हैं और 1200 से भी ज्यादा बंद पानी के संयंत्र लगे हुए हैं। देश का हर बड़ा कारोबारी समूह इस व्यापार में उतरने की तैयारी में है। दिग्गज कंप्युटर कंपनी माइक्रोसाफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स भारत में ओमनी प्रोसेसर संयंत्र लगाना चाहते हैं। इस संयंत्र से दूषित मलमूत्र से पेयजल बनाया जाएगा। फिलहाल इस क्षेत्र में भारतीय उद्योगपतियों का ही बोलवाला है।

भारतीय रेल भी बोतल बंद पानी के कारोबार में शामिल है। इसकी सहायक संस्था इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड दूरिज्म कॉर्पोरेशन (आईआरसीटीसी) ‘रेल नीर’ नाम से पानी का उत्पादन करती है। इसके लिए दिल्ली, पटना, चैन्नई और अमेठी सहित कई जगह संयंत्र लगे हैं। उत्तम गुणवत्ता और कीमत में कमी के कारण रेल यात्रियों के बीच यह पानी लोकप्रिय है। रेल यात्री इस पेय के प्रमुख उपभोक्ता हैं। बावजूद रेल नीर घाटे में है, क्योंकि बड़े पैमाने पर घोटाले का जाल बुन दिया गया है। सीबीआई इस घाटे को एक सुनियोजित साजिश के रुप में देख रही है। दरअसल रेल नीर के रेल यात्री ही सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। उन्हें ही वह जरुरत के मुताबिक पानी की आपूर्ति नहीं कर पाता है। इसीलिए रेलवे ने महाराष्ट्र के अंबरनाथ और तमिलनाडू के पालूर में नए जल उत्पादन संयंत्र लगाए हैं। लिहाजा निजी कंपनियों की कुटिल मंशा है कि रेल नीर को ऐन-केन-प्रकारेण घाटे के सौदे में तब्दील कराकर सरकारी क्षेत्र के इस उपक्रम को बाजार से बेदखल कर दिया जाए। ऐसा संभव होता है तो कंपनियों को रेल यात्रियों के रुप में नए उपभोक्ता मिल जाएंगे। पानी की गुणवत्ता बनाए रखने की शर्त खत्म हो जाएगी और तुलनात्मक दृष्टि से मूल्य संतुलित रखने के झंझट से भी छूट मिल जाएगी।

वर्तमान में भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। यहां हर साल 230 घन किमी पानी धरती के गर्भ से खींचा जाता है, जो विश्व की कुल खपत के एक चौथाई से भी ज्यादा है। इस पानी की खपत 60 फीसदी खेतों की सिंचाई और 40 प्रतिशत पेयजल के रुप में होती है। इस कारण 29 फीसदी भूजल के स्त्रोत अधिकतम दोहन की श्रेणी में आकर सूखने के कगार पर हैं। औद्योगिक इकाइयों के लिए पानी का बढ़ता दोहन इन स्त्रोतों के हालात और नाजुक बना रहा है। कई कारणों से पानी की बर्बादी भी खूब होती है। आधुनिक विकास और रहन-सहन की पश्चिमी शैली अपनाना भी पानी की बर्बादी का बड़ा कारण बन रहा है। 25 से 30 लीटर पानी सुबह मंजन करते वक्त नल खुला छोड़ देने से व्यर्थ चला जाता है। 300 से 500 लीटर पानी बॉथ टब में नहाने से खर्च होता है। जबकि परंपरागत तरीके से किए स्नान में महज 25-30 लीटर पानी खर्चता है। एक शौचालय में एक बार मल विर्सजन करने पर कम से कम दस लीटर पानी खर्च होता है। 50 से 60 लाख लीटर पानी मुंबई जैसे महानगरों में रोजाना वाहन धोने में खर्च हो जाता है। जबकि मुंबई भी पेयजल का संकट झेल रहा है। 17 से 44 प्रतिशत पानी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बैंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों में जल प्रदायक लाइनों के वॉल्वों की खराबी से बर्बाद हो जाता है।

पेयजल की इस तरह से हो रही बर्बादी और पानी के निजीकरण पर अंकुश लगाने की बजाए योजना आयोग के पूर्व अध्यक्ष मोटेंक सिंह आहलूवालिया ने केंद्र व राज्य सरकारों को सलाह दी थी कि पानी की बर्बादी रोकने के लिए नए कानूनी उपाय जरुरी हैं, ताकि हर बूंद का दुरुपयोग रोका जा सके। लगभग इसी समय संयुक्त राष्ट्र द्वारा पानी और स्वच्छता को बुनियादी मानवाधिकार घोषित करने की पहली वर्षगांठ पर संयुक्त राष्ट्र की महासचिव बान की मून ने कहा कि लोगों को पानी एवं स्वच्छता के अधिकार मिल जाने का अर्थ यह नहीं है कि सबको पानी मुफ्त मिले। बल्कि इसका मतलब यह है कि ये सेवाएं सबको सस्ती दर पर हासिल हों। साफ है, पानी को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाजार के हवाले कर दिए जाने की साजिश रची जा रही है। आम लोगों को गैर जागरुक ठहराकर पानी की बर्बादी का जिम्मेबार ठहराया जा रहा है। जिससे कानून बनाकर पानी के उपयोग और आपूर्ति को नियंत्रित किया जा सके। जबकि पानी की बर्बादी के कारण इतर हैं, जो उपर दर्शाये गए हैं।


प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224 
फोन 07492 232007

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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