आधुनिकता का गरुर (लघुकथा)- डा. राधेश्याम द्विवेदी

पापा मुझे चोट लग गया खून आ रहा है। स्कूल के लिए निकलते एक बच्चे के मुख से ये शब्द निकला था। 5 साल के अपने बच्चे के मुँह से इतना सुनते ...

पापा मुझे चोट लग गया खून आ रहा है। स्कूल के लिए निकलते एक बच्चे के मुख से ये शब्द निकला था।

5 साल के अपने बच्चे के मुँह से इतना सुनते ही लगभग 40 साल पूर्व साधारण सा दिखने वाले एक पापा सब कुछ छोड़ छाड़ कर बच्चे को गोदी में उठाकर एक किलो मीटर की दूरी तय करके अपने पारिवारिक डाक्टर की क्लिनिक तक भाग कर ही पहुँच गए थे। उन्होंने उस समय दुकान व कैश काउंटर सब नौकर के भरोसे छोड़ आये थे।

वे सीधे डाक्टर के केबिन में दाखिल होते हुए बोले, देखिये डॉक्टर साहब। मेरे बेटे को क्या हो गया? इसके शरीर में चोट से घाव हो गया है और खून बन्द ही नहीं हो रहा है।

डॉक्टर साहब तुरन्त ही ड्रेसिंग करने लगे थे। पापाजी को आश्वस्त करते हुए कहा था, अरे भाई साहब, घबराने की कोई बात नहीं। मामूली सा चोट था। ड्रेसिंग कर दी है, ठीक हो जायेगा।

डॉक्टर साहब, कुछ पेन किलर लिख देते, दर्द और कम हो जाता। अच्छी से अच्छी दवाईया लिख दीजिए ताकि मेरे बेटे का घाव जल्दी ठीक हो जाय। 

डाक्टर ने आश्वस्त करते हुए कहा था , अरे भाई साहब, क्यों इतने परेशान हो रहे हो? कुछ नहीं हुआ है। 3-4दिन में पूरा ठीक हो जायेगा। बच्चों को तो इस तरह का चोट चपाट लगती रहती है।

पर डॉक्टर साहब, इसको रात को नींद तो आ जायेगी ? अधीर होकर पापा ने पूछा था।

डॉक्टर ने बहुत इत्मीनान से कहा, हाँ भाई साहब, आप चिंता मत कीजिए। 

पपाजी बच्चे को लेकर घर लौटे तो नौकर बोला,सेठ जी आपका शर्ट खराब हो गया है, उसपर खून लग गया है। ये दाग अब नहीं निकलेंगे। यह सर्ट बेकार हो गयी है।

भाई साहब, कोई बात नहीं। पापा ने कहा था। एसे शर्ट बहुत आ जायेंगे। मेरे बेटे का कितना खून बह गया। कितने दिनों की खुराक निकल गयी। हमें यह चिंता खाये जा रही है कि कहीं कमजोर ना हो जाये मेरा बेटा। तू जा एक काम कर। थोड़े सूखे मेवे व कुछ फ्रूट ले आ। इसे खिलाना पड़ेगा और मैं घर पर चलता हूँ।

40 साल बाद आज एक दूसरा दृश्य घटित हुआ है। वह 40 साल पूर्व का बच्चा आज पापा की शक्ल पा गया है। और पुराने पापा अब बुड्ढे दादाजी बन गये हैं। उनकी पुश्तैनी दुकान अब शोरूम में तब्दील हो गई है। दादाजी का बेटा बिजनेस बखूबी संभाल रहा है। दादाजी रिटायर्ड हो चुके हैं। घर पर ही रहते हैं। 

तभी घर से बेटे की बीवी का फोन आता है। बीवी बोलती है, अजी सुनते हो। ये आपके पापा पलंग से गिर गए हैं। सिर में से खून आ रहा है।

लड़का बोला,अरे यार, ये पापा भी हैं ना। अपने मन का करते हैं। इनको बोला था कि जमीन पर सो जाया करें ,पर मानते ही नही पलंग पर ही सोतें हैं। अरे रामू काका जाओ तो घर पर पापाजी को डॉक्टर साहब के पास ले कर जाओ, मैं आकर मिलता हूँ वहीं पर।

बूढ़े हो चुके रामू काका किसी तरह चल कर धीरे धीरे घर जाते हैं। तब तक दादाजी का काफी खून बह चुका था। बहू मुँह चिढ़ा कर बोली, ले जाओ इन्हें जल्दी। इतना महंगा कालीन खराब हो कर दिया है इन्होंने।

रामू काका जैसे तैसे जल्दी से रिक्शा में सेठजी को डालकर डाक्टर साहब की क्लीनिक ले गए। बेटा अब तक नही पहुंच सका था।

रामू काका ने फोन किया और बोला, भैयाजी आ जाओ। मैं दादाजी को ले आया हॅू। बहुत खून निकल चुका है।
बेटे ने कहा,अरे काका, कार की चाबी नही मिल रही थी। अभी मिली है। थोड़े कस्टमर भी हैं। इन्हें निपटाकर मैं अभी आता हूँ। आप उन्हें लेकर बैठो और डाक्टर साहब को दिखाओ। 

जो दूरी 40 साल पहले एक बाप ने बेटे के सर पर खून देखकर 10 मिनट में बेटे को गोदी में उठा कर भाग कर तय कर ली थी। वही दूरी उसी बाप के बेटे ने 1घन्टा 20 मिनट में कार से भी तय नही कर पाया था। आज एक साधारण और एक सम्पन्न बाप के प्राथमिकताओं , संसाधनों व सोच से यह अंतर स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

डाक्टर साहब ने जैसे ही दादाजी को देखा उनको अंदर ले गए थे। इलाज चालू कर दिया था। तब तक बेटा भी पहुँच गया था। डॉक्टर साहब बोले, बेटे, खून बहुत बह गया है। एडमिट कर देते तो ठीक रहता। जल्दी रिकबर हो जाएगा।

बेटा बोला, अरे कुछ नही होगा डाक्टर साहब। आप ड्रेसिंग कर दो, ठीक हो जायेगा 2-4 दिन में।

डाक्टर साहब बोले, ठीक है कुछ दवाईया लिख देता हूँ। थोड़ी महंगी है, लेकिन आराम जल्दी हो जायेगा।

’लड़का’ बोला ,अरे डॉक्टर साहब, सस्ती दवाइयां भी चलेगा। 4-5 दिन ज्यादा ही तो लगेंगे , अब इतनी महंगी दवाइयो की क्या जरूरत ? चलो ठीक है। मुझे निकलना पड़ेगा शोरूम पर कोई नहीं है।

बेटे के व्यस्तता और अनमनस्कता की बात सुनते ही डॉक्टर साहब के सब्र का बांध टूट गया था। वे उस खानदान के परिवारिक डाक्टर जो थे। सबको बखूबी जानते और पहचानते थे। उन्हें दादाजी द्वारा 5 साल के बच्चे को दिखाये जाने की पहले वाली घटना याद आ गयी। जब उसे पचा पाना मुश्किल हो गया तो उन्होंने 40 साल पहले की बाप बेटे की पूर्व घटना पूरी की पूरी कह सुनाई। इसे सुनकर बेटे की आँखों आंसू बहने लगे थे। उसे अपने गल्तियों का एहसास होने लगा था। साथ ही उसे बहुत पश्चाताप भी हो रहा था। वह कुछ उधेड़बुन में सोच ही रहा था कि उसकी बहू का फोन आ गया। 

वहू बोली, पापा जी ने महंगा कालीन खराब कर दिया है। इसका अब मैं क्या करूँ ?

बेटा बोला, कालीन ही खराब हुआ है ना। नया आ जायेगा। तुम पलंग पर नया चद्दर और गद्दा डाल दो। मैँ पापाजी को ले कर आ रहा हूँ।

पापाजी के आँखों में आँसू भर आये थे और ये खुशी के आंसू थे। चोट का दर्द गायब हो गया था। बेटे के अपनेपन ने सब कुछ भुलवा दिया था। बस अब तो मौत भी आ जाये तो कोई गम नहीं होगा , अब सब कुछ मंजूर है।

दोस्तों, ये आज की सच्चाई है। यह एक घर की नहीं बल्कि घर घर की कहानी है। आज हमारे अंदर का इंसान मर चुका है। आज के बूढ़े माँ बाप अकेलेपन का जीवन जीने को विवश हो रहे हैं। बेटा कामयाबी और दौलत की चकाचैंध में कहीं खो कर सब कुछ भूल चुका है। बेटी मां बाप का ज्यादा ख्याल तो करती है। पर उसकी विवसता भी है। वही वेटी अपने सास ससुर के प्रति ठीक वैसा ही वर्ताव करती है जैसा उसका पति रखता है। आज हर घर में पीढ़ी दर पीढ़ी यही कहानी आम हो गयी है। जो बाप अपने सीमित साधन में परिवार के हर सदस्य की जरुरतों को पूरा करते करते अपना निजी कुछ नहीं बनाकर रखा। आज उसके बेटे और बहू अच्छे से अच्छे साधन होते हुए भी उसकी देखरेख से अपना मुख मोड़ते देखे जा सकते हैं। यह भारत की सभ्यता कतई नहीं है। पश्चिम के नकल तथा फिल्मों के प्रभाव ने भारत की सभ्यता और शिष्टाचार को पूरी तरह झकझोर दिया है। मानता हॅू कि पानी हमेशा नीचे की तरफ ही बहता है। यह उसका प्रकृति प्रदत्त स्वभाव है। बाप अपने बेटे के प्रति ज्यादा लगाव रखता है और बेटा अपने बेटे के प्रति। पर इससे आगे भी दुनिया कब से चली आ रही है। जब नाती पोते को दादा दादी पालते थे और जवान बेटे केवल कमाई में ही मशगूल रहते थे। यही संयुक्त परिवार की बुनियाद थी। जो आज दिनो दिन खोखली होती जा रही है। हमें इसे तत्काल सुधारना होगा।

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आधुनिकता का गरुर (लघुकथा)- डा. राधेश्याम द्विवेदी
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