योगी आदित्यनाथ और दलित "हनुमान" जी - डॉ विवेक आर्य

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"भारत की परंपरा में एक ऐसे लोक देवता हैं जो स्वयं वनवासी हैं, गिरिवासी हैं, दलित हैं, वंचित हैं, सबको लेकर के सभी पूरे भारतीय समुदाय को लेकर उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूरब से पश्चिम तक सबको जोड़ने का काम बजरंगबली करते हैं। इसलिये बजरंगबली का संकल्प होना चाहिये।"

यही शब्द योगी जी के थे राजस्थान की चुनावी सभा में। मगर सुनने वालों को समझ नहीं आया और उन्होंने योगी जी पर यह आरोप लगा दिया कि योगी जी ने हनुमान जी को दलित कहा है? आप वाल्मीकि रामायण उठा कर देखिये। वीरवार हनुमान जी को अपने मित्र सुग्रीव के साथ किष्किंधा से निकल कर ऋषिमुख पर्वत पर बाली के भय के कारण रहना पड़ा। सुग्रीव की पत्नी को बाली ने जबरन बंदी बनाकर अपने महलों में रखा। यह अत्याचार नहीं तो क्या है? आपको जानकार आश्चर्य होगा कि हनुमान जी के वास्तविक गुण क्या थे?

किष्किन्धा कांड (3/28-32) में जब श्री रामचंद्र जी महाराज की पहली बार ऋष्यमूक पर्वत पर हनुमान से भेंट हुई तब दोनों में परस्पर बातचीत के पश्चात रामचंद्र जी लक्ष्मण से बोले-
न अन् ऋग्वेद विनीतस्य न अ यजुर्वेद धारिणः |न अ-साम वेद विदुषः शक्यम् एवम् विभाषितुम् || 4/3/28

अर्थात-

“ऋग्वेद के अध्ययन से अनभिज्ञ और यजुर्वेद का जिसको बोध नहीं है तथा जिसने सामवेद का अध्ययन नहीं किया है, वह व्यक्ति इस प्रकार परिष्कृत बातें नहीं कर सकता। निश्चय ही इन्होनें सम्पूर्ण व्याकरण का अनेक बार अभ्यास किया है, क्यूंकि इतने समय तक बोलने में इन्होनें किसी भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया है। संस्कार संपन्न, शास्त्रीय पद्यति से उच्चारण की हुई इनकी वाणी ह्रदय को हर्षित कर देती है”।

सुंदर कांड (30/18-20) में जब हनुमान अशोक वाटिका में राक्षसियों के बीच में बैठी हुई सीता को अपना परिचय देने से पहले हनुमान जी सोचते है-

“यदि द्विजाति (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) के समान परिमार्जित संस्कृत भाषा का प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भय से संत्रस्त हो जाएगी। मेरे इस वनवासी रूप को देखकर तथा नागरिक संस्कृत को सुनकर पहले ही राक्षसों से डरी हुई यह सीता और भयभीत हो जाएगी। मुझको कामरूपी रावण समझकर भयातुर विशालाक्षी सीता कोलाहल आरंभ कर देगी। इसलिए मैं सामान्य नागरिक के समान परिमार्जित भाषा का प्रयोग करूँगा।”

इस प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं की हनुमान जी चारों वेद ,व्याकरण और संस्कृत सहित अनेक भाषायों के ज्ञाता भी थे।

ऐसे महान गुणों के ज्ञाता को वन में निर्वासित जीवन जीना पड़ा। यह अत्याचार नहीं तो क्या था? यह शोषण नहीं तो क्या था?

वास्तविकता यह है कि 'दलित' शब्द का ऐसा राजनीतिकरण हुआ है कि दलित शब्द का मूल अर्थ लुप्त हो गया है। दलित शब्द का प्रयोग प्रो इन्द्रविद्यावाचस्पति जी के अनुसार 1920 के दशक में आरम्भ हुआ था। तब दलित शब्द का प्रयोग समाज के वंचित, शोषित, प्रताड़ित वर्ग के लिए हुआ था। स्वतंत्रत भारत में दलित शब्द का राजनीतिकरण हो गया। एक करोड़ों के आलीशान बंगले और महंगी कारों का शौकीन नेता भी अपने आपको दलित कहता हैं। एक परिवार जिसमें तीन पीढ़ी से अनेक सदस्य IAS है। वह परिवार भी अपने आपको दलित परिवार कहता हैं। एक कई सौ करोड़ की कंपनी का मालिक भी अपने आपको दलित कहता हैं। वास्तव में हमारे देश में अगर कोई दलित है तो वह हिन्दू समाज है। पिछले 1200 वर्षों से वह मुस्लिम हमलावरों के अत्याचारों को झेलता आया हैं। यहाँ तक की उसे अपने पुरखों की जमीन अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश के रूप में छोड़नी पड़ी। लाखों मंदिरों के विध्वंश, लाखों के इस्लामिक धर्मान्तरण, लाखों के कत्लेआम के रूप में हमें उत्पीड़न सहना पड़ा। पिछले 300 वर्षों से वह अंग्रेजों के अत्याचारों को झेलता आ रहा हैं। जिन्होंने न केवल उसके अनेक प्रकार से शोषण किया। अपितु उसे उसकी संस्कृति और उसकी सभ्यता से ही इतना दूर कर दिया कि बौद्धिक रूप से वह हर मसले के लिए पश्चिम की ओर देखता हैं। यही कारण है कि हमारे देशवासियों का पहनावा, भाषा, शिक्षा, इतिहास ज्ञान, सोचने-समझने की दिशा, संविधान, देश की नीतियां सभी में आपको पश्चिम का प्रभाव दीखता हैं। हमारी युवा पीढ़ी अपने प्राचीन पूर्वजों के धर्म और संस्कारों के प्रति बेरुखी हो चली है और पश्चिम के भोगवाद में आश्रय खोजने का प्रयास कर रही हैं। 

वर्तमान में भी असली दलित तो कश्मीरी हिन्दू है जिन्हें कश्मीर से विस्थापित होना पड़ा। असम, बंगाल और केरल के हिन्दू अल्पसंख्यक होकर विस्थापित होने के कगार पर है। वह दलित नहीं तो क्या हैं? अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के खेल में उसके अधिकारों का दमन हो रहा हैं। उसका किसी को भान नहीं हैं। कोई भी अल्पसंख्यक संस्थान आसानी से स्कूल, कॉलेज खोल सकता हैं। उसमें कोई आरक्षण न छात्रों के प्रवेश में और न ही अध्यापकों की नियुक्ति में लागु होगा। जितने भी बड़े हिन्दू मंदिर है उनके दान का हिसाब सरकार रखती हैं। चर्च और मस्जिदों पर यह नियम समान रूप से लागु क्यों नहीं हैं? 

सत्य यह है कि अल्पसंख्यक के नाम पर मलाई गैर हिन्दुओं को खिलाई जा रही हैं। इसलिए हिन्दुओं को दलित क्यों न कहा जाये? जैसे उस काल में हनुमान जी के सर्वगुण संपन्न होते हुए भी अधिकारों का दमन हुआ ऐसा ही दमन आज भारत देश में बहुसंख्यक कहलाने वाले हिन्दुओं का हो रहा हैं। विडंबना यह है कि हम पिछले 1200 वर्षों से लगातार युद्ध क्षेत्र में हैं। न हमारा इस ओर ध्यान है और न ही हमारी तैयारी हैं। योगी जी ने इसी स्थिति की ओर ईशारा ही तो किया हैं। अगर कोई हिन्दू अधिकारों की बात करता है तो वह कट्टरवादी कहलाता हैं। अगर कोई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात करता है तो सेक्युलर और बुद्दिजीवी कहलाता हैं। इस स्थिति के लिए दोष किसे देना चाहिए। आप स्वयं निर्णय कीजिये!

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