भारत के नेताओं और मुसलमानों को समझाये कौन ?

हिन्दुओं में एक धडा ऐसा है, जो अपने मन में हिन्दवी स्वराज्य का सपना पाले हुए है | उसी प्रकार अनेक मुस्लिम भारत को काफिरों से मुक्त दारुल...



हिन्दुओं में एक धडा ऐसा है, जो अपने मन में हिन्दवी स्वराज्य का सपना पाले हुए है | उसी प्रकार अनेक मुस्लिम भारत को काफिरों से मुक्त दारुल इस्लाम बनाने को जिहाद की खामख्याली पाले हुए हैं | और यही फसाद की जड़ है | मैं अक्सर लिखता रहा हूँ कि भारत के लगभग 13 करोड़ मुसलमानों को बंगाल की खाड़ी या हिन्द महासागर में नहीं धकेला जा सकता और ना ही मुसलमान देश के 80 करोड़ हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बना सकते | अपने अपने धर्म के साथ सहअस्तित्व से रहने की बाध्यता को दोनों समुदाय जितनी जल्दी समझ सकें, वही दोनों के हित में होगा | सौभाग्य से अधिकाँश हिन्दुओं की मानसिकता तो इसी प्रकार की है, किन्तु क्या यह बात मुसलमानों को लेकर कही जा सकती है ?

दुर्भाग्य से आजादी के बाद से ही मुसलमानों को यह बात समझाने का प्रयत्न ही नहीं हुआ | कुर्सी की यारी इस मार्ग की सबसे बड़ी रुकावट है | सेक्यूलर दलों को लगता है कि भाजपा का हौआ बताकर वे अल्पसंख्यक वोटों को एक मुस्त अपनी झोली में सदा डलवाते रहेंगे | अभी तक उन्हें अपनी इस रणनीति का लाभ मिलता भी रहा है | और भाजपा को भी हिन्दू मुसलमान के झगड़े के कारण होने वाले हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण सत्ता की आसान सीढी समझ में आती है | 

नादान मुसलमान बिना समझे दोनों प्रकार की राजनीति के मोहरे बने हुए हैं | वे बात बेबात भड़कते हैं और नतीजा वही होता है, जो राजनेता चाहते हैं | उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले एक हिंदू की टिप्पणी पर मुसलमान भड़के । उन्होंने महीनों आंदोलन किया और अखिलेश सरकार ने मुसलमान की चिंता की। हिंदू को जेल में डाला। नतीजा क्या निकला? यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार बन गई है। हिंदुओं ने गोलबंद होकर भगवा साधु को मुख्यमंत्री बना दिया। 

आज ठीक वही बंगाल में हो रहा है। पहले मालदा और अब उत्तरी 24 परगना जिले में मुस्लिम आबादी ने भड़कते हुए गुस्सा दिखाया है | अखिलेश के ही समान ममता भी मुसलमानों को शह दे रही हैं, आखिर वे उनके वोटर जो हैं | स्वाभाविक ही हिन्दुओं में रोष व्याप्त है | हो सकता है कि बंगाल में भी भाजपा को बैसा ही लाभ हो जाए, जैसा कि बगल के असम में हुआ । 

अब सवाल उठता है कि क्या एक भी मौलाना, इमाम, मुस्लिम धर्मगुरू नेता नहीं है जो बीस करोड़ मुसलमानों को समझा सके कि धर्म ऐसा छुई-मुई नहीं हुआ करता जो 17 साल के एक लड़के की फेसबुक पोस्ट से खतरे में पड़ जाए! न भारत के संविधान में ईश निंदा का वह कानून है, जिससे धर्म अनुयायी को यह हक मिले कि हमें दोषी को सुपुर्द किया जाए ताकि हम उसे पत्थर से मार-मार कर मार डालने की सजा दें। 

मुस्लिम समाज में कोई उठ खड़े होकर यह समझाने वाला क्यों नहीं है कि भड़को मत। पैगम्बर मोहम्मद और मक्का-मदीना के उनके स्थान फेसबुक, किसी कमेंट, या पोस्ट से अपवित्र नहीं होते। बंगाल के एक 17 साल के लड़के का क्या मतलब है? इस्लाम क्या इतना छुई-मुई धर्म है जो किसी पोस्ट, कमेंट, कार्टून से खतरे में पड़ जाएं? इसलिए बुनियादी सवाल यह है कि मुसलमान क्यों तुरंत भड़कता है? जब ऐसी कोई बात होती है तो लोकल मस्जिद के इमाम से लेकर, मक्का-मदीना के शाही इमाम या धर्मगुरूओं की कोई संस्था ऐसे वक्त क्यों नहीं उठ खड़ी हो कर समझाती, बताती कि खुदा हमारे सबके मालिक हैं और इस मूर्ख की सजा खुदा अपने यहां तय करेंगे न कि हम अनुयायियों को भड़क कोई फतवा देना है या पुलिस से कहना है कि इस दोषी को हमें सुपुर्द करो। हम इसे ईश निंदा में फांसी पर लटकाएंगे। 

दिक्कत यह है कि सऊदी अरब ने 50-60 सालों में खरबों डॉलर खर्च कर दुनिया भर के मुसलमानों के दिलोदिमाग में जहर भरा। मस्जिदें बनवाई तो मदरसों, मौलानाओं- इमामों, मौलवियों से दिलो-दिमाग में घर-घर यह बात पैठवाई कि वे ही अव्वल हैं और दुनिया को निजाम ए मुस्तफा बनवाने के अपने मिशन में अपने कायदों से चलना है न कि दूसरों के कायदों से ! लेकिन आज की 21 वीं सदी में यदि व्यक्ति की आजादी है, लोकतंत्र है, ज्ञान-विज्ञान है, तो आज की दुनिया उस जमात के साथ कैसे एडजस्ट हो, जो वक्त को पैगंबर के वक्त में जीना चाहते हैं। 

इस्लामी जिहादी जूनून, अगर आज दुनिया का सबसे बड़ा संकट बना है तो उसका असली खलनायक सऊदी शाही परिवार है। इसी ने तेल की अपनी अकूत कमाई से असंख्य भस्मासुर पैदा किये हैं । उनका नाम जो भी हो, बिन लादेन हो, बगदादी हो, यासीन मलिक हो या बुरहान बानी हो । 

इसका तोड़ क्या है, उपाय क्या है ? क्या दुनिया भर के मुसलमानों और गैर मुस्लिमों के बीच खून की नदियाँ बहें ? 

समय की मांग है कि विभिन्न देशों में नई मुस्लिम लीडरशीप उभरे, जो आम मुसलमान को समझाये कि हम सबको अपनी विविधताओं के साथ, साथ-साथ रहना है! अतः दारूल हरब और दारूल इस्लाम की न सोचो । भारत इसकी आदर्श जगह हो सकता है। खुदा के बंदों के लिए समझने, संभलने का वक्त है, साथ ही राजनेताओं के भी | सेक्यूलरों को समझना होगा कि 80 प्रतिशत आवादी को आहत करके वे कभी सत्ता हासिल नहीं कर सकते | साथ ही बीजेपी को भी 30 फीसदी आबादी को दरकिनार करके चलना भारी पड सकता है | असम के सीमावर्ती इलाके में बांग्लादेश से आए घुसपैठिए नई आजादी की बाते कहने लगे है। असम- बंगाल का सीमावर्ती इलाका यदि भविष्य में कश्मीर घाटी जैसा बना तो क्या होगा? 

सो, समझो और समझाओ! वह भी बेबाकी से। तभी सभी का भला है। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच हिन्दू मुस्लिम समन्वय की दिशा में प्रयत्न कर रहा है, किन्तु क्या अकेला आरएसएस यह बड़ा अभियान चला पायेगा ? वह भी तब जबकि मुस्लिम आबादी का बड़ा तबका उसे नफ़रत की हद तक नापसंद करता है | अतः सामूहिक प्रयत्न की आवश्यकता है |
साभार आधार श्री हरिशंकर व्यास जी


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भारत के नेताओं और मुसलमानों को समझाये कौन ?
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