मोब लिंचिंग – निंदा के साथ उसके मूल कारण और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने पर भी हो विमर्श !

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हिंसा कोई भी करे, उसका समर्थन नहीं किया जा सकता | किन्तु हिंसा के मूल कारण पर विचार किये बिना, ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रुक भी नहीं...



हिंसा कोई भी करे, उसका समर्थन नहीं किया जा सकता | किन्तु हिंसा के मूल कारण पर विचार किये बिना, ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रुक भी नहीं सकती | यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अलवर की घटना को लेकर एक पक्षीय विवेचन किया जा रहा है | कुछ विन्दु विचारणीय हैं – 

गौवंश को लेकर हिन्दू जनमानस के भाव किसी से छुपे नहीं हैं | आजादी के पूर्व और आजादी के बाद भी गौरक्षा को लेकर क़ानून बनाए जाने की मांग होती रही है | यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि आज की स्थिति में सर्वाधिक पांच करोड़ गौवंश केवल राजस्थान में ही बचे हैं | अतः गौ तस्करों का सर्वाधिक ध्यान भी राजस्थान पर ही केन्द्रित है | पहले तो हजारों गौवंश पडौस के उत्तर प्रदेश के बूचड़खानों में कटने हेतु पहुँच रहे थे, किन्तु वहां योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद, कडाई से अवैध कत्लखाने बंद हुए और गुजरात में भी कड़े क़ानून बन गए, फलस्वरूप गौ तस्करी काफी हद तक थम गई | 

हालांकि पूर्व से ही राजस्थान गोवंशीय पशु (वध का प्रतिषेध और अस्थाई प्रवर्जन या निर्यात का विनियमन) अधिनियम 1955 लागू था, किन्तु राजस्थान मंत्रिमंडल ने 12 दिसंबर, 2017 को सशक्त गौवंश कानून संशोधन अधिनियम स्वीकृत कर महामहिम राष्ट्रपति जी को भेज दिया | राष्ट्रपति महोदय के अनुमोदन पश्चात राजस्थान विधानसभा ने भी 9 मार्च 2018 को राजस्थान गोवंशीय पशु (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रव्रजन या निर्यात का विनियमन) (संशोधन) विधेयक, 2018 ध्वनिमत से पारित कर दिया । इस क़ानून के लागू हो जाने के बाद अवैध रूप से गौवंश को ले जाने वाले वाहनों को राजसात करने, गौतस्करी व गौहत्या करने वालों को १० वर्ष के कठोर कारावास आदि प्रावधान प्रभावशील हो गए | किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसके बाद भी गौ तस्कर अवैध रूप से हजारों गौवंश को महाराष्ट्र ले जा रहे हैं, जहाँ से उन प्रदेशों को भेज दिया जाता है, जहाँ गौहत्या प्रतिबंधित नहीं है । 

केरल, पश्चिम बंगाल, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और केंद्र शासित लक्षद्वीप में गौ-हत्या पर कोई प्रतिबंध नहीं है। यहां गाय, बछड़ा, बैल, सांड और भैंस का मांस खुले तौर पर बाज़ार में बिकता है। असम और पश्चिम बंगाल में क़ानूनन उन्हीं पशुओं को काटा जा सकता है जिन्हें ‘फ़िट फॉर स्लॉटर सर्टिफ़िकेट’ मिला हो। ये उन्हीं पशुओं को दिया जा सकता है जिनकी उम्र 14 साल से ज़्यादा हो, या जो प्रजनन या काम करने के क़ाबिल न रहे हों। जहाँ तक पश्चिम बंगाल का प्रश्न है, बहां तो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय भी प्रभाव शून्य रहते हैं | जैसे कि सर्वोच्च न्यायालय ने ईद के मौके पर गौवंश की कुर्बानी पर रोक लगाई, किन्तु वहां धड़ल्ले से सार्वजनिक चौराहों पर खुले आम ईद पर सांडों की नृशंस ह्त्या की जाती है | 

अब बात करते हैं अलवर में हुई हत्या की जिसे मोब लिंचिंग कहा जा रहा है | हत्या - हत्या है, जघन्य अपराध है | उसका कतई समर्थन नहीं किया जा सकता | किन्तु यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि राजस्थान में गौ परिवहन प्रतिबंधित हो जाने तथा वाहन जब्ती का क़ानून बन जाने के बाद गौ तस्करों ने नया तरीका अख्तियार किया है | अब वे गौधन को वाहनों में ले जाने के स्थान पर पैदल हांक कर ले जाते हैं | उन्हें गौभक्त रोकने का प्रयत्न भी करते हैं | किन्तु अलबर काण्ड में तो स्थिति दूसरी ही बनती दिखाई दे रही है | इण्डिया टुडे की यह लिंक संदेह पैदा करती है कि उक्त हत्या आखिर की किसने ? कथित गौ रक्षकों ने या पुलिस ने ? एक प्रत्यक्षदर्शी नवल किशोर के अनुसार – 

जिन बच्चों को मुजरिम बनाया गया है वे निर्दोष हैं | ये लोग गाय लेकर खेतों में से निकल रहे थे, जिसके कारण फसल को नुक्सान पहुँच रहा था | गाँव वालों ने इनकी घेराबंदी की तो ये लोग डरकर भागे व रकबर खान फिसल कर गिर गया, व उसके पैर में चोट आई थी | बारिश होने के कारण वहां बहुत कीचड़ थी, वह कीचड़ से लथपथ था, उसे पुलिस ने पहले नहलाया, फिर उसके साथ मारपीट की | उस समय तक वह बिलकुल ठीक था | 

गाडी में बैठाकर पुलिस उसे तलाबटी लेकर पहुंची, जहाँ एक बार फिर गाँव की चौपाल पर उसके साथ मारपीट हुई | बाद में रामगढ़ थाने पर भी यही क्रम जारी रहा और मारपीट हुई | उसके बाद हम गायों को तीन बजे के करीब गौशाला छोड़ने गए, तब तक भी वह बिलकुल ठीक था | उसके बाद जब हम चार बजे वापस आये तब वह मृत था | 

रकबर खान की मौत पुलिस की पिटाई से हुई हो अथवा ग्रामीणों के हाथों, लेकिन मूल कारण है गौवंश को स्लाटर हाउस पहुंचाने के लिए उनका अवैध परिवहन, जो हिन्दू मन को आहत करता है | जब तक यह नहीं रोका जाएगा, इस तरह की घटनाएँ होती रहेंगी | यह दुखद है कि इस समस्या की जड़ पर चर्चा होने के स्थान पर तात्कालिक विषयों पर ही ध्यान दिया जाता है | जिन पुलिस वालों ने पीटा, वे भी हिन्दू होने के कारण ही गुस्से में आये होंगे और अगर ग्रामीणों ने पीटा, तो वे भी हिन्दू ही थे | 

जो भी हो रकबर खान की हत्या हुई है, और उसके अपराधियों को तो दंड मिलना ही चाहिए और मिलेगा भी, किन्तु साथ साथ अगर गौ रक्षण, गौ संवर्धन पर भी विमर्श हो, तो ज्यादा सकारात्मक परिणाम मिलेंगे | 

इंडिया टुडे की लिंक – 

https://twitter.com/IndiaToday/status/1021316264118095872

अंत में एक अहम सवाल -
ठीक उसी दिन और भी चार घटनाएँ हुईं, किन्तु उनकी चर्चा क्यों नहीं ????

1 राजस्थान के ही बाड़मेर में अकबर, शौकत और आठ अन्य लोगों ने एक दलित नौजवान की पिटाई लगाई, क्योंकि वह एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था ! मौत !
2 कासगंज उत्तर प्रदेश में शानू खान और उसके परिवार द्वारा एक हिन्दू लड़की का अपहरण !
3 सागर मध्यप्रदेश में मुबारक अली, शाहिद और करीम ने एक नाबालिग लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया ! दुखी लड़की ने फांसी लगाकर खुदकशी कर ली !
4 मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश में शरीक मुल्तानी एक नाबालिग लड़की को ब्लैकमेल कर महीनों तक बलात्कार करता रहा और जब उसने बचने की कोशिश की तो उसका विडियो इंटरनेट पर अपलोड कर दिया !

सवाल यह है कि नेशनल मीडिया केवल उन चुनिन्दा घटनाओं को ही क्यों महत्व देता है, जिनसे हिन्दू अपराधी और मुस्लिम पीड़ित प्रमाणित हों | निसंदेह हर मामले में कानूनी कार्यवाही होती है, किन्तु मीडिया का पक्षपात साफ़ है | उसका एक ही हिडिन एजेंडा रहता है - हिन्दू द्रोह तथा मोदी सरकार और भाजपा के विरुद्ध निंदा अभियान !



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क्रांतिदूत: मोब लिंचिंग – निंदा के साथ उसके मूल कारण और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने पर भी हो विमर्श !
मोब लिंचिंग – निंदा के साथ उसके मूल कारण और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने पर भी हो विमर्श !
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