मुंशी प्रेमचंद की गाय आज के परिप्रेक्ष में - प्रमोद भार्गव

SHARE:

यह कहानी लेन-देन यानी ब्याज का धंधा करने वाले दाऊदयाल और एक गाय-बछड़े के मालिक व दाऊदयाल के ऋणी रहमान से जुड़ी है। दाऊ एक तरह से डंडा-...



यह कहानी लेन-देन यानी ब्याज का धंधा करने वाले दाऊदयाल और एक गाय-बछड़े के मालिक व दाऊदयाल के ऋणी रहमान से जुड़ी है। दाऊ एक तरह से डंडा-बैंक चलाने वाले साहूकार हैं, क्योंकि वे 25-30 रुपए सैंकड़ा की दर से ब्याज पर कर्ज देते हैं और तय दिनांक को नहीं चुकाने पर कारिंदों का भी इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद कचहरी में मुकदमा चलाने की घौंस भी उनका हथियार है। यह बात तो उनकी प्रवृत्ति की हुई जो उन्हें निष्ठुर ठहराती है। दूसरे पात्र हैं, रहमान, जो धर्म से मुसलमान हैं और पेशे से कृषक हैं। धन की जरूरत उन्हें अपनी प्रिय दुधारु गाय बेचने को विवश कर देती है। सो रहमान गाय-बछड़े की पगहिया हाथ में पकड़े बाजार में खड़े हैं और खरीदार बोली लगा रहे हैं। लेकिन रहमान की अनुभवी आंखें ऐसे खरीददार की खोज में हैं, जो गाय को पाले और सेवा करे। इसी समय दाऊ मोहिनी-रूपा गऊ के निकट से गुजरते हैं और उनका मन ललचा जाता है। लोग 40 रुपए गाय का मूल्य लगा चुके हैं, लेकिन रहमान नहीं बेचता। दाऊ से मोलभाव के बाद 35 रुपए में सौदा तय हो जाता है। सौदे का लेन-देन हो जाने के बाद रहमान सस्ते में गाय का रहस्य उजागर करते हुए कहता है, ‘हजूर आप हिंदू हैं, इसे लेकर आप पालेंगे, इसकी सेवा करेंगे। ये सब कसाई हैं, इनके हाथ तो मैं 50 रुपए में भी कभी न बेचता। आप बड़े मौके से आ गए, नहीं तो ये सब जबरदस्ती गऊ छीन ले जाते। बड़ी बिपत में पड़ गया हूं सरकार, तब यह गाय बेचने निकला हूं। नहीं तो इस घर की लक्ष्मी को कभी नहीं बेचता। इसे अपने हाथों से पाला-पोसा है। कसाइयों के हाथ कैसे बेच देता ?‘ दाऊ का रहमान की बात सुनकर चकित होना स्वाभाविक था, क्योंकि उन्होंने गाय के सौदे में इतना घाटा उठाना तिलकधारी महात्माओं में भी नहीं देखा था। 

खैर, कहानी आगे बढ़ती है और रहमान की बूढ़ी मां मरने से पहले हज यात्रा की इच्छा जताती है। मातृभक्ति से सराबोर, लाचार मां की इच्छा को कैसे टाले, सौ 200 रुपए का कर्ज दाऊ से ही ले लेता है। हज से लौटते ही मां की मृत्यु हो जाती है। अब मृत आत्मा की शान्ति के लिए जकात, फातिहे और कब्र बनवानी जरूरी थे, सो फिर सकुचता रहमान दाऊ की चैखट पर आ खड़ा हुआ। दाऊ कृपा करते हैं और 200 रुपए फिर दे देते हैं। इस तरह ब्याज समेत 700 रुपए का कर्ज रहमान पर चढ़ जाता है। इन सब झंझटों से मुक्त हुए रहमान की उम्मीद तब जागी, जब खेत में गन्ने की उम्दा फसल लहलहा गई। लेकिन कहावत है न कि जब आंख फूटनी होती है तो घर के गेंडे से ही फूट जाती है। सो यह कहावत, भाग के मारे रहमान पर चरितार्थ हुई। खेत की रखवाली करते हुए जाड़े का अनुभव हुआ तो उसने तापने के लिए ईख के ही सूखे पत्तों को जला लिया। वक्त की मार पड़नी थी, सो पड़ी। हवा का झोंका आया और जलते पत्तों ने उड़कर खेत में आग लगा दी। सब किए किराए पर आग ने पानी फेर दिया। गांव वालों ने आग बुझाने की कोशिश भी की, लेकिन असफल रहे। 

दाऊदयाल को अग्निकांड का पता चला तो लठैत भेजकर रहमान को तलब कर लिया। रहमान दैवी आफत सुनाता है और कौड़ी-कौड़ी चुकाने का भरोसा देता है। किंतु दाऊ दयालुता दर्शाते हैं और सारा कर्ज माफ कर देते हैं। लेकिन कर्ज का बोझ लेकर मरना रहमान के लिए अनुचित है। तब दाऊ समझाते हैं, ‘तुमने उस वक्त पांच रुपए का नुकसान उठाकर गऊ मेरे हाथ बेची थी। वह शराफत मुझे याद है। उस अहसान का बदला चुकाना मेरी ताकत से बाहर है। जब तुम इतने गरीब और नादान होकर एक गऊ की जान के लिए पांच रुपए का नुकसान उठा सकते हो, तो मैं तुमसे सौगुनी हैसियत रखकर अगर चार-पांच सौ रुपए माफ कर देता हूं तो कोई बड़ा काम नहीं कर रहा हूं। तुमने भले ही जानकर मेरे ऊपर कोई अहसान न किया हो, पर असल वह मेरे धर्म पर अहसान था। मैंने भी तुम्हें धर्म के काम के लिए ही रुपए दिए थे। बस हम तुम दोनों बराबर हो गए। तुम्हारे दोनों बछड़े मेरे यहां हैं, जी चाहे तो लेते जाओ, तुम्हारी खेती में काम आएंगे।‘ 

रहमान दाऊ की बात सुनकर सोचता है, मनुष्य उदार हो तो फ़रिश्ता है और नीच हो तो शैतान। गोया रहमान बोला, ‘हजूर को इस नेकी का बदला खुदा देगा। मैं तो आज से अपने को आपका गुलाम ही समझूंगा।‘ दाऊ फिर नसीहत देते हैं, ‘गुलाम छुटकारा पाने के लिए जो रुपए देता है, उसे मुक्तिधन कहते हैं। तुम बहुत पहले मुक्तिधन अदा कर चुके। अब भूलकर भी यह शब्द मुंह से न निकलना।‘ कहानी का इस संवाद के साथ अंत हो जाता है। 

प्रेमचंद की यह कहानी आदर्षोन्मुखी है, इसलिए इसे कल्पना की उड़ान कहा जाकर यथार्थ से परे कि संज्ञा दी जा सकती है। लेकिन जो समाज को पढ़ना जानते हैं, वे बाखूबी जानते हैं कि समाज परस्पर सहयोग, मैत्रीभाव और त्याग के बिना गतिशील रह ही नहीं सकता ? प्रेमचंद ऐसे बिरले कथाकार थे, जो समाज को पढ़ना जानते थे। इसीलिए उनका रचनाकर्म बौद्धिक जुगाली न होकर एक ऐसा मानवीय धर्म था, जो रिश्ते और आचरणों की सरंचना बुनता है। विडंबना है कि आज हमारी सोच तो आगे जा रही है, किंतु आचरण बिगड़ और पिछड़ रहा है। इसलिए संस्कार कुरूप होकर भीड़-हत्या और बच्चियों से दुष्कर्म के क्रूरतम रूपों में सामने आ रहे हैं। देश की आजादी के इन 70 सालों में इन विद्रूपताओं को पोषित करने का काम उन राजनेताओं, व्यापारियों और नौकरशाहों ने भी किया है, जो कहने को हैं तो लोकसेवक हैं, किंतु लोकतंत्र के आवरण में उन्होंने, उन्हीं सामंती प्रावृत्तियों को ओढ़ लिया है, जो देश को पराधीन करने का कारण बनी थीं। सामंतवाद का प्रत्यक्ष छद्म भले ही कमजोर हो गया हो, लेकिन बाजारवादी उपभोक्ता संस्कृति अंततः इसी सामंती छद्म का नवीन संस्करण है। आर्थिक उदारवादी मूल्यों के औजारों ने सबसे खतरनाक काम मानवीय चेतना को दूषित करने का किया है। जबकि यह कहानी मानवीय चेतना के स्तर पर उनका गुणों को स्थापित करती है, जो मनुष्य और उसकी मनुष्यता को सुंदर और उदार बनाते हैं। 

कथित बहुपक्षीय राजनीति के खेबनहारों ने गाय को आज महज ‘गोमांस‘ के उत्पादन तक ठीक उसी तरह सीमित कर दिया है, जिस तरह उपभोक्तावादी विज्ञापन-संस्कृति ने स्त्री को भोग के लिए महज शरीर में रूपांतति कर दिया है। इसे किस कुरूप आक्रामकता के साथ भोगा जाए, इस हेतु गूगल और फेसबुक के सौदागरों ने नग्न फिल्मों को जंजाल में इंटरनेट पर परोस दिया है। नवजात बच्ची से लेकर वृद्धा से हो रहे दुष्कर्म इसी पोर्न संस्कृति की पृष्ठभूमि से उपज रहे हैं। चुनांचे, रहमान मुसलमान व इस्लाम धर्मावलंबी होने के पश्चात भी गाय का ऐसा स्वामी है, जो उसे लक्ष्मी मानता है और कसाइयों को ज्यादा कीमत मिलने के बावजूद नहीं बेचता है। इसीलिए उसकी अंतर्दृष्टि ‘दाम‘ नहीं ऐसा ग्राहक तलाशती हैं, जो गाय के उचित पालन-पोषण का भाव रखता हो। रहमान की अनुभवी आंखों को चेहरे पढ़ने की समझ थी, इसलिए वह दाऊ का चेहरा पढ़ लेता है और अंततः कम मूल्य में उन्हीं को गाय बेचता है। 

प्रेमचंद के अपने संपूर्ण रचनाकाल में उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रेरणा का स्रोत स्वदेषी विचार रहा। ग्राम और किसान उनकी प्राथमिकता रहे। नगरीय सभ्यता से संबंध होने के बाद भी इसके मोहपाश में वे कभी उलझे नहीं। आरंभ में दयानंद सरस्वती का उन पर प्रभाव रहा। इसमें दो मत नहीं कि हिंदू संस्कारों में गो-पूजा भी धर्म का एक हिस्सा है। गो-पूजा धर्म का भाग इसलिए भी है, क्योंकि गाय ही एक समय शत-प्रतिशत देश की आबादी की आजीविका का प्रमुख साधन रही है। दूध देने के अलावा वह गाय ही है, जो खेती-किसानी के लिए सूघड़ बैलों को जन्मती है। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम एकता का सन्देश देने के साथ परस्पर धर्म की रक्षा, सामुदायिक समरसता और आर्थिक विषमता की चौड़ी हुई खाई को भी पाटने का संदेश दिया है। 

जब गरीब और लाचार रहमान ऋणमाफी के रहस्य को समझ नहीं पाता तो दाऊ उसे मित्र के रूप में मददगार बनकर समझाते हैं, ‘तूने पांच रुपए घाटा उठाकर मुझे जो गाय बेची, उससे 800 रुपए का दूध मैं प्राप्त कर चुका हूं और नफा में दो बछड़े भी मेरे पास हैं। तुम अपने लाभ के लिए कसाईयों को गाय बेच देते तो गाय-बछड़े भी मारे जाते और मुझे जो इससे 800 रुपए का दूध मिला है, वह भी नहीं मिलता।‘ प्रेमचंद सामाजिक समरसता के लिए अर्थ के साथ धर्म के महत्व की भी समझ रखते थे, क्योंकि वह धर्म ही है, जो सभी धर्मावलंबियों के आचरण को अनुशासित रखते हुए त्याग की भावना को जगाए रखता है। इसलिए प्रेमचंद निसंकोच दाऊ से कहलाते हैं, ‘कसाईयों को गाय न बेचकर तुमने भले ही मुझ पर कोई अहसान न किया हो, पर असल में वह मेरे धर्म पर अहसान था और मैंने भी तुम्हें जो रुपए दिए थे, वे धर्म के लिए ही दिए थे। विपरीत धर्मावलांबियों के परस्पर एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करने का ऐसा अनूठा उदाहरण हिंदी कथा साहित्य में दुर्लभ है ? ब्याज तो ब्याज मूलधन का ब्याजी द्वारा यह परित्याग इस बात का भी संकेत है कि देष में जो आर्थिक असमानता बढ़ रही हैं, उसे हम दूर विकेन्द्रीकरण और समान वितरण से ही कर सकते हैं। अन्यथा संविधान के मूलभूत सिद्धांत में भले ही, न्याय, समता और अपरिग्रह की भावना अंतनिर्हित हो, उसे हम यथार्थ में जमीन पर उतार नहीं पाएंगे ? शायद इसीलिए विचारधाराओं के नमूनों को नकारने वाले प्रेमचंद कहते थे, ‘असली बात विचारधारा नहीं हैं, बल्कि जन-जागरण है। अगर जनता जग जाएगी तो वह व्यवस्था के अलमबरदारों द्वारा पोषित निहित स्वार्थों का सामना कर सकेगी। वरना, उसके स्वतंत्र अस्तित्व को इन्हीं निहित स्वार्थों की भेंट चढ़ जाना होगा। प्रेमचंद का यह कहना आज सौ टका सच है, गो-धन जा तो उन कत्लखानों में रहा है, जिन्हें चलाने के लायसेंस सरकारों ने दिए हुए हैं, लेकिन बेमौत मारे वे जा रहे हैं, जो जाने-अनजाने में इन कत्लखानों को अपना पशुधन अपनी आजीविका के लिए बेच रहे हैं। यथा, गोकशी वाकई रोकनी है तो इन कत्लखानों की तालाबंदी क्यों नहीं कर दी जाती ?

COMMENTS

नाम

अखबारों की कतरन,38,अपराध,1,आंतरिक सुरक्षा,15,इतिहास,51,उत्तराखंड,4,ओशोवाणी,16,कहानियां,30,काव्य सुधा,69,खाना खजाना,20,खेल,18,चिकटे जी,25,तकनीक,83,दतिया,1,दुनिया रंगविरंगी,32,देश,157,धर्म और अध्यात्म,191,पर्यटन,14,पुस्तक सार,41,प्रेरक प्रसंग,78,फिल्मी दुनिया,8,बीजेपी,36,बुरा न मानो होली है,2,भगत सिंह,5,भारत संस्कृति न्यास,6,भोपाल,20,मध्यप्रदेश,269,मनुस्मृति,14,मनोरंजन,42,महापुरुष जीवन गाथा,96,मेरा भारत महान,286,मेरी राम कहानी,20,राजनीति,8,राजीव जी दीक्षित,18,लेख,913,विज्ञापन,1,विडियो,22,विदेश,45,वैदिक ज्ञान,69,व्यंग,5,व्यक्ति परिचय,12,शिवपुरी,315,संघगाथा,41,संस्मरण,32,समाचार,439,समाचार समीक्षा,673,साक्षात्कार,4,सोशल मीडिया,3,स्वास्थ्य,21,
ltr
item
क्रांतिदूत: मुंशी प्रेमचंद की गाय आज के परिप्रेक्ष में - प्रमोद भार्गव
मुंशी प्रेमचंद की गाय आज के परिप्रेक्ष में - प्रमोद भार्गव
https://2.bp.blogspot.com/-WUc-L4Ttx9A/W16CxqjgYsI/AAAAAAAAG-c/dAUXkuRXOboYkxkERtXyTXP2okx1y7dOgCLcBGAs/s1600/1.jpg
https://2.bp.blogspot.com/-WUc-L4Ttx9A/W16CxqjgYsI/AAAAAAAAG-c/dAUXkuRXOboYkxkERtXyTXP2okx1y7dOgCLcBGAs/s72-c/1.jpg
क्रांतिदूत
http://www.krantidoot.in/2018/07/Munshi-Premchand-ki-gay-in-today-perspective-Pramod-Bhargava.html
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/2018/07/Munshi-Premchand-ki-gay-in-today-perspective-Pramod-Bhargava.html
true
8510248389967890617
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy