एक अकिंचन की राम कहानी -पितृभूमी की खोज

1993 में पिताजी के स्वर्गारोहण उपरांत जब उनकी अस्थियों को गंगा में विसर्जन हेतु वराह तीर्थ सोरों पहुंचा, तब पण्डाजी के पास सुरक्षित रिकोर्...



1993 में पिताजी के स्वर्गारोहण उपरांत जब उनकी अस्थियों को गंगा में विसर्जन हेतु वराह तीर्थ सोरों पहुंचा, तब पण्डाजी के पास सुरक्षित रिकोर्ड अवलोकन से ज्ञात हुआ, कि हमारे पूर्वज राजस्थान के "नीम का थाना" के नजदीक स्थित किशोरपुरा से शिवपुरी आकर बसे थे ! तभी से उत्कट इच्छा थे कि एक बार पितृ भूमि के दर्शन किये जाएँ ! और फिर पूर्वजों का पिण्डदान गया में करने के पूर्व भी अपने पूर्वजों के गाँव की परिक्रमा भी करना परंपरा में शामिल है, अतः पूर्वजों की कर्मभूमि के दर्शनों की अभिलाषा को मन में संजोये २४ सितम्बर २००४ को सायंकाल साढ़े सात बजे ग्वालियर बस स्टेंड से २३० रु. का टिकिट लेकर जयपुर रवाना हुआ ! प्रारम्भ में तो स्लीपर कोच बस की यह यात्रा सुखद प्रतीत हुई, किन्तु जैसे ही आगरा मुम्बई राजमार्ग के उपरांत धोलपुर से ऊबड़ खाबड़ सड़कें प्रारम्भ हुई नानी दादी याद आ गईं ! एक हाथ से बर्थ के पास लगे पाइपों को पकड़कर करवटें बदलते, ओंघते हुए सुबह पांच बजे जयपुर पहुंचा ! चार नंबर प्लेटफार्म से ५० रु. में टिकिट लेकर लगभग ६ बजे आगे की यात्रा पर नीम का थाना को रवाना हुआ !

साढ़े तीन घंटे की उबाऊ यात्रा के बाद साढ़े नो बजे नीम का थाना पहुंचा ! बस स्टेंड के नजदीक अन्नपूर्णा होटल में ५० रु. में ही कमरा मिल जाने से थोड़ी राहत महसूस हुई ! उसी संतुष्टि में मंजन कर एक के स्थान पर दो चाय गटकी ! दैनिक क्रिया स्नान ध्यान आदि से निवृत्त होकर एक बार फिर बस स्टेंड पहुंचा ! ज्ञात हुआ कि बस स्टेंड भी दो हैं ! रेलवे पुल पार कर में पहले बस स्टेंड पर पहुंचा ! बहां जाकर जानकारी लेने पर ज्ञात हुआ कि नीम के थाना के पास किशोरपुरा भी तीन हैं ! एक खटकड़ के पास, दूसरा गुडा के पास और तीसरा पाटण के पास ! मैंने सबसे नजदीकी किशोरपुरा के विषय में पूछा तो बताया गया कि खटकड़ के पास बाला सबसे नजदीक है, किन्तु उसकी बस रेलवे पुल के दूसरी ओर से मिलेगी ! मैंने फिर पुल पार किया और दूसरे बस स्टेंड पर पहुंचा !

जब परिचारक ने केवल १५ रु. का टिकिट दिया तो सोचा कि यह तो आधा पोन घंटे का ही रास्ता होगा, किन्तु मैं गलत था ! अरावली की ऊंची ऊंची पर्वत श्रंखला के बीच लगातार चढ़ाई चढ़ती बस ने मुझे हिमाचल यात्रा की याद दिला दी ! यह अलग बात है कि हिमालय के नयनाभिराम द्रश्य एवं शीतलता के स्थान पर यहाँ वीरान पहाड़ियां वा खासी गरमी थी ! खेतों में बाजरे की लहलहाती फसलों में जरूर कुछ हरियाली थी, बह भी कहीं कहीं ! बाजरे के स्थान पर कोई अन्य फसल मैंने रास्ते में नहीं देखी ! खेतों में लाल पीली दुमट मिट्टी थी ! यह भी समझ आया कि मध्य प्रदेश और राजस्थान की सड़कें एक सी ही खस्ताहाल हैं !

सबसे पहले बस गणेश्वर पहुँची ! जैसा कि नाम से ही आभास होता है,यह कस्बा मंदिरों का प्रतीत हुआ ! सड़क से लगा हुआ एक भव्य वा आकर्षक शिव मंदिर दिखाई दिया, जिसका प्रवेश द्वार अत्यंत सुन्दर रथ के आकार का बनाया गया था ! रथ में जुते हुए पत्थर के दो बैल, उनकी रास थामकर बैठे भगवान श्री गणेश ! रथ में विराजमान उमा महेश्वर तथा रथ के दोनों ओर पंजे उठाकर खड़े हुए दो विशालकाय सिंह ! इस पूरी झांकी को एनामल पेंट किया गया था ! सुन्दर वा सजीव द्रश्य ! लगता था बैल अभी दौड़ने ही बाले हैं !

गणेश्वर से चलकर चीपलाटा पहुंचते पहुंचते, जब ढाई घंटे हो गए तो मेरा धैर्य जबाब देने लगा ! मैंने बस से उतरकर आसपास खड़े जीप बालों से किशोरपुरा जाने तथा बापस नीम का थाना पहुँचने का किराया पूछा ! जब उन्होंने ५०० रु. मांगे तो मैं अचकचा गया ! मैंने उनसे कहा कि वे और यात्रियों को बैठा सकते हैं, मैं तो अकेला हूँ ! तब भी वे ४०० रु. से कम पर तैयार नहीं हुए ! मरता क्या ना करता मैं वापस बस में ही सवार हुआ ! चीलपाटा से तो रास्ता कदम कच्चा हो गया था ! सहयात्रियों ने मुझे बताया कि खटकड़ जोड़ से किशोरपुरा लगभग ५ कि.मी. की दूरी पर है, जहां मुझे पैदल पहुंचना होगा ! मैं परेशानी से पहलू बदलता बार बार कंडक्टर एवं क्लीनर से पूछता कि कि कितना और रह गया है भाई खटकड़ जोड़ ? तभी एक अन्य यात्री से क्लीनर की हथापाई शुरू हो गई ! वह यात्री किराया ना देने पर आमादा था ! उस हट्टे कटे दादा टाईप यात्री ने अंततः पैसे नहीं दिए तो नहीं दिए ! तब तक बस रायपुर जागीर पहुँच गई ! जब मैंने कंडक्टर से फिर पूछा कि भाई कितना और दूर है खटकड़ जोड़, तो वह शर्मिन्दा हो गया ! माफी मांगते हुए बोला कि हम दो कि,मी. आगे आ चुके हैं ! मेरे पास चुपचाप बस से उतर आने के अलावा चारा ही क्या था !

मुझे आश्चर्य हुआ यह देखकर कि उस छोटे से गाँव में भी दो जीपें खडी हुई थी जिनके ड्राईवर ताश खेलने में मशगूल थे ! मैंने उन लोगों से किशोरपुरा तथा बहां से नीम का थाना चलने का किराया पूछा तो उन्होंने साढ़े पांच सौ मांगे ! मैंने सोचा कि चीपलाटा पर पांच सौ और यहाँ साढ़े पांच सौ ! बुरे फंसे हरिहर ! खैर मैंने उन्हें कहा कि भाई चीपलाटा पर तो ड्राईवर चार सौ में ही तैयार थे, तुम साढ़े तीन सौ में तैयार हो तो बताओ ! उन लोगों ने ना कहा तो मैं खटकड़ जोड़ के लिये पैदल ही चल पड़ा ! तभी जीप बाले ने आवाज लगाकर मुझे रोका ! वह भला आदमी था ! आकर बोला साहब आप बाहर के व्यक्ति हो इसलिए बताना चाहता हूँ कि यहाँ से साढ़े सात कि.मी. पैदल चलकर किशोरपुरा पहुंचना और फिर वापस पांच कि.मी. लोटकर बस पकड़ना आपके बस का नहीं है ! पूरा दिन निकल जाएगा और बसों का आवागमन भी बंद हो जाएगा ! फिर वीराने में कहाँ पड़े रहोगे ? चलिए मैं आपको साढ़े तीन सौ में ही लिये चलता हूँ !

अंधा क्या चाहे दो आँखे ! जीप से किशोरपुरा के लिये रवाना हुए ! और अंततः पहुँच ही गए उस छोटे किन्तु साफ़ सुथरे ग्राम में ! मैंने झोंपड़ों की कल्पना की थी किन्तु वहां पक्की हवेलियाँ थीं ! एक चाय की दुकान पर बैठे कुछ लडके ताश खेल रहे थे ! मैंने उनसे किसी बुजुर्ग ब्राह्मण से मिलबाने को कहा ! एक तंदरुस्त नौजवान मुझे लेकर शर्मा हास्पीटल नामक एक दवाखाने पर पहुंचा ! किन्तु बहां मालूम हुआ कि डाक्टर साहब तो नीम का थाना गए हैं ! एक सुदर्शन नवयुवक ने मुझसे आगमन का कारण पूछा ! जब मैंने उसे उद्देश्य बताया तो बह बोला कि यहाँ गाँव में तो सभी आदि गौड़ ब्राह्मण हैं, किन्तु भारद्वाज गोत्र बाला एक ही परिवार है ! बह मुझे लेकर जिस परिवार में पहुंचा बहां गृहस्वामी ने बताया कि वे तो भारद्वाज प्रधान है, जबकि मुझे खोज थी भारद्वाज जोशी की ! बह भी चोमूवार जोशी ! गृह स्वामिनी ने अत्यंत आत्मीय भाव से भोजन के लिये आग्रह किया किन्तु मैंने केवल चाय के लिये सहमति दी ! मन ही मन सोचा कि जिस प्रकार मेरे पूज्य बाबा श्री नत्थीलाल जी इस दुर्गम इलाके से शिवपुरी जा बसे उसी प्रकार हो सकता है कि पूरा परिवार ही विश्रंखलित होकर अन्यत्र जा बसा हो ! मैंने मन ही मन अपने पूर्वजों को प्रणाम किया और वापस रवाना हुआ ! अब देंखेंगे शेष दो किशोरपुरा भी फिर कभी !

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