हिन्दू मुस्लिम के बीच खिंची दीवार, जिम्मेदार वामपंथी इतिहासकार - आर जगन्नाथन , संपादकीय निदेशक, स्वराज्य

आज अगर हिंदू-मुस्लिम सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण नहीं है, तो उसका मूल कारण है वामपंथ | वामपंथी नहीं चाहते कि इन दोनों पक्षों के सामान्य सम्बन्ध...



आज अगर हिंदू-मुस्लिम सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण नहीं है, तो उसका मूल कारण है वामपंथ | वामपंथी नहीं चाहते कि इन दोनों पक्षों के सामान्य सम्बन्ध बनें । पारस्परिक अविश्वास की दीवार वाम दलों द्वारा बनाई गई है। इस बात को समझकर हिंदुओं और मुसलमानों को भी एक दूसरे पर तलवार भांजने के स्थान पर वामपंथियों के खिलाफ एकजुट हो जाना चाहिए । 

अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस खेहर द्वारा दिया गया सुझाव कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का हल दोनों पक्षों को आपसी बातचीत से सुलझाना चाहिए, विद्वत्ता पूर्ण है | यह निर्विवाद तथ्य है कि यह मुद्दा लम्बे समय से हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए प्रतिष्ठा और आस्था का प्रश्न बना हुआ है | अगर जिद्द और हठ छोड़ दें तो यह भी स्थापित तथ्य है कि 16 वीं शताब्दी में बनी मस्जिद वस्तुतः एक विशाल मंदिर को ध्वस्त कर बनाई गई थी, जिसे 1 99 2 में हिंदुत्व के ज्वार ने विध्वंश कर दिया ।

भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद श्री सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा दायर की गई याचिका की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने 21 मार्च को कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे का सबसे अच्छा हल आपसी बातचीत ही है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दोनों पक्ष चाहें तो वार्ता की मध्यस्थता के लिए भी वे तैयार हैं ।

जैसा कि पुर्व अनुमान था बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का रुख अड़ियल ही रहा और समिति के संयुक्त संयोजक एस क्यू आर इलियास ने कहा था कि विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) और बाबरी मस्जिद समिति के बीच पहले भी वार्ता हो चुकी हैं, जिनका कोई नतीजा नहीं निकला । इसलिए इस मुद्दे को कानूनी आधार पर ही निबटाया जाना चाहिय, भावनाओं के आधार पर नहीं ।

पर यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि सितंबर, 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए कानूनी फैसले को सबसे पहले ठुकराने में भी यही कमेटी सबसे आगे रही थी | उक्त फैसले के अनुसार विवादित भूमि का दो तिहाई भाग हिंदुओं के पक्ष में तथा एक तिहाई जमीन मुसलमानों को देने की बात कही गई थी, जिसे समिति ने खारिज कर दिया था । इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति एसयू खान, सुधीर अग्रवाल और डीवी शर्मा की बेंच द्वारा दिए गए इस फैसले को एक राजनीतिक समझौता बताया गया था ।

यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि एक सौहार्दपूर्ण समझौते के लिए वार्ता 1 99 0 के दशक में शुरू हुई, किन्तु वह असफल हुई तो रोमिला थापर और इरफान हबीब जैसे वाम इतिहासकारों की बजह से, क्योंकि इन लोगों ने प्रभावी ढंग से मुसलमानों को मुकदमेबाजी के लिए उकसाया। वाम ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक स्थायी दीवार खडी कर दी, जैसा कि आज़ादी से पहले ब्रिटिश ने किया था।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक केके मोहम्मद ने अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक, नजान एनना भारतीयन (मैं, एक भारतीय) के संदर्भ में फर्स्टपोस्ट को दिए अपने एक साक्षात्कार में कहा, "यदि वामपंथी इतिहासकारों द्वारा मुस्लिम बुद्धिजीवियों का ब्रेन वाश न किया गया होता, तो बाबरी मुद्दे का बहुत पहले समाधान हो गया होता । रोमिला थापर, बिपीन चंद्रा और एस गोपाल जैसे इतिहासकारों के इस समूह ने तर्क दिया कि 1 9वीं सदी से पहले मंदिर को ध्वंश करने का कोई उल्लेख नहीं है और अयोध्या तो वास्तव में एक बौद्ध-जैन केंद्र है। इतिहासकारों इरफान हबीब, आर एस शर्मा, डी एन झा, सूरज भान और अक्लम अली ने भी इनका समर्थन किया । "

तदुपरांत इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश मुहम्मद ने बाबरी मस्जिद स्थल की खुदाई का आदेश दिया, और सभी जानते हैं कि उस खुदाई में एक पुराने हिंदू मंदिर का अस्तित्व स्पष्ट रूप से प्रमाणित हुआ ।

इतिहासकार मीनाक्षी जैन ने अपने शोध द्वारा वाम इतिहासकारों की इतिहास में राम और अयोध्या को लेकर की गई कुटिलता पर जोर दिया है | उन्होंने अपने नवीनतम शोध, “The Battle for Rama”, में यह भी साबित किया है कि अनेक मुस्लिम भी मानते हैं कि उक्त मस्जिद का निर्माण मंदिर को नष्ट कर किया गया था |

जैन ने मौलाना हकीम सैय्यद ताब्रीज खान द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी में लिखी पुस्तक का हवाला दिया है, जिसमें अयोध्या के पवित्र शहर में तिमुरीद राजा बाबर द्वारा निर्मित महान मस्जिद के बारे में उल्लेख है । उसमें लिखा है कि यह मान्यता है कि राम चन्द्र, जिन्हें भगवान का अवतार माना गया, यहाँ पैदा हुए थे। उनकी पत्नी सीता के विषय में विस्तार से उल्लेख है | इस शहर में उनका एक विशाल मंदिर था और एक निश्चित स्थान था, जहाँ सीता अपने परिवार के लिए खाना बनाती और खिलाती थीं । खैर, राजा बाबर ने इसे ध्वस्त कर दिया और उस जगह पर एक मस्जिद का निर्माण किया जिसमें वे ही पत्थर उपयोग किये गए । "

जैन ने 1766 और 1771 के बीच इस क्षेत्र की यात्रा करने वाले ऑस्ट्रियाई जेसुइट जोसेफ टेफ़ेन्थलर के एक लेख से भी उद्धरण दिया, जिसमें लिखा था: "यहां एक घर था जहां बेस्चन (विष्णु) राम के रूप में पैदा हुआ था ... बाद में औरंगजेब या बबोर ने इस जगह को उखाड़ फेंका ताकि अच्छे लोगों को अपनी आस्था के अनुरूप प्रार्थना करने का अवसर न मिले। "

जैन ने 1 9वीं शताब्दी के जर्मन इंडोलोजिस्ट और लखनऊ प्रांतीय संग्रहालय के क्यूरेटर अन्तोन फुहरेर का भी उद्धरण दिया, जिनका निम्न रिकॉर्ड उपलब्ध है : "जन्मस्थानम में रामचंद्र का पुराना मंदिर बहुत अच्छा रहा होगा, क्योंकि बाबर की मस्जिद के निर्माण में मुसलमानों द्वारा इसके कई स्तंभों का उपयोग किया गया है । "

जैन ने कई अन्य स्रोतों को उद्धृत करने के बाद निर्विवाद रूप से इस तथ्य की पुष्टि की है कि मस्जिद वास्तव में उसी स्थान पर बनाई गई थी, जहाँ पूर्व में एक भव्य मंदिर अस्तित्व में था।
यदि यही मामला है, तो इसमें कानूनी विवाद क्या है, जिसे सुलझाने की कवायद होती रही है?

एक तो यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता के समय यहाँ एक मस्जिद अस्तित्व में थी, अतः यह संपत्ति का विवाद है, जिसे निपटाने की आवश्यकता है। लेकिन इलाहाबाद न्यायालय इसे खारिज कर चुका है ।

दूसरा बाबरी कमेटी यह विषय उठा सकती है कि भारत सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करने के लिए बाध्य थी, जब 6 दिसंबर 1992 को वह ढांचा ढहाया गया, सरकार को उस संरचना की रक्षा करना चाहिए थी । कम से कम, विध्वंस के लिए जिम्मेदार लोगों को दण्डित तो किया ही जाना चाहिए था । लेकिन यह भी सही है कि ढांचे को ध्वस्त करने के कई आरोपी विभिन्न अदालती प्रक्रियाओं में उलझे हुए हैं । ज्यादा से ज्यादा आप यह कह सकते हैं कि ढांचा गिराने वाले नेता अभी तक दण्डित नहीं हुए ।

निश्चित रूप से ये बिंदु ध्यान देने योग्य हैं, किन्तु क्या मस्जिद के विवादास्पद अस्तित्व के इतिहास से इनकार किया जा सकता है, जिसे आजादी के पूर्व से हिंदुओं ने कभी स्वीकार नहीं किया ? स्वतंत्रता से पहले हिन्दू स्वतंत्र नहीं थे, तो पवित्र हिंदू तीर्थ पर उनकी जमीन पर जबरदस्ती बनाई गई मस्जिद कैसे, क्या वह उनकी सहमति से बनी ? आखिर स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भी तो हुआ ।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने भावना और वैधता के दो मुद्दों के बीच सुनहरा अर्थ खोजने का प्रयास किया था। यह न्यायिक फैसले उचित फैसले है, और भविष्य में होने वाले कोई भी फैसले इसी आधार भूमि पर होंगे ।

यही कारण है कि मुख्य न्यायाधीश महोदय ने एक सौहार्दपूर्ण समाधान खोजने की पेशकश की, जिससे जहां राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो, साथ ही मुसलमानों को भी उनके नुकसान के लिए मुआवजा दिया जा सके | अपराधी तो दोनों ही है - एक ऐतिहासिक, तो एक हालिया – न्यायालय का फैसला आत्म निरीक्षण का अच्छा अवसर होगा।

सौजन्य: स्वराज्य

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क्रांतिदूत: हिन्दू मुस्लिम के बीच खिंची दीवार, जिम्मेदार वामपंथी इतिहासकार - आर जगन्नाथन , संपादकीय निदेशक, स्वराज्य
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