राफेल पर विवाद - सचाई को रोंदने का असफल राहुल प्रयास !

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पिछले 6 माह से राहुल गांधी राफ़ेल को लेकर सीएजी(कैग) की रिपोर्ट के पीछे पडे थे, और अब जब वह सार्वजनिक होगयी है, तो उसे नकारने में जुट...



पिछले 6 माह से राहुल गांधी राफ़ेल को लेकर सीएजी(कैग) की रिपोर्ट के पीछे पडे थे, और अब जब वह सार्वजनिक होगयी है, तो उसे नकारने में जुटे हुए हैं। कैग की रिपोर्ट के अनुसार मोदी सरकार द्वारा किया गया राफ़ेल सौदा यूपीए सरकार द्वारा 2012 में किये गए अपूर्ण सौदे से 2.86% सस्ता है, जिससे भारत की सरकार को ₹ 27000 करोड़ की बचत हुई है। अब यही 27000 करोड़ की संख्या है जो राहुल गांधी और कांग्रेस को न सोने दे रही है और न ही रोने दे रही है। 

जब भारत द्वारा राफ़ेल युद्धक विमान को खरीदने का अनुबंध किया गया तब इन विमानों का भुगतान करने के लिए एक कोष बनाया गया। इसके लिए फ्रांस की सरकार ने अपने राष्ट्रीय बैंक में एक ट्रेसरी एकाउंट खोला है जिसपर फ्रांस की सरकार का नियंत्रण है। इस खाते में भारत की सरकार एक मुश्त रकम का भुगतान नही जमा करती है बल्कि इसमे श्रंखलावर पैसा जमा करती है। इससे भुगतान की प्रक्रिया, फ्रांस व भारत के प्रतिनिधियों के बीच होने वाली हर तिमाही उस बैठक के अनुसार होती है जो राफ़ेल सौदे की प्रगति की समीक्षा करती है। यह सब फ्रांस में, भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टेन रैंक के अधिकारी की निगरानी में होता है। 

यहां यह बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट है कि भारत की सरकार राफ़ेल परियोजना में भागी बने विभिन्न विक्रेताओं को कोई भी सीधे भुगतान नही कर रही है। भारत द्वारा राफ़ेल युद्धक विमान के लिए सभी तरह का भुगतान करने के लिए जो कोष बनाया गया है वह फ्रांस के राष्ट्रीय बैंक में बना है और उस पर सीधा नियंत्रण फ्रांस की सरकार का है। 

अतः यह स्वतः स्पष्ट है कि यह राफ़ेल सौदा पूरी तरह से दो राष्ट्रों, भारत और फ्रांस के बीच है न कि दस्सऑल्ट एविएशन और भारत के बीच है। राहुल गांधी के नैराश्य का भी यही कारण है कि यह सौदा दस्सऑल्ट एविएशन और सोनिया गांधी सहायतार्थ कोष के बीच क्यों नही हुआ है? 

श्री मिह्नाज मर्चेंट के अनुसार - 

यह जाना माना तथ्य है कि रक्षा मंत्रालय के एक वर्ग और हथियारों की लॉबी का गठजोड़ रहता आया है - जिसने वर्षों में भारत की रक्षा क्षमता को कमजोर किया है। यह भी समझ में आता है कि प्रधान मंत्री कार्यालय देश की सुरक्षा के मद्दे नजर राफेल समझौते को जल्द से जल्द निबटाना चाहता था, इसीलिए भारत सरकार और फ्रांस सरकार ने इस सौदे में, हथियारों के सौदागरों और उनके आकाओं को सीधे तौर पर काट दिया । 

आजकल उन्हीं सौदागरों के प्रवक्ता कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बने हुए हैं और निहायत बेशर्मी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'चौकीदार चोर है' के नारों द्वारा बदनाम करने का असफल प्रयत्न कर रहे हैं | उनका सोचना है कि अगर एक झूठ को बारबार दोहराया जाता है, तो वह सच लगने लगता है। 

राहुल का कहना है कि फ्रांस में निर्मित होने वाले 36 राफेल लड़ाकू जेट विमानों के लिए भारत ज्यादा भुगतान करने जा रहा है । स्मरणीय है कि कांग्रेस ने 2007 में 126 राफेल जेट विमानों के लिए डसॉल्ट के साथ बातचीत शुरू की। इनमें से 18 फ्रांस में और 108 भारत में एचएएल के साथ साझेदारी में बनाए जाने थे। 2012 में, कांग्रेस ने अचानक इस सौदे को रद्द कर दिया। तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी का वह वाक्य प्रसिद्ध हुआ - "इसके लिए पैसा कहां है?" 

अब भारत-फ्रांस अंतर-सरकारी समझौते में इन लड़ाकू विमानों को 59,000 करोड़ रुपये में अंतिम रूप दिया गया है - जो कि 13 हथियार-विशिष्ट राफेल जेट के लिए 13 भारत-विशिष्ट संवर्द्धन के साथ 1,640 करोड़ रुपये का काम करता है। 



अब पहली बात तो यह कि जब सौदे को अंतिम रूप दिया ही नहीं गया, तो यह कहना कि हम फलां कीमत में खरीदने जा रहे थे, मूर्खतापूर्ण झूठ नहीं तो क्या है ? अब ये देखना दिलचस्प होगा कि अन्य देशों ने किस कीमत पर हथियारबंद राफेल फाइटर जेट खरीदे हैं | 

अलजजीरा ने 4 मई, 2015 को यह जानकारी प्रसारित की कि कतर की वायु सेना के लिए राष्ट्रपति फ्रेंकोइस होलांडे और कतरी इमिर शेख तमाद बिन हमद अल थानी ने 6.3 बिलियन पाउंड पर हस्ताक्षर किए हैं। इस करार के अनुसार मय हथियारों के 24 डसॉल्ट एविएशन-निर्मित राफेल फाइटर जेट्स की कीमत 7.02 बिलियन डॉलर तय हुई ।” 

अर्थात उस समय की मुद्रा कीमत के अनुसार (1 डॉलर = 64 रुपये) कतर सरकार ने 24 राफेल जेट का सौदा 45,000 करोड़ रुपये में किया।इस प्रकार एक रफाल की कीमत हुई 1,875 करोड़ रुपये – जो कि वर्तमान में भारत सरकार द्वारा किये गए सौदे से 235 करोड़ रुपये प्रति राफेल अधिक है । 

इसी प्रकार फरवरी 2015 में, मिस्र सरकार ने भी पूरी तरह से लोड किए गए 24 राफेल जेट खरीदने के लिए एक समझौते को अंतिम रूप दिया। फ्रांस के रक्षा मंत्री जीन-यवेस ले ड्रियन 16 फरवरी, 2015 को 24 राफेल लड़ाकू जेट की बिक्री के लिए € 5.2 बिलियन के अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के लिए काहिरा पहुंचे । यह कीमत भी भारत के वर्तमान सौदे से 98 करोड़ रुपये कम है । 

इसके बाद भी राहुल गांधी अगर यह आरोप लगाते हैं कि भारत 36 राफेल के लिए अधिक भुगतान कर रहा है, तो इसे अज्ञानता कम, कुटिलता अधिक कहा जा सकता है । क्योंकि ये सारे तथ्य पहले से अल जज़ीरा और फ्रांस 24 की रिपोर्ट में सार्वजनिक हो चुके हैं। अतः अगर यह आरोप लग रहे हैं कि राफेल के मुख्य प्रतिद्वंद्वी यूरोफाइटर के लिए यह सारी लोबिंग हो रही है, तो क्या गलत है ? कथित हथियार डीलरों, संजय भंडारी, दीपक तलवार, राजीव सक्सेना और क्रिश्चियन मिशेल आदि के यूरोफाईटर से सम्बन्ध जगजाहिर हैं । 

भंडारी, जो कथित तौर पर रॉबर्ट वाड्रा और वाड्रा के सहयोगी मनोज अरोड़ा के करीबी हैं, 2016 से फरार हैं। उन पर आधिकारिक राज अधिनियम (OSA) के तहत आरोप लगाए गए हैं। इस बीच भंडारी के साथ कथित संबंधों को लेकर वाड्रा से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) पूछताछ कर ही रहा है। 

अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर मामले में पूछताछ के तहत मिशेल पहले ही तिहाड़ जेल में है | महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अगस्ता वेस्टलैंड की मूल कंपनी और यूरोफाइटर बनाने वाली फर्म के बीच एक इक्विटी हिस्सेदारी है । 

अंत में, अब बात अनिल अंबानी की । 

राहुल गांधी अच्छी तरह जानते हैं कि लगभग 30,000 करोड़ रुपये के जो ऑफसेट अनुबंध दिए जाने हैं, वे अभी तक दिए नहीं गए हैं और अक्टूबर 2019 तक दिए भी नहीं जायेंगे | और जब दिए भी जायेंगे, तो उसमें कई दर्जन बड़े और छोटे भारतीय ठेकेदार भी होंगे। इनमें टाटा, महिंद्रा, एलएंडटी, भारत फोर्ज और डसॉल्ट-रिलायंस के संयुक्त उपक्रम शामिल हैं। अनिल अंबानी की कंपनी को 30,000 करोड़ रुपये के कॉन्ट्रैक्ट में से कितना मिलेगा? शायद, एक हिस्सा। स्वयं डसॉल्ट के ही अनुसार डसॉल्ट-रिलायंस जेवी के बीच जो अनुबंध हुआ है, वह 850 करोड़ रुपये मूल्य के डैसॉल्ट के छोटे फाल्कन बिजनेस जेट के लिए स्पेयर पार्ट्स बनाने का हुआ है, राफल्स बनाने का नहीं। 

अगर यह माना जाए कि इस सौदे में रिलायंस को 10% का शुद्ध लाभ प्राप्त होगा, तो वह महज 85 करोड़ रुपये का होगा । और इसके बाद भी जब राहुल जी धडाधड भाषण झाडते दिखते हैं कि मोदी जी ने अनिल अंबानी की जेब में तीस हजार करोड़ रुपये डाल दिए, तो श्री पुष्कर अवस्थी का यह कथन सत्य प्रतीत होता है – 

राहुल गांधी का राफ़ेल प्रलाप विक्षिप्तता के शिखर पर पहुंच गया है। यह अहंकारपूर्ण निर्लज्जता की भी पराकाष्ठा है । राहुल गांधी ने तो मानो अपनी पूरी दिनचर्या ही राफ़ेल को समर्पित कर दी है। लगता है कि वे नित्य रात को राफ़ेल का स्वप्न में आवाहन करके नए झूठ का सृजन करते हैं और सुबह उसका उद्वेलित हो कर उवाच करते है। 

साभार आधार - https://www.dailyo.in/politics/rafale-controversy-rahul-gandhi-narendra-modi-anil-ambani-dassault-congress-bjp/story/1/29365.html

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