रहीम और अशफाक ने जाना "इस माटी का मोल"

अब्दुर्रहीम खानखाना, अशफाकउल्ला खान 'हसरत' वारसी

अब्दुर्रहीम खानखाना से संत कवी सूरदास ने पूछा - 

'धूरी धरत नित सीस पर, कह रहीम केहि काज ?

भला हाथी अपने सर पर धूल क्योँ उड़ेलता रहता है ? रहीम ने सूरदास को उत्तर लिख भेजा -

'जेहि राज ऋषिपत्नी तरी, सो ढूँढत गजराज |'

जिस धूल से गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या, जो पत्थर की शिला बनकर मार्ग में पड़ी थी, तर गयी | श्री राम चन्द्र जी की चरण-धूलि छूकर उसका उद्धार हो गया | उसी धूल को हाथी खोजा करता है कि शायद किसी दिन वह धूल मुझे भी मिल जाए और में तर जाऊं |

आखिरी ख्वाहिश (अंतिम इच्छा) -

यह दृष्टी कितने हिन्दुओं को मिल पायी ? यह उसका उत्तर है, जो अकबर का सेनापति रहा था | क्या वह हिन्दू हो गया था ? नहीं, उसका ह्रदय राष्ट्रीय संस्कृति-निष्ठ था | जायसी, कुतुबन, मंझन, आलम, ताज सब इस्लाम सम्मत में ही रहे, परन्तु उनकी लेखनी से राष्ट्र-निष्ठा महकती रही | गमकाती रही देश का आँगन, कविता कानन |

रहीम का सा ही उदगार पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' के मित्र और साथी अशफाकउल्ला खान 'हसरत' वारसी प्रकट करते है | जब वे फांसी चढ़ने चले तो पुछा गया - 'अशफाक ! आपकी आखिरी ख्वाहिश क्या है ? अशफाक ने कहा -

"कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो ये है, रख दे कोई जरा-सी खाके वतन कफ़न में |"

यहाँ पर रहीम और अशफाक सामान रूप से इस देश की मिटटी की महिमा जीवन में चरितार्थ करते मिलते है | क्या इससे अशफाक गैर इस्लामी हो गए ? बीमारी में अशफाक "राम-राम" कहकर बडबडाते थे | एक ही शब्द उनके मुहं से निकलता था - 'राम ! राम !' घर वाले बड़े दुखी कि लड़का दीन से भी गया | यह तो 'कुफ़' बकता है | घरवाले पक्के मुस्लिम लीगी थे | 'राम ! राम !' सुनकर उनके चहरे फक्क हो गए | तभी किसी ने मर्म समझा | पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' को बुलवाया | अशफाक के हाथ में उनका हाथ आया तो वे शांत हो गए, आश्वस्त | प्रलाप बंद हो गया | तब घरवालों ने भी 'राम ! राम !' की रट का रहस्य समझा | ये अशफाक भी मातृभूमि भारत को 'माता' कहते थे |

निम्नलिखित गीत अशफाक ने जेल में रचा था और इसे कचहरी में सब साथी सस्वर गाते भी थे -

'हे मातृभूमि ! तेरी सेवा किया करूंगा |
फांसी मिले मुझे, या हो जन्म-कैद मेरी,
बड़ी बजा-बजा कर तेरा भजन करूँगा |''

फरमान कृष्ण का 

देश से अनन्य भक्ति हुए बिना किसको कब इस प्रकार बड़ी बजा-बजा कर भजन करने की बात सूझी है ? सो, अशफाक फांसी की कोठरी में भी कुरान शरीफ के साथ ही गीता का सन्देश गले लगाए रहे ! लिखा -

'मौत और जिंदगी है दुनिया का एक तमाशा |
फरमान कृष्ण का था अर्जुन को बीच रण में |'

देश के प्रति उनके ये उदगार साक्षी है उनकी अनन्य देशभक्ति के -

"तेरे ही वास्ते आलम में हो गए बदनाम,
तेरे सिवा नहीं रखते किसी से हम कुछ काम |"
"वतन ! न दे हमें तर्केवफा का तू इल्जाम !
कि आबरू पर तेरी हम निसार हो चले !'

साभार - "धरती है बलिदान की" इतिहास के झरोखे से - लेखक श्री वचनेश त्रिपाठी

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