सड़क दुर्घटनाओं की त्रासदी - प्रमोद भार्गव

सरकार ने सड़क सुरक्षा संबंधी एक विधेयक का प्रारूप तैयार किया है, जिसे बजट सत्र में पेश किया जाएगा। प्रस्तावित विधेयक में दुर्घटनाएं कम कर...



सरकार ने सड़क सुरक्षा संबंधी एक विधेयक का प्रारूप तैयार किया है, जिसे बजट सत्र में पेश किया जाएगा। प्रस्तावित विधेयक में दुर्घटनाएं कम करने के उपाय कडाई से लागू करने की बात है | विचित्र स्थिति यह है कि हमारे यहां अन्य विकासशील देशों की तुलना में वाहन कम हैं, किंतु दुर्घटनाएं ज्यादा होती है। इन दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण शराब पीकर वाहन चलाना है। 

सड़कों पर बढ़ती दुर्घटनाओं में एक और बड़ा कारण नाबालिग बाइकर्स द्वारा वाहन चलाना भी है । दरअसल देश में हरेक साल जो डेढ़ लाख लोग मारे जाते हैं और चार से पांच लाख घायल होते हैं, उनमें ज्यादातर युवा होते हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में इन बाइकर्स का आतंक छाया हुआ है। पिछले तीन साल के भीतर उत्तर प्रदेश में ये बाइकर्स 14,157 और मध्य प्रदेश में 8,420 दुर्घटनाओं को अंजाम दे चुके हैं। यह खुलासा राज्यसभा में एक सवाल के जबाव में सामने आई रिर्पोट से हुआ है। दूसरी तरफ सरकार राजमार्गों पर ऐसे स्थल भी तलाश रही है, जहां अधिकतम दुर्घटनाएं होती हैं। इसके बाद इन स्थलों पर ऐसे सुधार किए जाएंगे, जिससे घटनाएं कम से कम हों। साथ ही दुर्घटना के अन्य कारण भी खोजकर उनका भी निवारण किया जाएगा। इसी मकसद से प्रस्तावित विधेयक लाने की योजना है |

पिछले साल सड़क हादसों में मारे जा रहे युवाओं की दिल दहलाने वाली रिपोर्ट आई थी। सड़क परिवहन और राजमार्ग द्वारा सड़क हादसों से जुड़ी इस रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 34 आयु वर्ग के 75,048 युवा 2014 में सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए थे। युवाओं के मरने का यह आंकड़ा 53.8 फीसदी है। इसी तरह 35 से 65 आयु वर्ग के लोगों में 49,840 लोग दुर्घटनाओं में मरे थे। यह प्रतिशत कुल मरने वालों की संख्या में 35.7 बैठता है। मसलन देशभर में जितने लोग बीमारियों व प्राकृतिक आपदाओं से नहीं मरते, उससे कहीं ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं में मर जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में मौतों का छठा सबसे बड़ा कारण सड़क हादसे हैं। 

आम धारणा है कि बढ़ती आबादी, अनियंत्रित शहरीकरण, नशे में वाहन चलाना और दो व चार पहिया वाहनों की सड़कों पर बढ़ती संख्या इसके प्रमुख कारण हैं। अब नए कारणों में नाबालिग बाइकर्स और राजमार्गों के ऐसे स्थल भी बताए जा रहे हैं, जहां अधिकतम दुर्घटनाएं होती हैं। मसलन अभी तक हम सड़कों के निर्माण का सही तरीका भी अमल में नहीं ला पाए हैं, जबकि हमारे नेता और इंजीनियर नई तकनीकों की खोज में लगातार विदेशी दौरे करते रहते हैं। अब तो हालात ये हो गए कि तेज रफ्तार वाहनों की आवाजाही के लिए सड़कों से पैदल और साईकिल यात्रियों को विस्थापित किए जाने का सिलसिला चल पड़ा है। यहां तक की केवल इन वाहनों के लिए एक्सप्रेस हाइवे बनने लगे हैं। एक बड़ी और गरीब आबादी वाले देश के लिए इस तरह की असमानताएं संविधान विरुद्ध हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने भी भारत में सड़क हादसों पर महत्वपूर्ण आंकड़े इकट्ठे किए हैं। पिछले एक दशक के दौरान पूरे देश में सड़क दुर्घटनाओं में 13 लाख से भी ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं। आंकड़ों के अनुसार हर दिन सड़क हादसे में 381 लोग मारे जाते हैं और 1287 घायल होते हैं। सड़क परिवहन की इसी खौफनाक हालत पर चिंता जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने देश की सड़कों को “राक्षसी हत्यारे, जायंट किलर” कहा था। अदालत ने यह संज्ञा सड़क हादसों में हुई मौतों की हकीकत से रूबरू होकर दी थी। दरअसल 2004 में सड़क हादसों में 92,618 मौतें हुई थीं। जबकि 2010 में यह आंकड़ा बढ़कर 1,35,485 हो गया और 2011 में 1,43,485 लोगों ने सड़क हादसों में प्राण गंवाए। 2013 में 4,86,000 और 2014 में 4,89,000 लोगों ने प्राण गवाएं। यानी जैसे-जैसे सड़कों पर वाहन बढ़ते जा रहे हैं, उसी अनुपात में दुर्घटनाओं में मौत के आंकड़े भी बढ़ते जा रहे हैं। उत्तर-प्रदेश में कुल मौतों के 11 फीसदी, तमिलनाडू में 10.9, महाराष्ट्र में 9.2, कर्नाटक में 7.5, राजस्थान में 7.4 प्रतिशत लोग मारे जाते है। इसके बाद मध्यप्रदेश, गुजरात, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, पष्चिम बंगाल, बिहार, पंजाब और हरियाणा का नंबर आता है। जाहिर है, यह रफ्तार देश के युवाओं को निगल रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में केवल 28 देश ऐसे हैं, जहां सड़क हादसों पर नियंत्रण की द्रष्टि से कायदे-कानून बनाए गए हैं। जिनका यथा संभव पालन भी होता है। लेकिन हमारे यहां जो कानून हैं, उनमें उदारता कहीं ज्यादा है। लिहाजा हादसे को अंजाम देने वाले चालक को कठोर सजा देने की बजाय, कानून उसे बचाने में ज्यादा सहायक साबित होते हैं। जानलेवा टक्कर होने के बावजूद ज्यादातर मामलों में पुलिस लापरवाही से हुई मौत मान कर जिन धाराओं में प्रकरण कायम करती है, उनमें तत्काल जमानत तो मिल जाती है, सजा का प्रावधान भी दो साल का है। 

पिछले डेढ़ दशक में देशभर की सड़कों पर क्षमता से अधिक वाहन सड़कों पर आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दर्ज की गई एक याचिका में दिए आंकड़ों से पता चलता है कि 2010 में भारत में करीब 46.89 लाख किलोमीटर सड़कें और 11.49 करोड़ वाहन थे। नतीजतन 4.97 लाख सड़क हादसे हुए। इन हादसों में ज्यादातर मरने वाले लोगों में 40 फीसदी, 26 से 45 आयुवर्ग के होते हैं। यही वह महत्वपूर्ण समय होता है, जब इन पर परिवार के उत्तरदायित्व के निर्वहन का सबसे ज्यादा दबाव होता है। ऐसे में दुर्घटना में प्राण गवां चुके व्यक्ति के परिजनों पर सामाजिक, आर्थिक और आवासीय समस्याओं का संकट एक साथ टूट पड़ता है। इन हादसों में 19 से 25 साल के इतने युवा मारे जाते हैं, जितने लोग कैंसर और मलेरिया से भी नहीं मरते। ये हादसे मानवजन्य विसंगतियों को भी बढ़ावा दे रहे हैं। आबादी में पीढ़ी व आयुवर्ग के अनुसार जो अंतर होना चाहिए, उसका संतुलन भी गड़बड़ा रहा है। यदि सड़क पर गति को नियंत्रित नहीं किया गया तो 2020 तक भारत में 700000 और दुनिया में प्रति वर्ष 84 लाख से भी ज्यादा मौतें सड़क हादसों में होगी। नतीजतन संबंधित देशों को 235 अरब रुपए की आर्थिक क्षति झेलनी होगी। ऐसे में शायद आबादी नियंत्रण के लिए परिवार नियोजन की जरुरत ही नहीं रह जाएगी ?

यातायात सुचारु रूप से संचालित हो, इसके लिए जापान, अमेरिका और सिंगापुर के यातायात कानून से भी सीख लेने की बात कही जा रही है। खासतौर से यूरोपीय देशों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक आचार संहिता लागू है, जिसका ज्यादातर देश पालन करते हैं। इस संहिता के मुताबिक यदि किसी कार की गति 35 किमी प्रति घंटा है, तो दो कारों के बीच की दूरी 74 फीट होनी चाहिए। 40 मील प्रतिघंटा की रफ्तार होने पर यह अंतर 104 फीट और 45 मील की गति पर यह अंतर 132 फीट होना चाहिए। संहिता में चालकों के नियम भी तय किए गए हैं। यदि चालक की मुट्ठी बंद करने की ताकत पौने सोलह किलोग्राम से कम निकलती है तो माना जाना चाहिए कि यह व्यक्ति वाहन चलाने लायक नहीं है। संहिता की शर्त के मुताबिक वाहन चलाने लायक उस व्यक्ति को माना जाएगा जो 20 मीटर आगे चल रहे वाहन का नंबर आसानी से पढ़ ले। हमारे यहां तो 80 साल के शक्ति और दृश्टि से कमजोर हो चुके बुजुर्ग भी सड़कों पर वाहन चलाते खूब देखे जाते हैं। फिर वाहनों के अनुपात में हमारी सड़कों पर जगह भी नहीं है। 74 फीट दूरी बनाएं रखने की बात तो छोड़िए, देश के महानगरों में 2 से 5 फीट की दूरी वाहनों के बीच बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। जाहिर है, हम लायसेंस प्रणाली को श्रेष्ठ बनाने के लिए बात भले दुनिया के देशों का अनुकरण करने की करें, लेकिन नतीजे कारगर निकलें ऐसा नामुमकिन ही है | लिहाजा सड़कों से वाहन कम किए बिना दुर्घटनाओं से छुटकारा मुश्किल है। किंतु कार लॉबी हमारे यहां इतनी मजबूत है कि वह कारों के उत्पादन में कमी लाने नहीं देगी, बल्कि उसकी तो कोशिश है कि कारें सड़कों पर निर्बाध चलें। इसके लिए पदयात्री, साइकिल और साइकिल रिक्शा को ही सड़कों से हटा दिया जाए | इस परिप्रेक्ष्य में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में एक अधिवक्ता आदर्ष मुनि त्रिवेदी ने पैदल चलने का अधिकार सुनिश्चित किए जाने की द्रष्टि से जनहित याचिका दायर की हुई है। इसका फैसला आने में तो अभी वक्त लगेगा, लेकिन सड़क हादसों में निकट भविश्य में कोई अकल्पनीय कमी आए, ऐसे उपाय नए विधेयक के जरिए होते है, तो यह अच्छी बात होगी। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि इस गंभीर विषय पर संसद में विचार भी हो पायेगा या नहीं ? या इस बार का बजट सत्र भी शोर शराबे की ही बलि चढ़ेगा |
प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007


लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।


COMMENTS

नाम

अखबारों की कतरन अपराध आंतरिक सुरक्षा इतिहास उत्तराखंड ओशोवाणी कहानियां काव्य सुधा खाना खजाना खेल चिकटे जी तकनीक दुनिया रंगविरंगी देश धर्म और अध्यात्म पर्यटन पुस्तक सार प्रेरक प्रसंग बीजेपी बुरा न मानो होली है भगत सिंह भोपाल मध्यप्रदेश मनुस्मृति मनोरंजन महापुरुष जीवन गाथा मेरा भारत महान मेरी राम कहानी राजीव जी दीक्षित लेख विज्ञापन विडियो विदेश वैदिक ज्ञान शिवपुरी संघगाथा संस्मरण समाचार समाचार समीक्षा साक्षात्कार सोशल मीडिया स्वास्थ्य
false
ltr
item
क्रांतिदूत: सड़क दुर्घटनाओं की त्रासदी - प्रमोद भार्गव
सड़क दुर्घटनाओं की त्रासदी - प्रमोद भार्गव
https://1.bp.blogspot.com/-AaqFPwViBJc/VrYA10s32WI/AAAAAAAACb8/djZQLPz5qIg/s400/pramod.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-AaqFPwViBJc/VrYA10s32WI/AAAAAAAACb8/djZQLPz5qIg/s72-c/pramod.jpg
क्रांतिदूत
http://www.krantidoot.in/2016/02/The-tragedy-of-road-accidents.html
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/2016/02/The-tragedy-of-road-accidents.html
true
8510248389967890617
UTF-8
Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy