परवरिश (लघुकथा) - डा. राधेश्याम द्विवेदी

मां- बाप कैसे कैसे अपने बच्चे की परवरिश करते हैं, इसे शायद ही उनके बच्चे समझते होंगे। और जब तक वह समझते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती...

मां- बाप कैसे कैसे अपने बच्चे की परवरिश करते हैं, इसे शायद ही उनके बच्चे समझते होंगे। और जब तक वह समझते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। मां- बाप अपनी ममता को एकतरफा अपने बच्चे के प्रति लुटाते जाते हैं। उन्हें अपना व्यक्तिगत जीवन भी ऐन- केन प्रकारेण गुजारना पड़ता है। कोई- कोई समझदार बेटे मां- बाप के दर्द को समझ लेते हैं और मां-वाप का सहारा बन उनकी बुढ़ापे की नैया पार लगा देते हैं और कोई- कोई तो अपने अलग ही दुनिया में इतना आगे बढ़ जाते हैं कि उनकी संवेदनायें मां- बाप के लिए मर सी जाती हैं। मां -बाप को एक जिल्लतभरी जिन्दगी गुजारनी पड़ जाती है। वह अपने सपने को भूलकर बच्चों के सपनों को पूरा करने में अपनी पूरी जिन्दगी गुजार देते हैं और ऊफ तक नहीं कहते हैं। मां अपना दर्द ना तो अपनी औलाद को बांटती है और ना ही अपने पति से। बाप भी अकेले कम संसाधन में बच्चे की जरुरतों को पूरा करने के लिए न तो पत्नी से अपना हर दुख शेयर कर पाता है और बच्चे से कहने की तो कोई बात नहीं उठती हैं। 

दुनिया की चकाचौध के आज के जमाने के बच्चे पता नहीं क्या क्या अरमान पाल लेते हैं कि उन्हें खुद को भी कुछ पता नहीं होता कि आगे वे अपने मकसद में सफल भी होंगे या असफल। फिर भी माता- पिता सब दर्द सहते हुए अपने बच्चे की मुस्कान तथा उज्जवल भविष्य के लिए अपने सुख चैन की कुरबानी तक दे ही डालते हैं। इस मामले में लड़कियों का नजरिया लड़कों की अपेक्षा थोड़ा अलग होता है। वे अपनी बुनियादी माता- पिता के दुख दर्द को समझती हैं और उसे हल करने की कोशिस भी करती हैं। यह भी देखा गया है कि वही लड़की जितना संवेदनशील अपने माता- पिता के प्रति होती है उतना अपनी सास- ससुर के प्रति नहीं हो पाती है। काश! ये समझदारी हर प्राणी में आती तो आज कितना खुशनुमा माहौल रहता। आज एसा ही एक बाकया आपसे शेयर करने को दिल चाह रहा है। 

रबि नाम का एक बेटा आज बड़े गुस्से से मैं घर से निकला था। शायद इंजीनियर बनना उसका सपना था। उसकी हर जरुरतें उसके माता पिता पूरा करने की कोशिस करते रहते थे। उसे आज इतना गुस्सा आ गया था कि गलती से अपने जूते पहनने के बजाय पापा के ही जूते पहन के निकल गया। उसने पापा का पर्स तो जानबूझकर उठा लिया था। उसे लगा कि इसमें जरुर काफी माल- टाल होगा और वह उसके बल पर आज खूब घूम टहलकर अपने मन की मुराद पूरी कर लेगा। पापा अपने पर्स को किसी को हाथ तक नहीं लगाने देते थे। उसे पता है इस पर्स मैं जरुर पैसो के हिसाब की डायरी होगी। पता तो चले कितना माल छुपाया है पापा ने। वह माँ से भी कुछ ना कुछ छिपाकर रखते हैं। कई बार उन्होने रबि की जरुरतें पूरी किया है। इसीलिए वे पर्स पर हाथ नहीं लगाने देते किसी को।

उसने यह भी सोच लिया था कि आज वह अपना घर छोड़ ही देगा, और तभी लौटेगा जब बहुत बड़ा आदमी बन जायेगा। पापा के टूटे- फूटे पर्स से पैसे निकालकर वह कहीं दूर जाकर कोई भी छोटी- बड़ी नौकरी कर लेगा और अपने बल पर एक बड़ा आदमी बनकर दिखाएगा। मोहल्ले में उसके कई दोस्तों के पास लैपटाप था। उसे लैपटॉप और ब्रान्डेड मोबाइल तो मिल चुका था। उसके कई साथियों के पास मोटर साइकिलें थीं। रबि का मन भी इन सुविधाओं के लिए लालायित होता था। वह बार- बार झल्लाता था कि जब मोटर साइकिल नहीं दिलवा सकते थे, तो इंजीनियर बनाने के सपना क्यों देखतें है?

जैसे ही रबि कच्चे रास्ते से सड़क पर आया, उसे लगा जूतों में कुछ चुभ रहा है। उसने जूता निकाल कर देखा। उसकी एडी से थोडा सा खून रिस आया था। जूते की कोई कील निकली हुयी थी। दर्द तो हुआ पर गुस्सा भी बहुत आया था। गुस्से के आगे दर्द का एहसास कम हो पा रहा था। आज रवि को जाना ही था घर छोड़कर। जैसे ही कुछ दूर और चला, उसे पांवो में गीला गीला लगा। सड़क पर पानी बिखरा पड़ा था। उसने पाँव उठा कर देखा तो जूते का तलवा टूटा हुआ था। वह जैसे तेसे लंगडाकर बस स्टॉप पहुंचा। वहां पता चला एक घंटे तक कोई बस नहीं थी। उसने सोचा क्यों न पर्स की तलाशी ली जाये ? उसने पर्स खोला, एक पर्ची दिखाई दी, लिखा था। लैपटॉप के लिए 40 हजार उधार लिए हैं। 

दूसरा एक मुड़ा हुआ पन्ना देखा, उसमे उनके ऑफिस की किसी हॉबी डे का कुछ जिक्र लिखा था। उसने पापा की हॉबी लिखी देखा तो पाया कि उन्होंने अच्छे जूते पहनने को अपनी हाबी लिख रखा था। ओह, रबि के मुख से निकला। अच्छे जूते पहनना था पापा की हाबी , पर उनके जूते तो विल्कुल फटे से हैं। माँ पिछले चार महीने से हर पहली को कहती है नए जूते ले लो। और वह हर बार कहते, अभी तो 6 महीने जूते और चलेंगे। रवि आज समझा कितने चलेंगे ये जूते? उसे गुस्सा की अपेक्षा पापा पर तरस आने लगा। वह समझने लगा कि पापा प्रायः कई बार अपने लिए कुछ खरीदने को क्यों नहीं तैयार होते थे। इसके बावजूद और किसी सदस्य के लिए कीई भी कोई मनाही नहीं थी।

डायरी आगे खोला तो तीसरे मुड़े पेज पर एक पर्ची रखा हुआ पाया। उस पर लिखा था- पुराना स्कूटर दीजिये एक्सचेंज में नयी मोटर साइकिल ले जाइये। पढ़ते ही उसका दिमाग पूरा का पूरा घूम गया। पापा का स्कूटर तभी तो कई दिनों से नहीं दिख रहा है और पूछने पर कहते थे कि सर्विसिंग के लिए दे रखी है।

उसने अपने जेब में हाथ डाला तो उसके हाथ में नये ब्रांड का मोबाइल आ गया। उसे लगा कि इसे भी पापा आसानी से खरीदे नहीं होंगे। और कुछ ना कुछ विशेष इन्तजाम करके ही उसे यह दिये होंगे। उसने पापा को रिंग किया। रिंग जा रही थी, पर फोन उठ नहीं रहा था। कई बार एसा हुआ है कि उसकी काल रिसीव नहीं हो पाती है। यह पुराना फोन रबि का ही था जिसे पापा ने अपने इस्तेमाल के लिए ले रखा था। इसमें कोई आधुनिक साधन था नहीं। केवल बात हो जाया करती थी। कभी कभी तो पापा नम्बर जान लेते तो आफिस के सरकारी फोन से बातें कर लिया करते थे। 

इतने में एक खटारी बस आयी और रबि का घ्यान टूटा। वह अब बस का इन्तजार करना छोड़ दिया था। पापा की पर्स डायरी को उसने अपने जेब में समेटा और घर की ओर भागा। अब उसके पांवो में वो कील नही चुभ रही थी। वह घर पहुंचा। घर पर पापा को नहीं पाया। वह समझ गया कहाँ गए होंगे पापाजी। वह दौड़ा और आटोमोबाइल एजेंसी पर पहुंचा। पापा वहीँ थे और एक टेबिल पर झुककर कोई इस्टीमेट को फाइनल करने वाले ही थे। उसने पापा को उस टेबिल से अलग खीचकर लाया। आज कोई अर्जेन्ट काम आ गया है पापाजी फिर कभी यह डील कर लेंगे। एसा कह वह पापाजी के साथ बाहर निकल आया। अपने स्कूटर के पास आकर वह उनको गले से लगा लिया, और आंसुओ से उनका कन्धा भिगो दिया। नहीं पापाजी नहीं, मुझे अब नहीं चाहिए मोटर साइकिल। बस आप घर चलिये और अपने लिए नए जूते ले लीजिए। ये आपका जूता जो मैं गलती से पहन लिया हूं इस लायक नहीं कि इसे आप अब आगे पहन सकें। मुझे मोटर साइकिल नहीं लेनी है। अब मैं अपने कमाई से ही खरीदूंगा। कोई जल्दी नहीं है। मुझे बड़ा आदमी बनना है। वह भी आपके तरीके से। आप अपना स्कूटर वापस लेते चलिये। कम से कम इमरजेन्सी में आपके काम आएगा। मम्मी को बैठाकर आप उसकी कुछ इच्छा तो पूरी हर ही देंगे।  इतने में उसका मोबाइल ट्रिंग से एक आवाज किया। उसने खोलकर देखा तो एक नया मैसेज आया था – “पापा एक ऐसा क्रेडिट कार्ड है जिनके पास बैलेंस न होते हुए भी बच्चों के हर सपने पूरे करने की कोशिश करते हैं।“

अब एक पल भी रुकना उसे भारी लग रहा था। आज बेटें के व्यवहार में आयी अचानक तबदीली को पापा भांप नहीं पा रहे थे। आज उसने पापा को स्कूटर चलाने नहीं दिया और पापा को पिछली सीट पर बैठाकर खुद ड्राइव करता हुआ वह घर की तरफ आया। दोनों शान्त थे। कोई किसी से बातें नहीं कर रहा था। पापा ने समझा कि लगता है बेटा गुस्से में है। पर एसा नहीं था। घर पहुचते ही उसके मोबाइल ने फिर एक ट्रिंग से एक आवाज किया। उसने खोलकर देखा तो एक नया मैसेज आया था – “माँ एक ऐसी बैंक है जहाँ आप हर भावना और दुख जमा कर सकते है।“ 

स्कूटर खड़ाकर वह सीधे मां के पास गया। मां किचन में कुछ बना रही थी। वह पसीने से तर बतर हो गयी थी। उन्हें पकड़कर वह पंखे के नीचे लाया और कहा कि मां आप परेशान ना हों। आप जो भी रुखी सूखी बना दोगी मैं खा लूंगा। हमें आप लोगों से कोई शिकायत नहीं है। आप लोग हमारी और ज्यादा चिन्ता ना करके अपने स्वास्थ्य के बारे में ध्यान दीजिए। घर गृहस्थी चलती रहेगी। पर माता व पिता दुबारा नहीं मिलते हैं। वह मां के गले से लग गया और सोचने लगा कि मां गीले में सोकर बच्चे को सूखे में सुलाती है। वह खुद कोई चीज ना खाकर पहले बच्चे को देती है फिर अपने पति को और यदि बचा तो खुद खाती है नही तो पानी पीकर सो जाया करती है। उसके मुख से निकला- “मेरे माता पिता तो मेरे ईश्वर हैं। जब तक इनकी छाया है हमारा कोई बाल बांका नहीं कर सकता है।“ तीनों के आखों से आसुओं की धार  रुक ही नहीं रही थी।

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परवरिश (लघुकथा) - डा. राधेश्याम द्विवेदी
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