व्यवहारिक वेदान्त

vishnu tample shivpuri सियाराम मय सब जग जानी, करहूँ प्रणाम जोर जुग पानी | यह भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है | यहाँ मनुष्य दूसरे से घृण...

vishnu tample shivpuri

सियाराम मय सब जग जानी, करहूँ प्रणाम जोर जुग पानी |
यह भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है | यहाँ मनुष्य दूसरे से घृणा नहीं प्रेम करता है, अनेकता को नकारता नहीं, उसमें भी एकत्व की अनुभूति करता है |
ज्ञानियों ने कहा कि मनुष्य और परमात्मा ऐसे हैं, जैसे माला में धागा | माला भी ऐसी कि जिसमें मनका भी सूत का है, और धागा तो है ही सूत | माना गया कि वह परमात्मा किसी लोक में या सातवें आसमान में नहीं रहता, वह तो कण कण में है | स्वामी राम कहते हैं, वेदान्त कहता है कि कण कण भी परमात्मा का ही रूप है| अर्थात वह परमात्मा हर रूप में अभिव्यक्त होता है | अतः हमारा व्यवहार दूसरों से ऐसा हो, जैसे स्वयं से होता है | कोई गिला शिकवा नहीं, शिकायत नहीं |
वेद का अंतिम भाग हैं उपनिषद, उनमें वेदांत की व्याख्या की गई, अर्थात अद्वैत का प्रतिपादन हुआ | स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ ने व्यवहारिक वेदान्त का प्रतिपादन किया | प्रश्न उठता है कि वेदान्त और व्यवहारिक वेदान्त में क्या अंतर है ?
इसे यूं समझा जाए | विष्णू का अर्थ है, जो व्यापक है | जो सर्व व्यापक होकर जगत को चैतन्य कर रहा है | वेदान्त मूर्तिपूजा, भक्तिभाव को अस्वीकार नहीं करता, किन्तु उसकी सार्थकता तब ही है, जब आप विष्णु तत्व से जुड़ें, वह आपसे जुड़े |
कामना के विषय में भी वेदान्त की धारणा स्पष्ट करने की जरूरत है | जीवन में आत्मचिंतन व स्वाध्याय आवश्यक है | जिनकी आध्यात्मिक चेतना का विकास नहीं होता, वे मनोविकार से ग्रस्त हो जाते हैं |
एक बन्दा नई साईकिल लेकर आया | मंदिर दर्शन के लिए चला | तो एक हाथ से साईकिल पकड़कर उसे धकेलते हुए दौड़ा चला जा रहा था |
किसी ने पूछा – क्या हुआ भाई साईकिल खराब है क्या ?
उसने कहा कि आज ही खरीदी है, खराब कैसे होगी ?
फिर सवाल हुआ – तो क्या चलाना नहीं आता, जो धकेल कर ले जा रहे हो |
झुंझलाकर बन्दे ने कहा – अरे भाई साईकिल भी बढ़िया है, चलाना भी बढ़िया आता है, लेकिन जल्दी में हूँ, बैठने की फुर्सत नहीं है |
हमारे जीवन में विषाद की जड़ भी यही है | ज्ञान की अवहेलना करते हैं, जबकि ज्ञान के बिना बंधन मुक्त होना संभव नहीं | वेदांत अर्थात ऐसा ज्ञान, जो हमें अद्वैत की स्थिति में ले जाता है, जिसे जानने के बाद, कुछ और जानना शेष नहीं रह जाता | उस ज्ञान की प्राप्ति में ही जीवन की सार्थकता है |
हमारा लक्ष्य क्या, उस लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग क्या, उस मार्ग में आने वाली वाधाओं को पार करने के लिए कौन सी सावधानी जरूरी, यही वेदान्त है |
पशु वह जो धर्म का आचरण नहीं करता, किन्तु मनुष्य जब गिरता है, तो पशु से भी निकृष्ट हो जाता है, सारी मर्यादा तोड़ देता है |
वेदान्त ऐसी कुंजी, जो मोक्ष का ताला खोल देता है | जान लेना उपलब्धि नहीं, महापुरुषों को श्रवण कर लेना भी उपलब्धि नहीं, उसे जीवन में उतारने का नाम है वेदान्त | प्यास लगी है, तो पानी पानी चिल्लाने से प्यास नहीं बुझती, पानी पीना ही पड़ता है |
एक विद्वान् विश्लेषक आये और प्यासे को समझाने लगे कि अरे भाई तुम्हारा शरीर तो पंच तत्व से बना है – क्षिति जल पावक गगन समीरा | तो पानी तो तुम्हारे शरीर में ही है, व्यर्थ काहे चिल्ल पों मचाते हो | क्या प्यासे को समझ में आयेगा ?
पानी के विषय में जान लेने भर से, वह शरीर में ही है, यह ज्ञान होने पर भी, प्यास नहीं बुझने वाली |
महापुरुषों ने कहा कि यह जीवन यह दुनिया ईश्वर की लीला है, उसका खेल तमाशा है | इसे यूं समझें कि जब हम कोई नाटक या मूवी देखते हैं, तो अभिनेता के अभिनय का प्रभाव भी हम पर पड़ने लगता है | उनके दुःख में दुखी होकर रोने भी लगते हैं | इसी प्रकार उनकी खुशी में खुश होने लगते हैं | जब हम समझ जायेंगे कि क्या सत्य है, क्या असत्य, तो वेदान्त जीवन में उतर जाएगा |
जनक को विदेह कहा गया है | एक रात उनने स्वप्न देखा कि उनका सब कुछ चला गया है, हालत यह कि खाने को भी कुछ नहीं है | भूख से व्याकुल होकर दर दर पर भीख मांगते घूम रहे हैं | सोचिये कि सम्राट भिखारी बन गया | कोई उसे भीख भी नहीं दे रहा | एक गरीब महिला, झूठा बासी चावल फेंकने जा रही है, जनक ने उससे विनती की कि देवी फेंको मत मुझे दे दो | उसने कहा भी कि यह खाने योग्य नहीं है, जनक उससे आग्रह पूर्वक ले लेते हैं | जैसे ही वे खाने को उद्यत होते हैं कि तभी एक कुत्ता उनके हाथ से वह चावल भी छीन कर भाग जाता है | दुखी जनक निराशा में अपना हाथ सर पर पटकते हैं, कि हा दुर्भाग्य | और आँख खुल जाती है और देखते हैं कि अपने महल में हैं, अपने आरामदायक बिस्तर पर, सरहाने खडी दासी पंखा झल रही है |
दूसरे दिन सभा में उन्होंने ऋषियों को आचार्यों को बुलाकर पूरा वृतांत सुनाया और पूछा – मैंने रात को सोते समय जो देखा वह सत्य था, या इस समय जो जागृत अवस्था में देख रहा हूँ, वह सत्य है ?
अष्टावक्र जी ने जबाब दिया कि हे राजन न तो रात में जो स्वप्न देखा वह सत्य था और न ही वह सत्य है, जो आप इस समय देख रहे हैं | सत्य अगर कुछ है तो केवल आप हैं | केवल आप ही सत्य हैं | आपने ही स्वप्न देखा और आप ही जागृत अवस्था में देख रहे हो |
यह परिपक्वता, हमारे होने की इस स्पष्टता का नाम है वेदान्त |
एक भिखारी जब मरा तो लोगों ने उसके घर की सफाई की | उसके बिस्तर के नीचे ही अकूत संपत्ति का खजाना गढ़ा हुआ मिला | हम अपने आप को अपूर्ण मानकर जीवन भर दुखी रहते हैं, सुख की तलाश करते रहते है | लेकिन वेदांत बताता है कि आप अपूर्ण नहीं पूर्ण हो, यह आभाष होते ही “आनंद ही आनंद” |
बुद्ध से किसी शिष्य ने पूछा कि आप राजमहल छोड़कर जंगल में पहुँच गए, क्या कुछ मिला ?
बुद्ध ने कहा – मिला कुछ नहीं, जो था उसका पता चल गया |


जो है उससे परिचय का नाम ही है स्वामी राम का व्यवहारिक वेदान्त |

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