चीन की राजनैतिक उठा पटक पर स्वयं चीनी क्या सोचते हैं ?

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चीन में अभी तक यह नियम था कि कोई भी राष्ट्रपति अधिकतम दस वर्ष तक अपने पद पर रह सकता था, किन्तु चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने यह 10 वर्...



चीन में अभी तक यह नियम था कि कोई भी राष्ट्रपति अधिकतम दस वर्ष तक अपने पद पर रह सकता था, किन्तु चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने यह 10 वर्ष की समय सीमा समाप्त करने का प्रस्ताव किया है, ताकि राष्ट्रपति शी जिनपिंग अनिश्चित काल तक चीन का नेतृत्व करते रह सकें । दुनिया भर में चीन में हुए इस बदलाव को लेकर चिंता जाहिर की गई है तथा माना गया है कि चीन लोकतंत्र से एक कदम और पीछे हट गया है | वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार अमरीकी राष्ट्रपति राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी इस घटना पर ध्यान दिया और 3 मार्च को अपनी पार्टी को दान देने वाले दानदाताओं की एक सभा में मजाकिया लहजे में कहा "शायद हमें भी किसी दिन इसे एक लक्ष्य बनाना पड़े । " 

बदलते मूल्यों का सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका अध्ययन करने वाले समाज वैज्ञानिकों के एक वैश्विक नेटवर्क ने चीन में हुए इस बदलाव को लेकर एक सर्वे किया | हालांकि चीन की स्थिति परिस्थिति को देखते हुए बहुत संभव है कि सर्वे में भाग लेने वाले लोगों ने किसी संभावित मुसीबत से बचने के लिए सर्वेक्षणकर्ताओं से झूठ बोला हो, क्योंकि सभी जानते हैं कि चीन में असंतोष को दबाने के लिए कठोर सेंसरशिप है, यहाँ तक कि कारावास का भी प्रावधान है | जो भी हो चीन के लोगों ने जो भी सर्वेक्षणकर्ताओं को बताया वह वैश्विक धारणा के एकदम विपरीत है | जैसे कि– ज्यादातर चीनी अपनी सरकार के नेतृत्व से संतुष्ट हैं । 

दूसरा सर्वेक्षण भी कुछ ऐसा ही है | यू.एस. और अन्य लोकतांत्रिक देशों में एक और आम धारणा है कि दमनकारी शासन में नागरिक समाज स्वार्थी हो जाता है, तथा किसी को किसी से मतलब नहीं रहता | निहित स्वार्थों के कारण बहुत हद तक एक दूसरे के विरुद्ध हो जाता है । किन्तु सर्वेक्षण के अनुसार चीन, जर्मनी, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस में भी आम नागरिकों में एक दूसरे का साथ देने की प्रवृत्ति लगभग समान है । (अब इस मामले में तो इस बात की संभावना कम ही है कि लोग सर्वेक्षणकर्ताओं से झूठ बोलेंगे।) 

तीसरे सर्वे के अनुसार चीनी लोग यह नहीं मानते कि मजबूत नेता के चलते संसद और चुनाव बेमानी हो सकते हैं। स्मरणीय है कि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी ही शक्ति का मूल केंद्र है, किन्तु उनका प्रयत्न रहता है कि आम नागरिक की भी शासन प्रशासन में सहभागिता रहे, इसलिए वहां राष्ट्रीय पीपुल्स कांग्रेस और एक सर्वोच्च पीपल्स कोर्ट भी है | लेकिन सर्वेक्षण का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अनेक अमेरिकियों का मानना ​​है कि एक मजबूत नेता संसद और चुनावों को अप्रासंगिक बना सकता है। अतः दानदाताओं की सभा में ट्रम्प द्वारा मजाक में कही हुई बात भी गंभीरता से ली गई है | 

सर्वेक्षण का अंतिम निष्कर्ष सबसे महत्वपूर्ण है, जिसमें यह प्रतिध्वनित होता है कि रूस के समान चीनियों का भी यही मानना ​​है कि शासक के निर्देशों का पालन करना भी लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है। चीन में “राष्ट्रपति शी” के विशाल पोस्टर हर जगह दिखाई देते है, जिससे यह आभास मिलता है कि वे माओत्सेतुंग के बाद सबसे अधिक लोकप्रिय नेता हैं । द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के लिए सर्वाधिक उत्तरदाई, जर्मनी और जापान के लोग भी अपने शासकों के अंधभक्त थे, किन्तु वे भी आज्ञापालन के मामले में आज के चीनियों से बहुत पीछे थे । 

लोवा यूनिवर्सिटी के एक राजनीतिक वैज्ञानिक वेंफांग तांग ने एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था - "चीन में आधिकारिक लचीलेपन के आश्चर्य”| उक्त आलेख में तांग ने लिखा कि -"हां, चीनी बहुत कम अपेक्षाएं करते हैं, अतः वे स्वयं को स्वतंत्र महसूस करते हैं, और यही सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि अप्रसन्न नागरिक ही राजनीतिक समस्याओं का कारण बनते हैं।" 

तांग आगे कहते हैं: "पश्चिम के कुछ मीडिया घरानों और विद्वानों द्वारा अपने वैचारिक चश्मे से चीन को देखा जाता है | क्या अच्छा है, क्या बुरा, इसका निर्धारण पश्चिमी मानदंडों से संभव नहीं है | इसे समझकर ही शोधकर्ताओं को चीनी राजनीतिक व्यवस्था में जो हो रहा है, उसका आंकलन करना चाहिए । "

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