अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ईशनिंदा के कथित मानदंड - डॉ विवेक आर्य

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आज विश्व प्रेस स्वातंत्र्य दिवस है |  विचार स्वातंत्र का जितना हनन “ईशनिंदा” के नाम पर हुआ, उतना अन्य किसी कारण से नहीं | अब सोच...


आज विश्व प्रेस स्वातंत्र्य दिवस है | 

विचार स्वातंत्र का जितना हनन “ईशनिंदा” के नाम पर हुआ, उतना अन्य किसी कारण से नहीं | अब सोचने की बात है कि ये ईशनिंदा है क्या? 

ईशनिन्दा मूलतः एक अब्राहमिक अवधारणा है जो यह मानती है कि उनकी धार्मिक मान्यताएं पवित्र और 'अपरिवर्तनीय' हैं, जिन पर कोई भी सवाल उठाना ईशनिंदा है। जबकि सभी भारतीय धर्मों में पूर्ण विचार स्वातंत्र्य है और उनमें निंदा की कोई अवधारणा ही नहीं है। 

दो अब्राहमिक धर्मों- ईसाई धर्म और यहूदी धर्म ने तो निंदा के बारे में अपने विचारों में काफी सुधार किया है और उन्हें स्वीकार किया है; किन्तु इस्लाम के अनुयाईयों ने आज भी ईश निंदा को गैर-विश्वासियों के खिलाफ एक दमनकारी उपकरण के रूप में इसका उपयोग जारी रखा है। 

भारत में ईशनिंदा के नाम पर प्रताड़ना का इतिहास - 

लाहौर और दिल्ली दो ऐसे स्थान रहे जहाँ आर्यसमाज और मुसलमानों के बीच युद्धक्षेत्र जैसा माहौल रहा । लाहौर को उसकी जीवंत बौद्धिकता और शैक्षिक संस्थानों के कारण स्वामी दयानंद ने आर्यसमाज का मुख्यालय बनाया था और उसके बाद यह पंजाब में पुनरुद्धारवादी आंदोलनों का केंद्र बन गया था। 

जैसे जैसे आर्यसमाज के विचार ने गति पकड़ी और लोगों के बीच उस विचार का प्रसार हुआ, जागरूकता बढी, बैसे बैसे मौलवियों में बेचैनी भी बढ़ने लगी । शुद्धि आंदोलन ने तो उन्हें बेतहाशा चिढा दिया, क्योंकि वे जिन्हें बड़े प्रयत्नों से मुसलमान बनाते, आर्य समाजी उन्हें वापस हिन्दू धर्म में वापस ले आते | यह उनके लिए एक नया अनुभव था | अब तक तो जो एक बार मुसलमान बन जाता था, उसे व उसके पूरे कुनबे को जन्म जन्म तक मुसलमान ही रहना पड़ता था, क्योंकि हिन्दू समाज उन्हें स्वयं ही वापस स्वीकार करने को तत्पर नहीं होता था | किन्तु आर्यसमाज के शुद्धि आन्दोलन ने उनके प्रयत्नों पर पानी फेरना शुरू कर दिया | इसलिए स्वाभाविक ही आर्यसमाजी मुसलमानों के लिए दुश्मन नंबर एक हो गए | मुसलमानों को लगता था कि उन्हें तो हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का अधिकार है, किन्तु हिन्दुओं को उन्हें वापस अपने धर्म में ले जाने का कोई हक़ नहीं है | 

महाशय राजपाल का बलिदान – 

बहुत कम लोगों को पता है कि प्रेस की स्वतंत्रता के लिए जिन्होंने सबसे पहले अपना जीवन होम किया, उस व्यक्ति का नाम था राजपाल । राजपाल जी लाहौर के एक पुस्तक प्रकाशक थे। यह वह समय था जब इस्लाम के अनुयाई आम तौर पर हिंदू देवी-देवताओं और हिन्दू मान्यताओं को लेकर अपमानजनक और उत्तेजक साहित्य मुद्रित कराते रहते थे । हिंदुओं ने और विशेषकर आर्यसमज ने इन दुर्भावनापूर्ण प्रयासों का मुकाबला करने की ठानी और जबाबी साहित्य प्रकाशित करना शुरू किया । मुस्लिमों के लिए यह एक घनघोर आश्चर्य का विषय था और वे इसे सहन नहीं कर पाए । मुल्ला मौलवियों ने इस जबाबी साहित्य को ईश निंदा के रूप में लिया और प्रकाशकों के खिलाफ फतवा जारी किया | 

पूरी घटना इस प्रकार है | लाहौर का आर्य पुस्तकालय की आर्यसमाज आंदोलन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका थी, क्योंकि यहाँ से ही पंजाब और देश के अन्य भागों में वितरण के लिए साहित्य जाता था । सितम्बर 1923 को अल्फराक के सम्पादक अली कासिम ने एक पुस्तक छपवाई – उन्नीसवीं सदी का महर्षि | इस पुस्तक में हिन्दुओं की आस्थाओं का भरपूर मजाक बनाया गया था, साथ ही एक अन्य पुस्तक आई - “कृष्ण,तेरी गीता जलानी पड़ेगी ” |


प्रतिक्रया स्वरुप मई 1924 में आर्य पुस्तकालय के लिए उसके प्रबंधक महाशय राजपाल ने भी पंडित चमुपति द्वारा लिखी गई एक पुस्तक प्रकाशित की – रंगीला रसूल | बस फिर क्या था, उसके प्रकाशन के साथ ही व्यापक विरोध और सांप्रदायिक उन्माद का वातावरण बन गया । 

पंजाब सरकार ने भारतीय दंड संहिता की धारा 153-ए के तहत महाशय राजपाल के खिलाफ तो मामला दर्ज करने का आदेश दिया; किन्तु अली कासिम के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की | कहा गया कि उनकी पुस्तक तो बहुत कम ही लोगों तक पहुंची है । स्पष्ट ही यह मुस्लिम तुष्टीकरण की ही परिणति थी । 

उस समय किसी को नहीं पता था कि रंगीला रसूल भारतीय राजनीति का केंद्र बिंदु बन जाएगा और 20 साल बाद भारत विभाजन के अनेक कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण बन जायेगा । 

रंगीला रसूल केस 

एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, लाहौर की मजिस्ट्रेट अदालत ने महाशय राजपाल को धारा 153-ए के तहत दोषी पाया और जनवरी 1927 में उन्हें छह महीने सख्त कारावास की सजा सुनाई; जिसे लाहौर के सत्र अदालत ने भी बरकरार रखा । किन्तु यह अंतिम निर्णय नहीं था | लाहौर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दलीप सिंह ने 4 मई, 1927 को निचली अदालत के फैसले को ठुकरा दिया। न्यायमूर्ति सिंह ने यह भी कहा कि "कार्य की प्रकृति, आपराधिक है, या नहीं, किसी विशेष वर्ग की प्रतिक्रिया के आधार पर निर्धारित नहीं की जा सकती"। महाशय राजपाल को इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने कानूनी लड़ाई अपने सीमित साधनों से शांतिपूर्वक लड़ी | यहाँ तक कि उन्होंने अंत तक यह नहीं बताया कि रंगीला रसूल के लेखक पंडित चमूपति कौन हैं, कहाँ रहते हैं । 

गली गली में हुआ मुस्लिम गुस्से का इजहार ! 

महाशय राजपाल के पक्ष में हुए लाहौर उच्च न्यायालय के निर्णय से मुसलमानों का पारा आसमान छूने लगा । जिस मौलाना मोहम्मद अली को गांधी जी "हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत" कहकर सम्मानित करते थे, उसने 1 जुलाई, 1927 को दिल्ली की जामा मस्जिद में एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए घोषणा की कि "काफ़ीर राजपाल को बख्सा नहीं जाएगा" और मुसलमानों को रसूल के लिए जिहाद करना चाहिए । 

मौलाना की धमकी से भयभीत केंद्रीय विधानसभा ने रंगीला रसूल के फैसले के 4 महीने के भीतर, सितंबर 1 9 27 में भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 2 9 5-ए में संशोधन कर दिया । 

महाशय राजपाल की हत्या 

मौलाना की घोषणा "काफिर राजपाल को बख्सा नहीं जाएगा" ने असर दिखाया और 6 अप्रैल 1929 को 1 9 साल के इलाम-दीन ने महाशय राजपाल को उनकी ही दूकान में बेदर्दी से क़त्ल कर दिया | (वर्तमान में पाकिस्तान में उसे गाज़ी इलाम-दीन शहीद के रूप में याद किया जाता है) 

यहां यह उल्लेख करना भी महत्वपूर्ण है कि इलाम-दीन द्वारा क़त्ल किये जाने के पूर्व राजपाल जी पर दो बार और भी प्राण घातक हमले हुए, जिसके कारण पंजाब पुलिस ने उन्हें सुरक्षा भी प्रदान की। 

किन्तु राजपाल जब 4 अप्रैल को अपनी हरिद्वार की यात्रा से वापस लौटे, तब पुलिस गार्ड पुनः तैनात नहीं किया गया, जिसका लाभ उठाकर इलाम-दीन ने दिन दहाड़े 6 अप्रैल की दोपहर को उनपर चाकू से हमला किया। राजपाल जी को कितनी बेदर्दी से मारा गया इसको दर्शाते है, उनके शरीर पर लगे 8 घाव | 4 उनके हाथों पर, 1 सिर पर, दो रीढ़ की हड्डी के ऊपर और एक उनकी छाती पर जो सीधा दिल में उतर गया) और मौके पर ही उनकी मौत हो गई । (एआईआर .1930 से, लाहौर 157- इलाम-दीन बनाम सम्राट) 

राजपाल एकमात्र ऐसे नहीं थे जिन्हें कथित ईशनिंदा के कारण मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथों जान देनी पडी, स्वामी श्रद्धानंद और नाथुराम शर्मा को भी क्रमशः अब्दुल रशीद और अब्दुल कय्यूम के हाथों अपना जीवन गंवाना पड़ा। 

सड़क छाप मुस्लिम के सामने मुस्लिम अभिजात वर्ग की चुप्पी 

इसे समझने के लिए हमें देखना चाहिए, रंगीला रसूल मामले में आधिकारिक वकील का बयान "मुसलमान समुदाय अन्य समुदायों की तुलना में धर्म के सवाल पर अधिक कट्टरपंथी है" (राजपाल बनाम सम्राट, एआईआर 1 9 27, लाहौर 5 9 2) । 

एक ओर तो मुस्लिम नेताओं ने अपने राजनीतिक हितों के लिए सड़क छाप मुस्लिम के क्रोध को खुली छूट दी, जबकि गांधीजी जैसे नेताओं ने रंगीला रसूल के प्रकाशन को ही दोषी ठहराया | मोहम्मद अली, जिन्ना, इकबाल आदि मुस्लिम नेताओं ने खुलकर इलाम दीन जैसे हत्यारे का साथ दिया, और क़ानून का मखौल बनाया, जिसने राजपाल जी को बरी किया था | उन्हें इलाम दीन का साथ देने में रत्ती भर भी संकोच नहीं हुआ, दूसरी ओर हिन्दू नेता अपनी अलग ही भूमिका में मस्त रहे | सवाल उठता है कि जब दोनों ही पक्ष पैगंबर के नाम पर हिंसा को जायज ठहरा रहे थे तो अपरिपक्व कौन ? 

महाशय राजपाल ने प्रेस की आजादी और विचार स्वातंत्र्य के लिए अपना बलिदान दिया । किन्तु आजाद भारत में आज के दिन कितने लोग उन्हें सादर स्मरण कर रहे हैं ? 

यहाँ तो विचार स्वातंत्र्य के नाम पर एम एफ हुसैन द्वारा हिन्दू देवी देवताओं के अर्द्ध नग्न चित्रों को ही अभिव्यक्ति की कलात्मक स्वतंत्रता माना जाता है , राम के चरित्र का दूषित चित्रण करने वाली 300 रामायण प्रचलन में हैं, शायद केवल वही साहित्यिक स्वतंत्रता की परिभाषा है और अभिव्यक्ति की ऐतिहासिक स्वतंत्रता है वेंडी डोनिगर के अपमानजनक नोट्स। हमें कठोरता से कहना चाहिए कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं वैचारिक कट्टरपंथ हैं। 

(लेखक पेशे से एक बाल विशेषज्ञ हैं)

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क्रांतिदूत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ईशनिंदा के कथित मानदंड - डॉ विवेक आर्य
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ईशनिंदा के कथित मानदंड - डॉ विवेक आर्य
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