कैसे रुके शिक्षा का व्यापार, जब देश में मैकालेपरस्तों की भरमार – दिवाकर शर्मा

हर अभिभावक चाहता है कि उसकी संतान अच्छी शिक्षा प्राप्त कर उनका एवं इस देश का नाम रोशन करे | परन्तु वर्तमान में अविभावकों की इस मंशा...

हर अभिभावक चाहता है कि उसकी संतान अच्छी शिक्षा प्राप्त कर उनका एवं इस देश का नाम रोशन करे | परन्तु वर्तमान में अविभावकों की इस मंशा को भांप कर कुकुत्मुत्तों की भांति गली गली में खुल चुके निजी विद्यालय सेवा रुपी शिक्षा को व्यापार का नाम देने पर आतुर नजर आ रहे है, जिसका सर्वाधिक प्रभाव निम्न एवं मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ता दिखाई दे रहा है ! वर्तमान में शिक्षा का व्यवसायीकरण या बाजारीकरण देश के समक्ष एक बड़ी चुनौती के रूप में नजर आता है ! शिक्षा के व्यवसायीकरण या बाजारीकरण का संकट लगभग 40-50 वर्षों में तेजी से उभरा है ! किसी भी देश की प्रगति में शिक्षा के क्षेत्र का क्या महत्व है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है ! भारत में वर्तमान में अच्छी शिक्षा धनाढ्य वर्ग के लोगों की बपौती बनकर रह गयी है !

शिक्षा के व्यवसायीकरण के इतिहास पर यदि नजर डालें तो इसकी नींव डालने का श्रेय मैकाले को जाता है ! भारत में पूर्व में शिक्षा कभी व्यवसाय या धंधा नहीं थी ! यह एक सेवारूपी कार्य था ! सेवारूपी शिक्षण संस्थाओं में कार्यरत शिक्षक विद्यार्थियों में राष्ट्र प्रेम आधारित संस्कार पैदा कर उन्हें राष्ट्रवाद का महत्व समझाते थे, परन्तु वर्तमान में देश के लोगों में एक भ्रम स्थापित किया जा चुका है और यह भ्रम यह है कि भारत में अंग्रेजों के आगमन के पश्चात शिक्षा का विस्तार एवं विकास हुआ ! ईसा से 700 वर्ष पूर्व के तक्षशिला विश्व विद्यालय को भुला दिया गया, जो कभी उच्च शिक्षा का महान केंद्र हुआ करता था ! भुला दिए गए काशी, नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय जहाँ सम्पूर्ण विश्व से लोग ज्ञान प्राप्त करने भारत भूमि पर आते थे !

अंग्रेजों के भारत आने के पूर्व ई.स. १८२० में विश्व में सर्वाधिक साक्षरता (लगभग ३३ प्रतिशत) भारत में ही थी ! बंगाल व बिहार में एक लाख से अधिक विद्यालय हुआ करते थे, मद्रास के हर गाँव में विद्यालय हुआ करता था (यह सर्वे स्वयं पूर्व पादरी विलियम्स एडम के द्वारा किया गया था जिसका जिक्र प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तक “द ब्यूटीफुल ट्री” में किया है) ! १८३५ के पूर्व तक शिक्षा का दायित्व समाज की जिम्मेदारी हुआ करती थी ! इस दौर में शिक्षा के संचालन हेतु राजा – महाराजा सहित समाज के संपन्न लोग इस कार्य में अपना सहयोग तो प्रदान करते थे, परन्तु शिक्षा के प्रत्यक्ष कार्य में उनका कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ करता था !

१८३५ के बाद शिक्षा का स्वरुप बदलना प्रारंभ हुआ ! भारत की प्राचीनतम व्यवस्थाएं इस समय अंग्रेजों के द्वारा बदलनी प्रारंभ हुई, जिसके कारण देश की आर्थिक स्थिति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ना आरम्भ हुआ ! इस समय संस्कृत की पाठशालाओं को अनुदान देना बंद करना प्रारंभ हुआ और यही वह समय था जब अंग्रेजी विद्यालयों को अधिक से अधिक सरकारी अनुदान देना प्रारम्भ हुआ ! इसी समय शिक्षा का सरकारीकरण हुआ जिसके अंतर्गत छात्रों से शुल्क लेना, अध्यापकों को वेतन देना एवं विद्यालय संचालन हेतु सरकारी अनुदान देना प्रारंभ किया गया ! इस निर्णय के परिणामस्वरूप जहाँ १८२० में साक्षरता का अनुपात ३३ प्रतिशत हुआ करता था वह १९२१ तक महज 7.2 प्रतिशत रह गया ! कुछ एक महापुरुषों (स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी श्रद्धानंद, स्वामी विवेकानंद आदि) के अथक प्रयासों के बाद यह प्रतिशत अनुपात १९४७ में 17 प्रतिशत तक पहुंचा !

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात आधुनिक भारत के निर्माताओ से यह आशा थी कि वे ऐसी नीति बनाएंगे, जिससे देश में सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना सरकार की ज़िम्मेदारी होगी | परन्तु ऐसा हुआ नहीं बल्कि शासक वर्ग ने सारी आशाओं पर पानी फेर दिया | सबसे पहले तो शिक्षा को मौलिक अधिकारों में शामिल करने के बजाये उन्होंने इसे नीति – निर्देशक तत्वों में डाल दिया, ताकि कोई सरकार को अदालत में ना ले जा सके ! साथ ही भारत में महंगे निजी विद्यालयों को खोला जाता रहा | यहाँ से दोहरी नीति चल पड़ी और गरीब और अमीर के बीच की खाई बढा दी गई ! इस दौरान निजी विद्यालयों का आकर्षण देश में बढ़ना प्रारंभ हुआ ! शुरुवात में अंग्रेजी माध्यमों के विद्यालयों में वस्तुओं के रूम में दान लेना प्रारंभ हुआ, बाद में छात्रों से बड़ी मात्रा में दान लेना और कम वेतन देना प्रारम्भ हुआ ! विद्यालय में शिक्षा के स्तर को गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली ट्यूशन प्रथा की शुरुवात हुई ! इसके बाद तो देखते ही देखते शिक्षा का व्यापार फलने फूलने लगा !

पुराने समय में जहाँ शिक्षा ज्ञानदान की पुण्य परम्परा थी, धीरे धीरे पैसा एकत्र करने की योजना बन कर रह गई ! पहले योग्य आचार्य जो अपने अन्दर ज्ञान का अनंत भंडार संग्रहित किये रहते थे, वे विद्यार्थियों को समुचित शिक्षा प्रदान कर उनका मार्ग आलोकित करते थे | शिक्षा निःस्वार्थ सेवा थी जो ”सर्वजन हिताय” को दर्शाती थी | शिक्षा प्राप्ति उपरांत विद्यार्थी अपने राष्ट्र एवं समाज को अपने मजबूत कंधों का सहारा देते थे ! धीरे धीरे यह परंपरा मैकाले के षड़यंत्र की भेंट चढ़ गयी ! आज मैकाले की वह मंशा पूर्ण होती दिखाई दे रही है जो वह कहता था ! मैकाले कहता था कि - "हमें भारतीयों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है जो हम अंग्रेज शासकों एवं उन करोड़ों भारतीयों के बीच दुभाषिये का काम कर सके, जिन पर हम शासन करते हैं। हमें भारतीयों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना है, जिनका रंग और रक्त भले ही भारतीय हो, लेकिन वह अपनी अभिरूचि, विचार, नैतिकता और बौद्धिकता में अंग्रेज हों" |

भारतीय सनातन सांस्कृतिक जीवन मूल्य और आज की व्यवसायीकृत शिक्षा दोनों एक दुसरे से बिलकुल विपरीत है ! भारतीय सनातन संस्कृति मूल्यों के अनुसार तो शिक्षा ऐसा दान थी, जो देने से बढती है, परन्तु आज तो शिक्षा खुलेआम बेची जा रही है ! गुरू और भगवान के समान दर्जा पाने वाले वैद्य का स्थान आज शिक्षा के व्यवसायीकरण से बने उन डाक्टरों ने ले लिया है, जो अपने अभिभावकों से लाखों रुपये खर्च करवाकर डॉक्टर बने हैं | अगर वे आज मरीजों से बूचड़खाने के कसाई जैसा निर्मम व्यवहार कर रहे हैं, तो इसमें हैरत की क्या बात है ? जब सारी गंगा ही उल्टी बह रही है तो शिक्षा में व्यवसायीकरण कैसे रूक पायेगा ? आज स्थिति इतनी दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी पीढियां मैकाले के प्रबंधन के अनुसार तैयार हो रही है और यही कारण है कि विश्वविद्यालयों में “वन्दे मातरम” के गान के स्थान पर “भारत तेरे तुकडे होंगे” के नारे गूँज रहे हैं |

हम सरस्वती शिशु मंदिरों को सांप्रदायिक कहने लगे है क्यूंकि वहां भारतीयता और वन्दे मातरम सिखाया जाता है ! जब से बहुराष्ट्रीय कंपनिया आयीं, उन्होंने अंग्रेजो का इतिहास दोहराना शुरू किया और हम सभी बैसे सभ्य बनने में लग गए, जिसका मानक वह था, जो मैकाले ने गढ़ा था ! जबकि हमारे यहाँ तो सभ्य उसे माना जाता था, जो सुसंस्कृत हो | सुसंस्कृत वह, जो परपीड़ा को अधमता माने | अगर देश में ऐसी शिक्षा दी गई होती, तो क्या अराजकता और हिंसा का वह तांडव दिखाई देता, जो आज हर गली, मोहल्ले में देखा जा रहा है | शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन किये बिना, भारत अपनी वर्तमान समस्याओं से निजात नहीं पा सकता |

दिवाकर शर्मा
सम्पादक
क्रांतिदूत डॉट इन
krantidooot@gmail.com
8109449187

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क्रांतिदूत: कैसे रुके शिक्षा का व्यापार, जब देश में मैकालेपरस्तों की भरमार – दिवाकर शर्मा
कैसे रुके शिक्षा का व्यापार, जब देश में मैकालेपरस्तों की भरमार – दिवाकर शर्मा
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