माओवादी हत्यारों के हमदर्द - विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर

आज  का ताजा समाचार है कि  दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, जेएनयू की प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद, छत्तीसगढ़ मार्क्सवादी कम्यू...



आज का ताजा समाचार है कि दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, जेएनयू की प्रोफ़ेसर अर्चना प्रसाद, छत्तीसगढ़ मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी प्रांतीय सचिव संजय परते, दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान के विनीत तिवारी व अन्य माओवादियों के विरुद्ध छत्तीसगढ़ में पुलिस द्वारा ह्त्या के आरोप में प्रकरण दर्ज किया गया !स्मरणीय है की गत शुक्रवार 4 नवंबर को सशस्त्र नक्सलियों ने रायपुर से 450 किलोमीटर दूर तोंगपाल क्षेत्र में कुमाकोलेंग ग्राम पंचायत के नामा गांव में, कथित तौर पर एक ग्रामीण शामनाथ बघेल की उसके आवास पर हत्या कर दी थी । इस साल अप्रैल के बाद से बघेल और उसके कुछ साथी गांव में नक्सली गतिविधियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे थे ।हत्या के बाद शनिवार को मृतक शामनाथ की पत्नी ने उक्त लोगों के खिलाफ नामजद शिकायत शिकायत दर्ज कराई । इसके बाद पुलिस ने आईपीसी की धारा 120 बी (आपराधिक साजिश), 302 (हत्या), 147 (दंगा भड़काने), 148 और 149 के तहत मामला दर्ज किया ।मृतक बघेल की पत्नी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि उनके पति और अन्य ग्रामीणों ने इस वर्ष मई में जबसे प्रोफेसर नंदिनी सुंदर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, तब से ही उन्हें लगातार माओवादियों द्वारा धमकियां मिल रही थीं ! बघेल की शिकायत पर ही तोंगपाल पुलिस ने सुंदर, प्रसाद, तिवारी, परते और अन्य के खिलाफ सुकमा में कथित तौर पर सरकार के खिलाफ आदिवासियों को उकसाने और माओवादियों के समर्थन का प्रकरण भी दर्ज किया था ।
बस्तर रेंज के आईजी एस.आर.पी कल्लूरी के अनुसार, नामा और पड़ोसी गांव कुमाकोलेंग के ग्रामीणों ने माओवादी गतिविधियों के खिलाफ "स्व प्रेरित विरोध" शुरू किया था तथा इस वर्ष अप्रैल में "टंगिया” (कुल्हाड़ी) समूह" नामक सुरक्षा समूह का गठन किया था । तब से ही सुंदर और अन्य ग्रामीणों को माओवादियों का विरोध न करने के लिए धमका रहे थे ।कम्यूनिस्टों का माओवादी हत्यारों को समर्थन कोई नई बात नहीं है ! देश के विश्वविद्यालयों में लाखों रुपये की पगार हड़पने वाले ये तथाकथित बुद्धिजीवी ही माओवादी हिंसा के आवरण और उत्प्रेरक की भूमिका निभा रहे हैं ! माओवादियों की हिंसक गतिविधियों के खिलाफ जब भी कोई अभियान चलता है, मानवाधिकार के नाम पर उसका विरोध करने ये लोग दिल्ली से बस्तर की दौड़ लगा देते हैं ! गोया मानवाधिकार केवल माओवादियों के ही हैं, उनके हाथों जान गंवाने वाले शामनाथ जैसों का खून तो मानो पानी है, फिजूल है, उनके पक्ष में एक शब्द भी इन नृशंस बुद्दिजीवियों की जुबां से निकलता कभी नहीं सुना गया ! माओवादियों के खिलाफ अभियान चाहे ग्रामीण चलायें अथवा सरकार, इनका काम उसका विरोध करना भर है ! बहुचर्चित सलवा जुडूम को असफल बनाने में इन लोगों की ही भूमिका सर्वाधिक रही है !
पिछले महीने ही प्रोफेसर नंदिनी सुंदर की एक पुस्तक भी प्रकाशित हुई है – “The Burning Forest: India’s War in Bastar हिन्दी अर्थ तो आप समझ ही गए होंगे - जलता हुआ जंगल : बस्तर में भारत का संग्राम ! मानो बस्तर गुलाम प्रदेश है, जिसकी आजादी के लिए भारत का प्रतीक माओवाद संघर्षरत है ।

आइये नंदिनी सुंदर के विषय में कुछ और जानें –

नंदिनी सुंदर का विवाह न्यूज़ पोर्टल “The Wire के संस्थापक संपादकों में से एक प्रसिद्ध वामपंथी पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन से हुआ है ! वरदराजन को वर्ष 2011 में अंग्रेजी समाचार पत्र द हिन्दू का सम्पादक नियुक्त किया गया ! 2012 में श्री सुब्रमन्यम स्वामी ने उनकी इस नियुक्ति को उनकी अमरीकी नागरिकता के आधार पर चुनौती दी और 21 अक्टूबर 2013 के सिद्धार्थ वरदराजन ने सम्पादक पद से त्यागपत्र दे दिया ! हालांकि कारण कुछ और बताया !
इतना पढ़ने के बाद आप समझ ही गए होंगे कि मामला इतना आसान नहीं है ! पतिदेव अमरीकी पत्रकार है और प्रभावशाली भी ! स्वयं नंदिनी जी भी किसी से कम नहीं हैं ! अतः यह दर्ज मामला भी टांय टांय फिस्स होने के पूरे पूरे आसार हैं, जैसे की एनडीटीवी पर एक दिवसीय प्रतिबन्ध मामले में हुआ !

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क्रांतिदूत: माओवादी हत्यारों के हमदर्द - विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर
माओवादी हत्यारों के हमदर्द - विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर
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