आखिर भाजपा ने दस सीटों के लिए ग्यारह उम्मीदवार क्यों उतारे ? एक कयास

उत्तर प्रदेश के राज्यसभा निर्वाचन पूरे देश का ध्यान खींच रहे हैं | नरेश अग्रवाल का अपने विधायक पुत्र के साथ भाजपा प्रवेश, खासी गर्मागर्म...


उत्तर प्रदेश के राज्यसभा निर्वाचन पूरे देश का ध्यान खींच रहे हैं | नरेश अग्रवाल का अपने विधायक पुत्र के साथ भाजपा प्रवेश, खासी गर्मागर्म बहस को जन्म दे चुकी है | आज जब उस बहस की गर्मी कुछ ठंडी हुई है, तब कुछ अन्य बातों की तरफ ध्यान देने का अवसर मिल रहा है | जैसे कि - 

उत्तर प्रदेश की कुल दस सीटों के लिए होने जा रहे निर्वाचन में भाजपा अपनी दम पर केवल आठ प्रत्यासियों को जिता सकती है, किन्तु उसने ग्यारह उम्मीदवार मैदान में उतारें हैं | आखिर क्यूं ?

कहा जा सकता है कि नाम वापिसी तक दो नाम वापस हो जायेंगे और नौ प्रत्यासी ही चुनावी अखाड़े में रहेंगे और मायावती के बसपा प्रत्यासी भीमराव को पटखनी देने का प्रयत्न करेंगे | 

किन्तु क्या सच में ऐसा होगा ? और क्या महज एक सीट के लिए नरेश अग्रवाल को भाजपा में लेकर इतनी थुक्का फजीहत भाजपा ने झेली है ? 

मुझे गले नहीं उतर रही यह बात | क्यों ? इस पर विचार करने के लिए आईये पहले राज्यसभा की चुनावी प्रक्रिया पर एक नजर डालें | 

राज्यसभा चुनाव की कुछ ख़ास बातें – 

राज्य सभा में सदस्यों का चुनाव एकल हस्‍तांतरणीय मत पद्धति से होता है । इसके अंतर्गत राज्यसभा की जितनी सीटों के लिए राज्य में चुनाव होने जा रहा है, उसमें एक जोड़कर, राज्य की कुल विधानसभा सीटों से भाग दिया जाता है | अर्थात जैसे कि उ. प्र. में कुल 403 विधायक हैं और 10 राज्यसभा सीट के लिए चुनाव होने जा रहे हैं, तो ४०३ में 11 ( 10 + 1) का भाग देकर आई संख्या 36.63 का पूर्णांक 37, राज्य सभा चुनाव में विजय के लिए आवश्यक न्यूनतम संख्या हुई | 

इतने पर ही बस नहीं है, विधायक वरीयता के अनुसार अपना वोट देते हैं, अर्थात प्रथम वरीयता, द्वितीय वरीयता, तृतीय वरीयता आदि आदि | अब इस खेल को समझते हैं | 

पहली वरीयता के न्यूनतम वोट जिसे मिल जाते हैं वह व्यक्ति तो विजयी हो जाता है। किन्तु इसके आगे एक पेच है | जीत के लिए जरूरत थी 36.63 की, किन्तु मिले 37, तो .37 वोट क्या रद्दी में फिकेंगे ? 

यहाँ आकर द्वितीय या तृतीय वरीयता के वोटों का महत्व प्रारम्भ होता है | लेकिन उस विषय पर विचार करने के पूर्व चुनावी प्रावधानों पर एक नजर डालते हैं | 

राज्यसभा चुनाव में विधायक को अपना मतपत्र मतपेटी में डालने से पहले उसे पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाना पड़ता है। 

चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक अगर विधायक पार्टी के निर्देश का उल्लंघन कर किसी अन्य के लिए वोट डालता है या नोटा का प्रयोग करता है तो उसे विधायक के रूप में अयोग्य नहीं करार किया जा सकता। 

किन्तु अगर वह अधिकृत एजेंट के अतिरिक्त किसी अन्य को भी अपना मतपत्र बता देता है, तो उसका मत निरस्त हो जाता है, जैसे कि विगत गुजरात चुनाव में हो गया था और अहमद पटेल ने भाजपा के रणनीतिकारों की आशा पर पानी फेर दिया था | 

तो कहने का आशय यह कि गुजरात के राज्यसभा चुनाव में जमीन सूंघने के बाद भाजपा के चाणक्यों की फ़ौज कुछ ज्यादा ही सतर्क और सयानी हो गई है | तो इस बार वरीयता के वोटों से कुछ उठा पटक की पूरी संभावना है | 

क्या नरेश अग्रवाल अकेले ही भाजपा में नमूदार हुए हैं, या उनके गुरू घंटाल शिवपाल जी भी भाजपा के कार्यकर्ताओं की छाती पर मूंग दलने आने वाले हैं ? 

कहीं ऐसा तो नहीं कि समाजवादी पार्टी, बहिन मायावती के प्रत्यासी को जिताने की कोशिश करते करते स्वयं की घोषित प्रत्यासी श्रीमती जया बच्चन जी को ही हरा बैठे ? यह क्यूं और कैसे संभव है, इसे समझने के लिए वरीयता की प्रकिया को समझिये, जिसका प्रयोग अक्सर घाघ राजनेता करते हैं | 

मान लीजिये कि जया बच्चन जी की जीत सुनिश्चित करने के लिए समाजवादी पार्टी ने अपने 47 में से 40 प्रत्यासियों को जया जी को वोट करने को कहा तथा किन्हीं एक दो को द्वितीय वरीयता के वोट भीमराव को देने को | 

अब अगर इन चालीस में से चार वोट टूट गए और उन्होंने भाजपा को वोट कर दिया तो क्या होगा ? 

जया जी को मिले 36 वोट और वे तो हार गईं | अब देखा जाएगा कि उनके द्वितीय वरीयता के वोट किसको गए हैं | मान लीजिये कि द्वितीय वरीयता के दो वोट भीमराव को और एक वोट किसी भाजपा प्रत्यासी को गया है तो इन 36 में २४ वोट भीमराव को जायेंगे और १२ वोट भाजपा को चले जायेंगे | 

बेईमानी की एक ने, किन्तु मिल गए १२ वोट | तो यह है उठा पटक का माईंड गेम | केवल समाजवादी ही क्यों, कांग्रेस और बसपा में भी भितरघात हो सकता है ना ? शायद भाजपा उत्तर प्रदेश की नौ नहीं दसों सीटें जीतने के प्रयत्न में है | 

मैं नहीं कहता कि ऐसा होगा ही, किन्तु प्रयत्न तो है ही | हो सकता है भाजपा के सभी ग्यारह प्रत्यासी मैदान में रहें और कांग्रेस, समाजवादी और बसपा के वोटों में सेंध लगाने का अलग अलग प्रकार से प्रयत्न करें | 

कमसेकम तीन प्रत्यासियों की जीत केवल प्रथम वरीयता के वोटों से नहीं होगी, द्वितीय या तृतीय वरीयता के वोटों तक जायेगी | इति कयास |

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क्रांतिदूत: आखिर भाजपा ने दस सीटों के लिए ग्यारह उम्मीदवार क्यों उतारे ? एक कयास
आखिर भाजपा ने दस सीटों के लिए ग्यारह उम्मीदवार क्यों उतारे ? एक कयास
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