शहरी नक्सल भारत के 'अदृश्य दुश्मन' - भाग 1

शहरी नक्सल भारत के 'अदृश्य दुश्मन' हैं, उनमें से कुछ को तो पकड़ा जा चुका है, किन्तु अधिकांश आज भी पुलिस राडार के बाहर हैं और भार...


शहरी नक्सल भारत के 'अदृश्य दुश्मन' हैं, उनमें से कुछ को तो पकड़ा जा चुका है, किन्तु अधिकांश आज भी पुलिस राडार के बाहर हैं और भारतीय राज्य व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह फैला रहे है। ये सभी उस तबके में से हैं, जिन्हें शहरी बुद्धिजीवी कहा जाता है | ये प्रभावशाली लोग, नक्सल आन्दोलन की रीढ़ कहे जा सकते हैं, क्योंकि ये ही उनके बौद्धिक रणनीति कार हैं ।
इन सभी शहरी नक्सलियों की महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि इन्होने सामाजिक मुद्दों के विषय में चिंतित होने का नाटक कर आधुनिक युवा पीढी को अपनी गिरफ्त में लेने का प्रयास किया है । हालांकि, सचाई यह है कि उन्होंने कभी भी सामाजिक समस्याओं का हल खोजने की कोई ईमानदार कोशिश कभी नहीं की। वे अपने पोलित ब्यूरो की रणनीति के तहत सिर्फ विरोध प्रदर्शन और उसके माध्यम से जनता को जुटाने का काम करते हैं, ताकि उनका उपयोग पार्टी के निर्माण के लिए किया जा सके । वे अपने संपर्क के छात्रों को विभिन्न महाविद्यालयों में प्रवेश लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिनकी दिलचस्पी पढाई में कतई नहीं होती, बल्कि वे योजनापूर्वक अनुत्तीर्ण होते हैं, ताकि वे कॉलेज परिसर में अधिक से अधिक समय रह सकें।
एक गरीब पृष्ठभूमि के छात्र के लिए तो, एक बड़े शहर के सरकारी हॉस्टल में रियायतों और सुविधाओं के साथ रहना ही अपने आप में एक बड़ी बात है | इसके बाद तो वे मजबूर छात्र अपने आकाओं के इशारों पर नाचने को विवश हो ही जाते हैं । इन छात्रों की सहायता से वे नए छात्रों को आकर्षित करते हैं और 'बूट स्टडी कैंप' का आयोजन करते हैं।
महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) के हत्थे कुछ लोग चढ़े, जिनसे पूछताछ से ये खुलासा हुआ कि प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (नक्सल) ने 2010 के मध्य में पुणे में 15 दिवसीय शिविर का आयोजन किया था। सात पुरुष और चार महिलाओं ने 'शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम' नामक इस 'अध्ययन शिविर' में भाग लिया। इस शिविर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) के स्टेट ओपरेटिव मिलिंद तेलुंबे उर्फ ​​ज्योतिराव उर्फ ​​बडा दीपक, और उनकी पत्नी एंजेलो सोन्ताक्के उर्फ ​​साधना उर्फ ​​राही उर्फ इस्कारा ने नक्सली विचारधारा और नक्सलवाद के विषय में अपने दल के सदस्यों और संभावित रंगरूटों को जानकारी दी । स्मरणीय है कि उक्त महिला कम्युनिस्ट पार्टी, सीपीआई (नक्सल) की सचिव भी हैं |
शिविर का आयोजन स्थल पुणे जिले के खेद तालुका में बंगारवाडी के छोटे से कुड़ेड़ बर्डुक गांव था, जो शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर था। धवला डेनेगल उर्फ ​​दीपक डेंगलला उर्फ ​​प्रताप के रिश्तेदार एक स्थानीय किसान के एक कमरे में यह प्रशिक्षण संपन्न हुआ । उस किसान को यह बताया गया था कि इस शिविर में आदिवासी मुद्दों के अध्ययन हेतु पुणे और मुंबई के शिक्षक भाग लेंगे |
प्रताप पुणे नगर निगम (पीएमसी) के वाहन विभाग में कर्मचारी था, जिसे मई 2011 के प्रारम्भ में एटीएस द्वारा उसके कथित नक्सल लिंक के चलते गिरफ्तार किया गया था। उससे यह भी जानकारी मिली कि पुणे के सांस्कृतिक “कबीर कला मंच” के सदस्य, गायक और कवि, डेन्गले, शहर के युवाओं के साथ बातचीत कर उन्हें नक्सली विचारधारा में शामिल करने का काम करता है । कबीर कला मंच के संस्थापक पुणे-निवासी चंदालिया ने भी उक्त शिविर में भाग लिया था | उसने अपने बयान में बताया कि "साधना (एंजेला) और ज्योतिराव (मिलिंद) शिविर में आए थे और उन्होंने हमें नक्सली विचारधारा समझाई। उन्होंने हमें “ब्लाज़िंग ट्रेल” शीर्षक का एक वीडियो दिखाया जिसमें पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर हमले का दृश्य था ।
नई रणनीति, छह चरण के दृष्टिकोण पर केंद्रित है जिसे संक्षेप में SAARRC नाम दिया गया है – सर्वे, अवेयर्नेस, एजिटेशन, रिक्रूटमेंट, रेजिस्टेंस और कंट्रोल (सर्वेक्षण, जागरूकता, आंदोलन, भर्ती, प्रतिरोध और नियंत्रण) । इसी मुद्दे पर एक लेख में पी वी रमन्ना ने राज्य के एक खुफिया अधिकारी के हवाले से लिखा - "उन्होंने सर्वेक्षण का पहला चरण पूरा कर लिया, जिसमें लक्षित समूह, असंतोष के संभावित क्षेत्र और शहरी क्षेत्रों में फ्लैश-पॉइंट की पहचान की गई है। अब वे अपनी रणनीति के दूसरे और तीसरे चरण को लागू करने की प्रक्रिया में हैं। "
साप्ताहिक “मैंन स्ट्रीम” में ’Metastasis of Naxal Network in Urban India’ शीर्षक से प्रकाशित अपने एक विस्तृत आलेख में लेखक सुधांशु भंडारी ने नक्सलियों की शहरी रणनीति का विवरण दिया है । वे लिखते हैं:
"लक्ष्य निम्नलिखित प्रकार के अग्र संगठनों के निर्माण से प्राप्त किया जायेगा:
(1) गुप्त क्रांतिकारी जन संगठन, (2) प्रत्यक्ष और अर्द्ध-प्रत्यक्ष क्रांतिकारी जन संगठन, और (3) प्रत्यक्ष कानूनी जन संगठन, जो सीधे पार्टी से जुड़े नहीं हैं। शहरी क्षेत्र में तीसरे प्रकार के संगठनों के काम को तीन और व्यापक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: (ए) आंशिक कार्य, (बी) आंशिक रूप से गठित कवर संगठन, और (सी) कानूनी लोकतांत्रिक संगठन। "
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कानूनी लोकतांत्रिक संगठन सबसे खतरनाक होते हैं, क्योंकि वे राज्य के खिलाफ शिकायतों में सूक्ष्म हेरफेर के माध्यम से बड़े पैमाने पर समर्थन का निर्माण कर लोकतांत्रिक संगठनों के संवैधानिक अधिकार को खत्म करने की कोशिश करते हैं।
सरकार भी अन्य दो पर तो प्रतिबंध लगा सकती है लेकिन इन कानूनी संगठनों पर प्रतिबंध लगाना लगभग असंभव है, क्योंकि नागरिक-समाज, मानव अधिकार और अन्य सतर्कता समूह सभी मिलकर चीख पुकार शुरू कर देते हैं कि आम आदमी के अधिकारों को दबाया जा रहा है। ये संगठन ट्रेड यूनियनों, छात्र संगठनों, महिलाओं के मोर्चों, जाति-उन्मूलन संगठनों, राष्ट्रीयता संगठनों, लेखकों के संगठनों, वकीलों के संगठनों, शिक्षक संघों, सांस्कृतिक निकायों आदि के असंतुष्ट समूहों के साथ मिलकर काम करते हैं।
सर्वेक्षण चरण
इस चरण में शहरी परिदृश्य की जांच उसके भौगोलिक प्रोफ़ाइल के आधार पर होती है | वे औद्योगिक क्षेत्र हैं या अल्पविकसित शहर; रोजगार की स्थिति, भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों का गहन अध्ययन; आर्थिक असमानता के कारण संघर्ष; ये सभी ऐसे आधार है, जिनके माध्यम से ये अपने रंगरूटों की संभावित भर्ती कर सकते हैं, और उन्हें भारतीय राज्य के हितों के खिलाफ काम करने के लिए बहुत आसानी से तैयार कर सकते हैं।
आंदोलन चरण
विचित्र स्थिति तो यह है कि पार्टी के शहरी कार्यकर्ता सहारा तो लेते हैं, मलिन बस्तियों, गुंडों के गिरोहों और अन्य असामाजिक तत्वों का और बात करते हैं भ्रष्टाचार की खिलाफत की | राशन-दुकान के मालिकों, होटलों और काला बाजारियों के शोषण के खिलाफ, पानी, बिजली, शौचालयों और सीवरेज जैसी बुनियादी सुविधाओं के नाम पर वे स्थानीय समितियों और झुग्गी-झोपड़ियों के संगठनों के माध्यम से संघर्ष का बिगुल फूंकते हैं। महिलायें और बेरोजगार युवतियों इन संघर्षों में प्रमुख भूमिका निभाती हैं, महिला मंडल (महिला संगठन) और युवा क्लबों को शामिल किया जाता है।
भर्ती
2010 के शुरू में उत्तर प्रदेश में गिरफ्तार किए गए इनके नेताओं से नक्सल साहित्य बरामद हुआ, तथा विशेष कार्य बल (एसटीएफ) को जानकारी मिली कि केंद्रीय पोलित ब्यूरो सदस्य चिंतंद बुंदेलखंड क्षेत्र में गरीब-पिछड़े जिलों को लक्षित कर रहे हैं, वहां कि अनेक डकैतों से उसने संपर्क सम्बन्ध बढाया है |
हालांकि आज उनमें से अधिकांश शक्तिशाली डकैत गिरोहों का सफाया कर दिया गया है, इसके बाबजूद पिछडी जाति के नेताओं के कब्जे में उन डकैतों के बहुत सारे हथियार हैं। नक्सली महसूस करते हैं कि कभी आगे चलकर इनका इस्तेमाल किया जा सकता है |
कर्नाटक में, नक्सलियों के लिए शैक्षणिक परिसर नए शिकार का मैदान हैं। राज्य पुलिस के खुफिया दस्तावेज से पता चलता है कि नक्सलियों ने मंगलौर और शिमोगो में नए रंगरूटों और समर्थकों के लिए परिसरों को इस्तेमाल किया है । दक्षिण कन्नड़ में तो विश्वविद्यालय ही लोहा गर्म गर्म होने पर हड़ताल आदि करने के लिए प्रशिक्षण केंद्र में परिवर्तित होते जा रहे हैं – नक्सलियों को बुद्धिमान किन्तु प्रभावशाली भावुक मन की भर्ती के लिए ये स्थान पूर्णतः उपयुक्त प्रतीत होते हैं जो तथाकथित शोषक भारतीय राज्य के खिलाफ लड़ाई में शामिल हो सकते हैं । कुवेम्पू और मैंगलोर जैसे विश्वविद्यालय, सीपीआई (नक्सल) के लिए संभावित भर्ती क्षेत्र बन गए हैं, जो दक्षिण भारत में छोटी ही सही पर एक लहर पैदा कर सकते हैं ।
नक्सलियां बहुत ही व्यवस्थित नीति का पालन कर रहे हैं, जिसके अंतर्गत वे शारीरिक रूप से सक्षम युवाओं को तो सशस्त्र संघर्ष के लिए उपयोग करते है, साथ ही आंदोलनों और प्रचार अभियान के लिए शहर के शिक्षित लोगों को सामने लाते हैं ।
पश्चिम बंगाल में गिरफ्तार नक्सल नेताओं से की गई पूछताछ से पता चला है कि नक्सलियों का फोकस अब जादवपुर विश्वविद्यालय (जेयू) पर है। गिरफ्तार सीपीआई (नक्सल) राज्य सचिव कंचन ने सुरक्षा एजेंसियों को बताया है कि संगठन की सैन्य शाखा के लिए भर्ती प्रक्रिया चल रही है और जेयू, नए कैडर के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है। इसके अलावा, माना जाता है कि विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच नक्सलियों में बैकअप मॉड्यूल भी है। कंचन ने यह भी कहा है कि प्रेसीडेंसी के 12 छात्र लालगढ़ में सीपीआई (नक्सल) के कार्यकर्ताओं के रूप में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। चूंकि नक्सलियों ने अपने नेटवर्क को शहरी इलाकों में फैलाने की कोशिश की है, जादवपुर विश्वविद्यालय और प्रेसीडेंसी कॉलेज केवल एकमात्र संस्थान नहीं हैं जहाँ युवा शक्ति का दोहन हो रहा है । खुफिया एजेंसियों के अनुसार, हावड़ा और हुगली में कॉलेजों में पढ़ रहे युवा भी उनके लक्ष्य हैं। गिरफ्तार नक्सलियों ने पुलिस को बताया है कि कई कैडर कोलकाता के बाहरी इलाके में शहरी आधार स्थापित करने के लिए चले गए हैं। वे राजरहाट, बगुआईहाटी, उलबेरिया और केंद्रीय कोलकाता जैसे क्षेत्रों में आराम से सुसज्जित, किराए के घरों में रहते हैं।
कोबाड गांधी का मामला और भी दिलचस्प है। 21 सितंबर, 2011 को दक्षिण दिल्ली क्षेत्र में भिकाजी कामा प्लेस के निकट दिल्ली पुलिस की विशेष टीम ने उसकी गिरफ्तारी की | पूछताछ से पता चला है कि नक्सलियों ने गरीब और बेरोजगार युवकों को शहरों में अपनी गतिविधियां संचालित करने के लिए "ऑपरेशन शहरी आधार" शुरू किया था। बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित की गई |
हैरत की बात यह है कि कई उच्चतम शैक्षिक योग्यता रखने वाले शिक्षित व्यक्ति भी अपना पूरा जीवन इस हिंसाचार की खातिर खपा रहे है।
1. अपने शहरी उद्देश्यों को पूरा करने के लिए, नक्सलियों ने बहु-आयामी रणनीतियां बनाई हैं। उनका सारांश इस प्रकार है -
2. प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में नक्सल समर्थकों को भर्ती या स्थापित करने के लिए।
3. कर्मचारियों, सेना, पुलिस, बिजली, आईटी, रक्षा उत्पादन जैसे महत्वपूर्ण विभागों में दुश्मन शिविर में घुसपैठ करने और श्रमिकों पर नियंत्रण पाने के लिए भीतर से गतिविधियों को बाधित करने के लिए। धीरे-धीरे, निष्क्रिय विरोध और निरंतर शिकायतें पहले से ही असंतुष्ट राष्ट्र में एक डोमिनोज़ प्रभाव को जन्म देती हैं।
4. चिकित्सकों और अस्पताल परिचारिकाओं के नेटवर्क को उनके कारणों के प्रति सहानुभूति बनाने के लिए जो अपने घायल कार्यकर्ताओं को अत्यंत गोपनीयता के साथ इलाज करेंगे।
5. नवीनतम हथियारों और गोला-बारूद को संभालने के लिए तकनीकी रूप से शहरी क्षेत्रों में कैडर बनाने के लिए।
6. अत्यधिक प्रेरणा के समूह बनाने के लिए
7. केंद्रीकृत खुफिया और साइबर युद्ध के लिए पार्टी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग करने के लिए दुश्मन के नेटवर्क में घुसपैठ और महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश करती है। इसके लिए, उन्हें आवश्यक कौशल वाले व्यक्तियों की जरूरत है, जो केवल शहरी क्षेत्रों में मिल सकते है और जो उनके काम की प्रकृति के अनुकूल होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति पार्टी की सर्वोच्च समिति के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहते हैं।
8. कबीर कला मंच जैसे प्रचार प्लेटफार्मों की मदद से सांस्कृतिक अशांति पैदा करना। 

साभार - https://swarajyamag.com/politics/urban-naxalism-strategy-and-modus-operandi-part-1

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