छद्म इतिहासकारों का प्रपंच - प्रमोद भार्गव

भाषाई साहित्यकारों द्वारा सम्मान लौटाने के क्रम में अब मार्क्सवादी विचारधारा के सांचे में ढालकर इतिहास लेखन करने वाले इतिहासकार भी शामिल...


भाषाई साहित्यकारों द्वारा सम्मान लौटाने के क्रम में अब मार्क्सवादी विचारधारा के सांचे में ढालकर इतिहास लेखन करने वाले इतिहासकार भी शामिल हो गए हैं। यह होना ही था, क्योंकि ये लोग इतिहास और साहित्य लेखन की एक ही बौद्धिक परंपरा के निष्ठावान अनुयायी हैं। गोया, देश में बढ़ती असहिष्णुता का बहाना बनाकर रोमिला थॉपर, इरफान हबीब, केएन पन्नीक्कर और मृदुला मुखर्जी समेत 53 इतिहासज्ञों ने संयुक्त बयान जारी करके नरेंद्र मोदी सरकार के विरूद्ध मोर्चा खोला है। इतिहासकारों के विरोध से साफ हो जाता है कि सम्मान वापसी का यह खेल मार्क्सवादी वैचारिक सोच के लोगों द्वारा खेमेबंदी के रूप खेला जा रहा है। इनका उद्देश्य महज विपरीत विचारधारा का विरोध करना है। जाहिर है, ये इरादे संकीर्ण हैं। 

यह संकीर्णता मोदी के प्रधानमंत्री बनने के विरोध में तो सामने आई ही थी, तब भी सामने आई थी जब भारतीय पुरातत्व संस्था और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद से मार्क्सवादियों का सिलसिलेवार विस्थापन शुरू हुआ था। क्योंकि ये सरकारी संस्थान ही थे, जिन पर आसीन होकर इन इतिहासकारों ने न केवल मार्क्स की वैचारिकता को इतिहास में जबरन थोपा, बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक एजेंडे को भी आगे बढ़ाया। साथ ही सुनोयोजित ढंग से राम और कृष्ण जैसे ऐतिहासिक पात्रों को मिथकीय धरातल देकर और रामायण, पुराण व महाभारत को गल्प-कथा कहकर सिरे से खारिज करने का काम भी किया। जबकि इतिहासकारों को जरूरत यह थी कि वह गोमांस खाने जैसे विवादित मुद्दों के षड्यंत्र की शुरूआत कैसे हुई इसके स्रोत तलाशते | 

हमारे यहां वैचारिक पूर्वाग्रह इतने मजबूत हैं कि इनकी जड़ता किसी भिन्न वैचारिकता को उभरने का अवसर मिलते ही अकसर कुंद और संकीर्ण हो जाती है। यही वजह है कि मार्क्सवादी इतिहासकार कश्मीर का कैसे उत्तरोत्तर इस्लामीकरण और पूर्वोत्तर के राज्यों का ईसाईकरण होता चला आ रहा है, इन तथ्यों के प्रगटीकरण को नजरअंदाज करके चले आ रहे हैं। अब केंद्र में सत्ता परिवर्तन और राष्ट्रवादी विचारधारा को सरंक्षण मिलते देख कथित लेखक व इतिहासज्ञ असहिष्णुता के बढ़ने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश का बहाना करके वैचारिक ध्रुवीकरण की और देश को धकेल रहे हैं। 

अन्यथा क्या वजह है कि कश्मीर से 4 लाख से भी ज्यादा हिंदू खदेड़ दिए जाते हैं, असम और पूर्वोत्तर के अन्य सीमांत प्रदेशों में बांग्लादेशी घुसपैठिए इन राज्यों का जनसंख्यात्मक घनत्व बिगाड़ देते हैं, 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों में 3000 सिख और गोधरा रेल हादसे के बाद 1000 मुस्लिम मार दिए जाते हैं, तब इन लोगों की सहिष्णुता बेचैन होकर मुखर क्यों नहीं हुई ? वैसे भी जब नरेंद्र दाभोलकर की हत्या हुई थी, तब केंद्र और महाराष्ट्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकारें थी। कर्नाटक में एमएम कलबुर्गी की हत्या हुई, वहां कांग्रेस सत्तारूढ़ है। दादरी में अखलाक की हत्या उस समाजवादी पार्टी की सरकार में हुई, जो मुस्लिम तुष्टीकरण हर वक्त करती दिखाई देती है। केवल ऊधमपुर में ट्रक चालक की हुई हत्या एक ऐसी घटना है, जो गोवंश की तस्करी के संदेह में हुई। वहां भाजपा और उसके सहयोगी दल पीडीपी की सरकार है। 

वैसे भी संविधान के अनुसार कानून व्यवस्था राज्यों का विषय है। केंद्र सरकार, राज्य सरकार की इच्छा के बिना किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं कर सकती। बौद्धिकता का तमगा धारण करने वाले कथित बुद्धिजीवी क्या इन कानूनी विवशताओं के जानकार नहीं हैं ? तय है, बुद्धिजीवियों के लिए यह प्रकरण असहिष्णुता और लिखने-बोलने की आजादी का नहीं, बल्कि अपने वैचारिक धरातल की जमीन खिसक जाने का है | क्योंकि ये जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व आजादी के बाद से अब तक करते रहे हैं, उसके छीजने का अवसर देखते नहीं बन रहा है।

इतिहास घटनाओं और बदलावों का साक्षी होता है। घटनाओं और बदलावों के लिखित साक्ष्य हमारे यहां ऋग्वैदिक काल के पूर्व से मौजूद हैं। रामायण, महाभारत, पुराण, रामचरित, कृष्णचरित, हर्षचरित और राजतरंगिणी ऐसे इतिवृत्त हैं, जिनके आधार पर भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन किया जाता तो एक उच्चकोटि का इतिहास सामने आ सकता था। इस इतिहास लेखन में भृगु, इक्ष्वाकु, इला और अन्य वर्ण व जातीय वंशावलियों को भी आधार बनाया जा सकता था। ये वंशावलियां पुराण ग्रंथों में लिपिबद्ध हैं। किंतु जो मार्क्सवादी इतिहासज्ञ नाराजी जता रहे हैं, उनमें से ज्यादातर ने इतिहास के इन सा्रेतों को मिथकीय गल्प कथाएं कहकर नकारा है। यही नहीं जब डॉ रामविलास शर्मा जैसे मार्क्सवाद के आधिकारिक व्याख्याकार ने ऋग्वेद, उपनिशद और विलुप्त हो चुकी सरस्वती नदी पर खोज की तो उन्हें वामपंथी आलोचक नामवर सिंह समेत तमाम बुद्धिजीवियों ने हिंदूवादी कट्टरपंथी घोषित करने में अपनी मेधा लगा दी थी। जबकि डॉ रामविलास वेदों में श्रम के महत्व और सरस्वती नदी की ऐतिहासिकता को रेखाकिंत करने कोशिश में लगे थे। 

वामपंथियों ने यही हरकत डॉ नगेन्द्र, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, अज्ञेय और डॉ धर्मवीर भारती के साथ भी की थी। यही नहीं इन वामपंथियों ने तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, विवेकानंद, महात्मा गांधी, आचार्य नरेंद्र देव, डॉ अम्बेडकर और डॉ राम मनोहर लोहिया को भी नहीं समझा। अपितु भक्तिकालीन कवियों और उनके नवजागरण से जुड़े संपूर्ण साहित्य को प्रतिक्रियावादी ठहराने की कवायद में लगे रहे। इसीलिए डॉ शर्मा ने जब अपनी परंपरा को अपने परिप्रेक्ष्य में जानने की गवेषणा की तो उन्हें हिंदूवादी लेखक ठहरा दिया। जबकि गांधी की वैचारिक विरासत को समझने वाले डॉ शर्मा इकलौते मार्क्सवादी लेखक रहे हैं। हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में गांधी पर डॉ शर्मा जैसा कार्य किसी दूसरे लेखक ने नहीं किया है।

दरअसल हमारे यहां जो इतिहास है, उसे भी मार्क्सवादियों ने स्वतंत्र रूप से नहीं लिखा। अंग्रेज इतिहासकारों और मुगल जीवनीकारों के लेखन से उसका अनुकरण किया। यहां तक कि काल विभाजन का स्वरूप भी वही रखा, जो यूरोपीय इतिहासज्ञों ने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया था। भारतीय इतिहास को यूरोपियनों ने हिंदू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिष काल में विभाजित किया था। इसे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में बैठे मार्क्सवादियों ने बदलकर क्रमषः प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारत कर दिया। इस नाम परिवर्तन से इतिहास के कथानकों और घटनाओं में कोई बदलाव नहीं आया। जबकि इतिहास बदलावों का दस्तावेजीकरण और परिवर्तनों की यथास्थिति की व्याख्या होती है। 

यही नहीं इन इतिहासकारों ने स्वतंत्रता आंदोलन का भी इतिहास नहीं लिखा। और जिन सावरकर ने लिखा उसे इतिहास-सम्मत नहीं माना। जबकि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में प्रमाणिक तथ्य व अभिलेख एकत्रित करके पहली बार भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास लेखन का काम उन्होंने ही किया था। सावरकार ही थे, जिन्होंने 1857 के संघर्ष को सैनिक विद्रोह या गदर मानने से इनकार किया था और इसे देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा दी थी। लेकिन गांधी हत्याकांड में उनकी विवादास्पद भूमिका, संविधान का विरोध, प्रखर राष्ट्रवाद और उग्र हिंदुत्व संबंधी विचारों के कारण सावरकर का एकांगी मूल्यांकन हुआ। जबकि वे मदनलाल ढींगरा जैसे देशभक्तों के प्रेरणास्त्रोत रहे थे। 

जबकि मार्क्सवादी इतिहासकारों का सांप्रदायिक रुझान स्पष्ट तौर से परिलक्षित होता रहा है। इरफान हबीब ने अलबरूनी को “मुस्लिम वैज्ञानिक चिंतक” के रूप में पेश किया है। कबीर पर जब हिंदु अपना अधिकार जमाते हैं तो वे इस तथ्य को विचार के लायक भी नहीं मानते। जबकि जिन मठों में कबीर के भजन गाए जाते हैं, वे सब हिंदू जातियों द्वारा सरंक्षित मठ हैं। कबीरपंथी कहलाने वाले यही लोग कबीर की गायन परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। 

रामशरण शर्मा ने अपनी पुस्तक “प्राचीन भारत” में बड़ी सहजता से लिख दिया कि पुरातन भारतीय गोमांस खाते थे। सतीशचंद ने “मध्यकालीन भारत” में गुरू तेगबहादुर को “लुटेरा” तक ठहराने में कोई संकोच नहीं किया। मार्क्सवादियों ने महाराणा प्रताप को भी अकबर से कमतर ठहराने में अपनी पूरी बुद्धि लगाई है।

इसी तरह जिस गोमांस खाने को लेकर देशव्यापी हल्ला मचा हुआ है, उस गोमांस की शुरूआत क्यों हुई, इसकी भी तार्किक पड़ताल इतिहासज्ञों ने नहीं की। जबकि इतिहासकार बखूबी से जानते है कि भारत में 80 से 90 प्रतिशत मुसलमान हिंदुओं से धर्मांतरित हुए है और आज भी इस कौम का मुख्य भोजन गोमांस नहीं है। विवाह आदि अन्य शुभ कार्यक्रमों में भी गोमांस नहीं परोसा जाता। इस सिलसिले में केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार अस्तित्व में थी, तब वाजपेयी ने इस विषय को गंभीरता से लिया था। इस हेतु उन्होंने प्रसिद्ध गांधीवादी लेखक डॉ धर्मपाल को जिम्मेदारी सौंपी थी कि वे यह खोज करें कि गोहत्या की शुरूआत कब और कैसे हुई। धर्मपाल ने ब्रिटेन के इंडिया हाउस से पहले तो मूल अभिलेखों को खंगाला। फिर उनकी विवेचना की और 2002 में अटल जी को ‘भारत में अंग्रेजों द्वारा गोहत्या की शुरूआत’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के नाम से ही सत्यापित हो जाता है कि अंगेजों की क्रूर मंशा हिंदू मुसलमानों को लड़ाना था। 

दरअसल 1857 के सैन्य संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने सैनिक संख्या में बेहिसाब बढ़ोत्तरी की थी। इनकी भोजन संबंधी जरूरतों की आपूर्ति के लिए नए बूचड़खाने खोले गए। इनमें गोहत्या और गोमांस के पेशे में मुस्लिम कसाईयों की तैनाती की गई। यह साजिश इसलिए की गई जिससे हिंदुओं को बताया जा सके कि मुसलमान गोहत्या में लगे है। यहीं से गोहत्या को लेकर हिंदु मुस्लिम समुदायों के बीच सांप्रदायिक तनाव की वारदातें शुरू हुई। यह साजिश वायसराय लॉर्ड लैंड्सडॉउने ने रची थी। इस बावत मुजफ्फरपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी ने कहा भी था कि जब हम अंग्रेजों द्वारा की जाने वाली गोहत्या पर रोक नहीं लगा पा रहे है तो मुस्लिमों को दोष कैसे दे सकते है ? यही वे ऐतिहासिक तथ्य हैं, जिनकी पड़ताल मार्क्सवादियों को करने की जरूरत थी। लेकिन देश का दुर्भाग्य रहा कि इन वामपंथियों ने ज्यादातर इतिहास लेखन का कार्य यूरोपियन लेखकों का अनुकरण करके किया। 

मार्क्सवाद से जुड़े इतिहासकार हों या साहित्यकार उन्हें तब कोई पीड़ा नहीं होती जब भारतीय नायक-नयिकाओं के चरित्र को लेकर खिलवाड़ किया जाता है। फ्रांसीसी उपन्यासकार माइकल डी ग्रीस ने “लॉ फेम सेक्री” शीर्षक से उपन्यास लिखा है। इसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में एक नितांत झूठा प्रसंग गढ़ा गया है। इसमें वीरांगना के चरित्र को साधारण और कमजोर जताने की कोशिश की गई है। उपन्यास में लिखा है कि “ऐसा लगता है कि उनके मन में एक अंग्रेज वकील के प्रति रागात्मक आकर्षण पैदा हो गया था और रानी का दिल इस असंभव और श्रापित प्रेम की यंत्रणा भुगत रहा था। जान लेंग नामक यह फिरंगी ब्रिटिष हुकूमत के नुमाइंदे के नाते झांसी आता-जाता था। उसका रानी से संवाद होता था।“ जबकि लक्ष्मीबाई के समूचे और संक्षिप्त जीवन के बारे में भारत और ब्रिटेन में पर्याप्त तथ्य तथा अभिलेखित साक्ष्य उपलब्ध हैं। उनसे प्रमाणित है कि वे तेजस्विनी और शील व संयम से संपन्न वीरागंना थीं। इस ऐतिहासिक विभूति के बारे आरोपित कल्पना का विरोध भी इन कथित छदृम इतिहासकारों ने कभी नहीं किया। 

जेम्स लेन ने अपनी किताब “शिवाजीःहिंदू किंग इन इस्लामिक इंडिया” में शिवाजी के चरित्र पर अनर्गल लिखकर हिंदुओं की भावनाओं को तो आहत किया, लेकिन मार्क्सवादियों की भावनाएं आहत नहीं हुई। इसी तरह सलमान रुषदी की किताब “सेटेनिक वर्सेज” और तस्लीमा नसरीन की “द्विखंडिता” को जब भारत में प्रतिबंधित किया जाता है तो मार्क्सवादी उसके विरोध में खड़े नहीं होते, क्योंकि इन किताबों में मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर किए जाने वाले अत्याचार के विवरण हैं। साफ है, मार्क्सवादी हिंदु, सिखों, बौद्ध, दलित और मुसलमानों से जुड़े घटनाक्रमों को भिन्न और पूर्वाग्रही दृष्टि से देखते रहे हैं।

दरअसल जब 1972 में भारतीय इतिहास एवं अनुसंधान परिषद की बुनियाद रखी गई थी और 1973 में नुरूल हसन केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्री बने थे, तब मार्क्सवादी इतिहासज्ञों को यह घुट्टी पिलाई गई थी कि महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ के मंदिर की लूट तथा सोमनाथ, वाराणसी, अयोध्या और मथुरा के शिव, राम व कृष्ण मंदिरों के विध्वंस को मुगल बादशाहों के धतकर्म और उनके धर्म से जोड़कर व्याख्यायित नहीं किया जाए। साथ ही मुसलमानों द्वारा हिंदुओं के धर्मांतरण और मंदिर तोड़कर मस्जिदें बनाए जाने का उल्लेख इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में न हो। मार्क्सवादियों ने इतिहास के साथ न केवल खिलवाड़ किया, बल्कि डॉ सुंदरलाल, सावरकर, केपी जयसवाल, रमेशचंद्र मजूमदार, किशोरी शरण लाल, आर्षीवादी लाल श्रीवास्तव, हरिहर निवास द्विवेदी और सत्यकेतु विद्यालंकार जैसे इतिहासकारों की निष्पक्ष लेखन-परंपरा को भी ध्वस्त करने का काम किया । इस लिहाज से इन इतिहासज्ञों के समूहबद्ध विरोध का न तो को कोई औचित्य है और न ही इस विरोध से इतिहास लेखन की परंपरा प्रभावित होने वाली है।

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।




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क्रांतिदूत: छद्म इतिहासकारों का प्रपंच - प्रमोद भार्गव
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