हिन्दुओं की हार का कारण ?

हिन्दुओं की पराजय का कारण बतलाते हुए, अक्सर, कहा जाता है कि हिन्दू इसलिए हारे कि वे गरम देश में रहते थे और मांस नहीं खाते थे ! इसके विपर...

हिन्दुओं की पराजय का कारण बतलाते हुए, अक्सर, कहा जाता है कि हिन्दू इसलिए हारे कि वे गरम देश में रहते थे और मांस नहीं खाते थे ! इसके विपरीत, मुसलमान ठन्डे देश से आये थे और मांसाहारी होने के कारण उनमें शारीरिक शक्ति भरपूर थी ! दूसरा कारण यह बताया जाता है कि युद्ध में हिन्दू अपने लस्टम-पस्टम हाथियों पर विश्वास रखते थे जो फुर्तीले घुड़सवारों के मुकाबले में निकम्मे निकलते थे ! श्री जयचंद्र विद्यालंकार ने ‘इतिहास-प्रवेश’ में इन दोनों बातों का खंडन करते हुए बताया है कि शाकाहार और हाथी, इन्हें बदनाम करना व्यर्थ है ! हिन्दुओं की पराजय इसलिए हुई कि उनका राजनैतिक जीवन मंद हो गया था !

असल में, पतन तो इस देश का हर्षवर्धन के बाद ही आरम्भ हो गया था, क्योंकि उसके बाद चक्रवर्ती सम्राट के पद पर भारत में कोई राजा नही बैठ सका ! केंद्र की शक्ति टूट गई और कोई किसी को रोकने वाला न रहा ! परिणाम यह हुआ कि सारे देश में छोटे-छोटे राज्य उठ खड़े हुए, और वे, आपस में ही युद्ध करना अपना परम कर्तव्य मानने लगे ! अपना राज्य और अपनी राजधानी राजाओं को इतनी प्यारी हो उठी कि देश का अस्तित्व ही भूल बैठे ! आज भी, कमजोर प्रजातंत्री देशों में जब कोई व्यक्ति या दल स्थापित सरकार को नहीं चाहता है, तब वह एक विचित्र प्रकार की दलील देता है ! “हम देश की रक्षा क्यों करें? यह किसका देश है ? मेरा या उनका ? पहले यह फैसला हो जाए कि यह देश मेरा है, तब मैं इसकी रक्षा के लिए काम करूंगा !” तत्कालीन राजाओं के भी कुछ ऐसे ही भाव थे ! भारत का अर्थ उनका राज्य था ! फिर, वे अपने राज्य से बाहर जाकर क्यों लड़ते ? बाहर तो उनका अपना नहीं, किसी दूसरे राजा का राज्य पड़ता था ! प्रायः, प्रत्येक राजा को प्रत्येक दूसरे राजा से कुछ-न-कुछ शिकायत थी, जिसके कारण, कोई भी चार राजे एक राजा का साथ देने को तैयार नहीं थे ! पृथ्वीराज और राणा सांगा को कुछ राजाओं का जो सहयोग प्राप्त हो गया था, उसे हिन्दू-स्वभाव के अपवाद का ही उदाहरण समझना चाहिए !

‘जय सोमनाथ’ नमक उपन्यास में श्री क.मा. मुंशी ने लिखा है कि जब गजनी का अमीर सोमनाथ पर चढ़ाई करने चला, तब उसे खबर मिली कि झालोर के राजा वाक्पतिराज अगर मित्र न बनाए गये तो वे अमीर के सेना को काफी कष्ट दे सकते हैं ! अमीर ने मुल्तान के अजयपाल को अपना दूत बनाकर वाक्पतिराज के यहाँ भेजा और उन्हें आश्वासन दिया कि अमीर उनके राज्य पर चढ़ाई करना नहीं चाहता है ! वाक्पतिराज अमीर की बात मान गए और युद्ध से तटस्थ रहने का वचन उन्होंने भेज दिया ! इसके बाद, जब यह निश्चय हुआ कि वल्लभी के राजा भीमदेव के नेतृत्व में राजपूत वीर अमीर का डटकर सामना करेंगे और सोमनाथ मंदिर को भ्रष्ट नहीं होने देंगे, तब भीमदेव ने अपने मत्री को वाक्पतिराज के पास सहायता की मांग के लिए भेजा ! सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए सहायता की मांग की जाने पर वाक्पतिराज ने कहा – “अभी परसाल की ही बात है, मैं मारवाड़ पर चढ़ाई करना चाहता था और उसके लिए मैंने भीमदेव से मदद मांगी थी किन्तु, भीमदेव ने यह कहकर सहायता देने से इनकार कर दिया था कि मारवाड़ उसका नातेदार है ! आज मुझसे वह मदद क्यों मांगता है ? अपनी विपद वह आप झेले !”

ठन्डे देशों के मांसाहारी लोग भारत में पहले भी आये थे, किन्तु उस समय देश में किसी-न-किसी प्रकार की केंद्रीय सत्ता कायम थी और देश की एकता कहीं-न-कहीं प्रत्यक्ष खड़ी थी ! इस एकता के रहते हुए, किसकी मजाल थी कि भारत को दास बनाता ? आदमी कमजोर पहले होता है, पराजय उसकी बाद को होती है ! देश कि एकता पहले टूटती है, दासता उस पर बाद को आती है। मुस्लमान सिंध में तो बहुत दिनों से बैठे थें और लूटमार के द्वारा वे भारत से कुछ ले भागने के आदि भी रहे थे ! किन्तु, देश की एकता में जब तक थोडा भी दम रहा, वे सम्पूर्ण भारत को जीतने का मनसुबा नहीं बाँध सके ! मुसलमानी आक्रमण के समय भारतीय राजाओं की मनोवृति कैसी थी, इसका भी उदहारण ‘जय सोमनाथ’ में आया है, जहाँ घोघा राणा का प्रपौत्र सामंत राजा भीमदेव से कहता है कि “चालुक्यराज ! ऐसा लगता है कि क्षुद्रबुद्धि और पारस्परिक विरोध में मस्त अपने राजाओं को मारने के लिए ही भगवान् सोमनाथ ने इस अमीर को भेजा है !” एकता जब खिड़की की राह से भाग गई, तब आजादी को मुख्य द्वार होकर जाना ही था !

हिन्दू जन्मजात अहिंसक थे। अपनी सीमा से बहार जाकर लड़ने की उनके यहाँ परंपरा नहीं थी ! “सबसे उत्तम रक्षा यह है कि आक्रामक पर उसके घर में ही हमला करो,” इस नीति पर हिन्दुओं ने कभी अमल नहीं किया ! परिणाम यह हुआ कि रक्षापरक युद्ध लड़ने की उनकी आदत हो गई ! जब देश में केंद्रीय सत्ता कायम थी, यह रक्षापरक युद्ध देश के लिए लड़ा जाता था ! जब केंद्र टूट गया, तब रक्षापरक लड़ाइयाँ अपने क्षुद्र राज्यों के लिए लड़ी जाने लगीं ! भारतवर्ष में पंचायत की प्रथा बहुत प्राचीन थी ! गाँवों के लोग स्वावलंबी और स्वतंत्र थे ! राज्य से इनका इतना ही सम्बन्ध था कि जब राजाओं के कारिंदे कर वसूल करने आते थे, उन्हें सत्कारपूर्वक विदा कर देने के बाद गाँव फिर से अपने आप में स्वतंत्र हो जाते थे ! स्वायत्त-शासन का प्रेम यहाँ के वासियों के रक्त में था ! स्वायत्त-शासन की अतिवृद्धि से हानी यह हुई कि हमारी ग्रामीण जनता की दृष्टि संकीर्ण हो गई और उसने गाँव की दुनिया से बाहर की बड़ी दुनिया में दिलचस्पी लेना छोड़ दिया !

धार्मिकता की अति ने भी देश का विनाश किया, इस अनुमान से भी भागा नहीं जा सकता ! यह धार्मिकता गलत तरह की धार्मिकता थी जिसका उद्देश्य परम सत्ता की खोज नहीं, अपितु, यह विचार था कि किसका छुआ हुआ पानी पीना चाहिए किसका नहीं; किसका छुआ हुआ खाना, खाना चाहिए किसका नहीं; किसके स्पर्श से अशुद्ध होने पर आदमी स्नान मात्र से पवित्र हो जाता है और किसके स्पर्श से हड्डी तक अपवित्र हो जाती है ! बौद्ध-ब्राह्मण संघर्ष के क्रम में ब्राह्मणों ने विदेश यात्रा करने वाले बौद्धों को नीचा दिखाने के लिए धर्मशास्त्रों में यह विधान कर दिया कि विदेश जाना पाप है और इस पाप से मनुष्य सदा को पतीत बन जाता है ! यह अंधविश्वास, कदाचित्त, सिंध पर मुसलमानी शासन स्थापिय हो जाने के पश्चात प्रचलित हुआ होगा ! सिंध और आसपास के क्षेत्रो में मुसलमानी प्रभुता को फैलते देखकर ब्राह्मणों को यह नहीं सूझा कि राजाओं को इस खतरे से आगाह करें अथवा प्रजा को इस विपत्ति से भिड़ने के लिए तैयार करें ! उलटे, उन्होंने विष्णु-पुराण में कल्कि-अवतार की कथा घुसेड़ दी और जनता को यह विशवास दिलाया कि “सिन्धु-तट, दाविकोर्वी, चंद्रभागा तथा कश्मीर प्रान्तों को उपभोग व्रात्य, म्लेच्छ और नीच करेंगे ! वे अल्प कृपा और बहुत कोप करने वाले होंगे ! सदा अनृत धर्म में रूचि रखने वाले तथा स्त्री, बालक व गौ का वध करने वाले होंगे ! तब संबल-ग्राम के विष्णुयश नामक प्रमुख ब्राह्मण के घर में कल्कि का अवतार होगा और वे सब म्लेच्छो का उच्छेद तथा धर्म की पुनः स्थापना करेंगे !” अर्थात, जो वस्तुएं परिश्रम और पुरुषार्थ से प्राप्त होती हैं, उनको भी वे भगवान् पर ही छोड़ दिए ! अब जो पुराणों का प्रचार हुआ तो वे देश-रक्षा, जाति-रक्षा और धर्म-रक्षा का भार भी देवताओं पर छोड़ने लगें !

ज्यों-ज्यों हिन्दुओं का साहस और पुरुषार्थ घटता जाता, त्यों-त्यों उनकी ऐंठ बढती जाती थी ! उनका धार्मिक संस्कार विकृत हो गया था और वे मानाने लगे थे कि संसार में सबसे तुनुक चीज जनेऊ और जात है, जो एक बार गई तो फिर वापस नहीं लाई जा सकती है ! फिर भी, हम श्रेष्ठ हैं, इस अहंकार की उनमे वृद्धि होती गई ! दुःख है कि हिन्दुओं में ऐसे लोग आज भी बहुत मिलते हैं ! अपने इतिहास से सबक न लेने वालों का सर्वनाश निश्चित होता है, और वो आज भी हो रहा है !

यह लेख रामधारी सिंह दिनकर जी की 'संस्कृति के चार अध्याय' से ली गई !

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क्रांतिदूत: हिन्दुओं की हार का कारण ?
हिन्दुओं की हार का कारण ?
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क्रांतिदूत
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