आर्थिक उदारीकरण और बाजारवाद की आंधी में उपभोक्ता हाषिये पर - भरतचन्द्र नायक

आर्थिक उदारीकरण के विस्तार और ई-ट्रेडिंग के गुणगान से ठगे जा रहे उपभोक्ता बाजारवाद में अपने को हाषिये पर पा रहे है। जिस गति से उदारीक...


आर्थिक उदारीकरण के विस्तार और ई-ट्रेडिंग के गुणगान से ठगे जा रहे उपभोक्ता बाजारवाद में अपने को हाषिये पर पा रहे है। जिस गति से उदारीकरण हुआ और ढोल पीटा गया उपभोक्ता न्याय की प्रत्याषा में उतना ही एकाकी महसूस कर रहा है। उपभोक्ता सुरक्षा विधेयक 2015 संसद में जब पेष किया, उपभोक्ताआंे ने आषा की किरण देखी थी। लेकिन यह भी एक बिडंवना है कि किसी लोकहित के मामले के लिए जब बहस टालने की नौबत आती है तो उसे संसद की संयुक्त समिति अथवा स्थायी समिति के हवाले विधेयक कर दिया जाता है। समिति की बैठक बैठती है, और कभी-कभी सो जाती है और यदि खुदा न खास्ता उसने अपनी राय दे दी तो भी संसद में लोकहित के ऐसे आवष्यक मामले के लिए समय कम ही मिलता है। 

ऐसा कुछ हश्र देष के उपभोक्ता उपभोक्ता सुरक्षा विधेयक 2015 का देख रहे है। बाजारवाद की आंधी में मानवीय चेहरा नदारद नजर आ रहा है। बाजारवाद मंे औद्योगिक घरानों को मिली विज्ञापन की आजादी और ई-ट्रेडिंग की सुविधा तो कई मामले में उपभोक्ता के गले में फांस साबित होती है। विज्ञापनदाता रोज-रोज नये-नये पोषक आहार, औषधियां, खाद्य उत्पादों के विज्ञापन देते है तो फायदा करना, तंदुरूस्ती की जगह कैंसर जैसे घातक रोगों का कारण बन रहे है। दुकानदार आमने-सामने आंखों का लिहाज करता था। गुणवत्ता विहीन उत्पाद बेचते समय आंखें नीची कर लेता था, लेकिन अब तो विज्ञापनबाजी इस कदर हावी है कि ऐसा कदाचित कोई दिन जाता हो, जिस दिन उपभोक्ता अपने आपको ठगा हुआ न महसूस करता हो। लब्बो-लुवाब यह है। आर्थिक उदारीकरण के सुनहरे सब्जबाग दिखाये जाते समय जितने तर्क और फार्मूला उपभोक्ता हित में गिनाये जाते थे, वे सभी भ्रमजाल साबित हो रहे है। सख्त कानून के अभाव में उपभोक्ता हित पर डाका डालने की मानों बाजारवाद ने आजादी दे दी है। उपभोक्ता को राहत पहुंचानें के लिए उपभोक्ता फोरम के नाम से जो सरंचना की गयी थी, वह वकीलों के हस्तक्षेप में मानों गुनहगारों के लिए न्यायिक कवच बन गयी है।

उपभोक्ता हित का ढिंढौरा पीटते हुए 1986 में उपभोक्ता सरंक्षण कानून बनाया गया था। बीते तीस वर्षों में इसमें संषोधन पर गंभीर बहस तो हुई लेकिन औद्योगिक कारोबारियों की लाॅबी ने भी अपनी ताकत का अहसास कराते हुए संषोधन को परवान नहीं चढ़ने दिया। एमआरपी (अधिकतम खुदरा मूल्य) का उपहार देकर मानों औद्योगिक लाॅबी ने बिचैलियों को उपभोक्ता शोषण का लायसेंस दे दिया है। उपभोक्ता अंक पड़ता है। गरज में अपने को ठगाता हुआ गांठ ढ़ीली करके पछताता है। क्योंकि एमआरपी के बावजूद वहीं उत्पाद दूसरे जगह आधे और कहीं-कहीं तो चैथाई मूल्य पर बिकता हुआ पा जाता है। दुकानदार दावा करता है कि उसने निर्धारित मूल्य लेकर कौन सा अन्याय किया। सवाल यह है कि एमआरपी की जगह उत्पाद का लागत मूल्य क्यों नहीं लिखा जाता, जिससे उपभोक्ता समझ सके कि लागत के अतिरिक्त उससे दुकानदार कितना मुनाफा ले रहा है। इस तरह का उपभोक्ता सरंक्षण संषोधन तत्काल आवष्यक है।

’’सच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप’’ कभी हमारे जीवन मूल्यों का मार्गदर्षक सिद्धान्त था। तभी तो चीनी यात्री हृेन सांग ने लिखा था कि भारत में पीने के लिए पानी मांगा जाता है तो दूध से भरा पात्र आगे बढ़ा दिया जाता है। लेकिन कैसी विधि की बिडंवना है खालिष दूध का विज्ञापन करने वाले दूध में पानी ही नहीं पानी में दूध मिलाते है। वह दूध भी पषु के थनों से निकला दूध होने की कोई गारंटी नहीं है। केन्द्र सरकार ने यूरिया की बढ़ती खपत पर जब खोजबीन की तो पता लगा कि जब सोयाबीन से दूध बनाने में परेषानी आती है, कुछ अंचलों में यूरिया का उपयोग कर रसायन विज्ञान में पारंगत होने का दुग्ध उत्पादक कारोबारी अपना क्रूरतापूर्ण कृत्यों से परिचय देते है। 

खाद्य अपमिश्रण कानून इतना लचर है और न्याय व्यवस्था इतनी खर्चीली हो चुकी है कि षिकायतकर्ता अपने ठगे जाने से बचने का अवसर नहीं खोज पाता। रोग व्याधि का षिकार बनकर दवा-दारू में बर्बादी उसकी नियति बन चुकी है। खाद्य अपमिश्रण करने वालों के हाथ इतने लंबे है कि गिनी-चुनी प्रयोगषालाएं भी सही विषलेषण रिपोर्ट देने में या तो रूचि नहीं लेती अथवा उनके पास निरीक्षण के लिए गलत नमूना भेजकर उपभोक्ता के घावों पर नमक छिड़क दिया जाता है। उपभोक्ता हित सरंक्षण पर समाज और संसद में प्रखर बहस आवष्यकता है। समाचार पत्र-पत्रिकाएं किसी दौर में समाज में प्रहरी के रूप में विष्वस्त मानी जाती थी उनका इथिक्स था। इस परंपरा को कुछ संचार माध्यम आज भी विष्वसनीयता बनाकर जारी रखे है। फिर भी अमूमन देखने में आता है कि नैतिकता अब पूजाघरों में याद करने की बात रह गयी है। भ्रामक विज्ञापनों का प्रकाषन संचार माध्यम के पेषेवर कत्र्तव्य में शामिल हो चुका है। नतीजा देखने में आता है कि आनलाईन सेलिंग में हड्डियों का शर्तिया ईलाज, कद बढ़ाना, सेक्स पाॅवर बढ़ाना, तंत्र-मंत्र की अंगूठी से वषीकरण, समृद्धि पाना, अंगूठी, लाॅकेट, रत्नमणि से राषि के प्रतिकूल असर को दूर करनें के विज्ञापन आम है। आचार संहिता का चलन या तो बंद हो गया है अथवा आचार-विचार बनाये रखना हमारी प्रतिबद्धता में शाुमार नही रह गया है। सरकार को इस दिषा में गंभीरतापूर्वक विचार करनें की आवष्यकता है।

जहां तक उपभोक्ता फोरम का सवाल है वे भी निर्धारित मौद्रिक मापदंड के लिहाज से बौने सिद्ध हो रहे है। जिला फोरम को न्यूनतम एक करोड़ तक की क्षतिपूर्ति का अधिकार लाजिमी है, जो अब तक बीस लाख पर सिमटा है। स्टेट कन्ज्यूमर फोरम को यह एक करोड़ से दस करोड़ करना चाहिए। इसी तरह राष्ट्रीय फोरम को दस करोड़ से ऊपर के निराकरण का क्षेत्राधिकार होना चाहिए। मुद्रा की क्रयषक्ति घट गयी है। उपभोक्ता की क्रयषक्ति में इसी तरह इजाफा हो गया है। इसलिए पुराने पड़ चुके मापदंडों का विस्तार इनमें कड़ापन लाये जाने की जरूरत है। उपभोक्ता मामले की सुनवाई भी बौनी होने लगी है। जरूरत इस बात है कि मध्यस्थता के माध्यम से यदि उम्दा पक्ष समझौता करते है तो प्रावधान किये जाने से फोरम का भार कुछ कम भी किया जा सकता है।

उपभोक्ता संरक्षण मसौदा 2015 में प्रावधान किया जाना चाहिए कि उत्पाद की डिजाईन, निर्माण, पैकेजिंग में गलती पायी जाती है तो उपभोक्ता के हित पर चोट न पहुंचे। एमआरपी की जगह लागत और उस पर अधिकतम लाभ का जिक्र हो जिससे उपभोक्ता समझ सके कि उसे उसके मूल्य के बदले में सही वस्तु मिल रही है। आखिर जिस देश में पानी की जगह दूध दिया जाता था, आज प्राकृतिक उत्पाद पानी का मूल्य 20 रु. लीटर कहां तक उचित और न्याय संगत है। आॅयोडीन की आड़ में नमक का मूल्य 20 रू. प्रति किलो क्या अंधेरगर्जी नहीं है? प्रकृति प्रदत्त जल और समुद्री क्षारीय नगर के विपणन में हजार गुना मुनाफा नैसर्गिक न्याय की हत्या है।

नख-दंत विहीन निगरानी तंत्र अपमिश्रण रोकने में विफल

किसी सदन के पीठासीन अधिकारी ने सांसद के मुद्दे पर तपाक से सहमति दी हो ऐसे अवसर बिरले होते है। राज्यसभा में जब खाद्य अपमिश्रण से बढ़ते मारक रोगों का मुद्दा उठा पीठासीन अधिकारी पीजे कुरियन ने इसका पुरजोर समर्थन किया। सख्त कानून बनाने की आवयकता रेखांकित की। उपभोक्ता सुरक्षा विधेयक 2015 में विज्ञापन निगरानी निकाय को नख-दंत संपन्न बनानें की सिफारिष की गयी है, जिससे भ्रामक विज्ञापन छापने और ब्रांड एम्बेसेडर बनने वालों को दंडित किया जा सके। विज्ञापन में दिये आकर्षण के वषीभूत होकर उपभोक्ता जब नकली खाद्य सामग्री का सेवन करता है, तो वह रक्तचाप, कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह जैसी घातक बीमारियों को आमंत्रण देता है। गौर करने लायक चीज यह है कि परिवार कल्याण मंत्रालय की संस्था एफएसएसएआई यानि भारतीय खाद्य सरंक्षण एवं मानक प्राधिकरण ने अध्ययन निष्कर्ष में कहा है, मिलावट कृत्य हत्या के बराबर है। इसे हत्या के अपराधी के समतुल्य दंड मिलना चाहिए। अब यह देश के सांसदों पर निर्भर है कि वे इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते है, अथवा उत्साहहीन रवैया जारी रहता है और उपभोक्ता भगवान भरोसे छोड़े जाते है। भ्रामक विज्ञापनों की एक साल में डेढ़ हजार षिकायतों का परीक्षण हुआ और 525 षिकायतें सही पाई गयी। निराकरण हुआ लेकिन दंड क्या दिया गया? यह जनता नहीं जानती। यह पारदर्षिता के दावे पर कटाक्ष है।

- भरतचन्द्र नायक
एलआईजी ए 58, ई 6 अरेरा कालोनी, भोपाल




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