1999 का कंधार कांड बनाम आतंकियों को छोड़ने का काला इतिहास - निखिल कन्हौआ

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आजकल चुनावी चकल्लस में राहुल गांधी कंधार काण्ड के बहाने भाजपा पर निशाना साध रहे हैं, जिसमें आतंकी अजहर मसूद को 180 हवाई यात्रियों की...



आजकल चुनावी चकल्लस में राहुल गांधी कंधार काण्ड के बहाने भाजपा पर निशाना साध रहे हैं, जिसमें आतंकी अजहर मसूद को 180 हवाई यात्रियों की जान बचाने के लिए भाजपा सरकार द्वारा छोड़ा गया था | यह पहला मौका नहीं था, जब आतंकियों द्वारा लोगों को बंधक बनाकर, बदले में अपने साथियों को छुडाया गया हो | वर्ष 1989 से 1992 तक तो नेताओं के परिवारजनों का अपहरण कर आतंकियों को छुड़ाने का एक सिलसिलेवार दौर चला था...

पहला प्रकरण मुफ्ती मोहम्मद सईद के गृह मंत्री बनने के ठीक छः दिन बाद 8 दिसंबर 1989 को सामने आया...जब जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जे के एल एफ) के अलगाववादी नेताओं ने श्रीनगर के लालदेद अस्पताल में डॉक्टर के रूप में काम कर रही मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद को बंधक बना लिया था...
तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस रिहाई के बदले 5 दुर्दांत आतंकियों को रिहा किया था...
1:- शेख हमीद
2:- शेर खान (पाकिस्तानी जो छूटकर पाकिस्तान चला गया)
3:- नूर मोहम्मद कलवल
4:- जावेद अहमद जरगार
5:- अल्ताफ बट
इनमें से शेख हमीद और जावेद जरगार ने 1999 के प्लेन हाईजेक में भी सक्रिय भूमिका निभाई...
उस समय प्रधानमंत्री थे व्ही पी सिंह (जनता दल) और गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद (पी डी पी) 

इस प्रकरण में जिन लोगों पर अपराध करने या अपराध में सहयोग करने का प्रकरण दर्ज हुआ उन तेरह लोगों में जे के एल एफ के छः बड़े नेता
1:- अशफाक माजिद वानी
2:- यासीन मलिक
3:- जावेद मीर
4:- मोहम्मद सलीम
5:- याकूब पंडित
6:- अमानुल्लाह खान थे... 

यह तो वह कांड है जिससे कांग्रेस अपना पल्ला झाड़ सकती है...परंतु इस बात का क्या जबाब है कि, इन नेताओं पर बाद के वर्षों में कांग्रेस शासनकाल के दौरान भी कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं हुई और ये लोग जेल जाने के बजाय बेख़ौफ़ अपनी अलगाववादी गतिविधियां चलाते रहे | 

उक्त अपहरण कांड के बाद तो कश्मीर घाटी में एक अपहरण और बदले में आतंकीयों की रिहाई का व्यापार ही शुरु हो गया...
21 जून 1991 से 16 मई 1996 के कांग्रेस शासनकाल में प्रधानमंत्री पी व्ही नरसिम्हाराव और गृह मंत्री शंकर राव चव्हाण ने तो रिकॉर्ड तोड़ आतंकीयों को छोड़ा... 

दूसरा प्रकरण :- जुलाई 1991 में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के एक्सिक्यूटिव डायरेक्टर दोरईस्वामी के अपहरण का सामने आया आया...जिन्हे छुड़ाने के लिये कश्मीर युनिवर्सिटी के कुलपति एच एल खेड़ा की हत्या के आरोपी जावेद अहमद शल्ला सहित कई आतंकी छोड़े गए... 

तीसरा प्रकरण:- कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज़ (जो उस समय नेशनल कांफ्रेंस के सांसद थे) की बेटी नाहिदा सोज़ का सामने आया...जिसे अगस्त 1991 में बंधक बनाकर पाकिस्तानी आतंकी मुश्ताक अहमद सहित कई आतंकी जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने छुड़ा लिये थे... 

चौथे प्रकरण में जनवरी 1992 में कांग्रेस नेता तात्कालीन संसदीय कार्य मंत्री गुलाम नवी आजाद के साले तसद्दुक देव के अपहरण का था...जिसकी रिहाई के लिये आतंकी संगठन अल-उमर-मुजाहिदीन ने अपने कई आतंकी छुड़वा लिये... 

पांचवे प्रकरण में जम्मू कश्मीर के तात्कालीन मंत्री जी एम मीर के बेटे मीर नसर उल्लाह को छुड़ाने के लिये कथित तौर पर 7 आतंकी (अपुष्ट सूत्र/ न्यूज़ पोर्टल) रिहा किये गए... 

इसी तरह 1992 में कश्मीरी नेता गुलाम रसूल के दामाद डॉ मुस्तफा असलम कि रिहाई के लिये भी कथित तौर पर 7 आतंकी (अपुष्ट सूत्र/ न्यूज़ पोर्टल) रिहा किये गए... 

वर्ष 1992 में ही कई और अपहरण हुए जिनमें बंधक सुरक्षित वापस लाए गए...परंतु तात्कालीन सरकार ने उनसे सौदेबाज़ी का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया... 

:-कश्मीर के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी शेख गुलाम रसूल के बेटे फयाद अहमद...
:- ऑल इंडिया रेडियो के असिस्टेंट स्टेशन डायरेक्टर हसन जिया...
:- मार्च 1992 में पूर्व एम एल सी हबीब उल्लाह बट को आतंकी संगठन अल्लाह टाइगर ने अपहरण के एक माह बाद छोड़ा...
:- जून 1992 में जम्मू कश्मीर बैंक के चेयरमेन एम एस कुरैशी का अपहरण किया जिन्हे बाद में रिहा कर दिया...
:- जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने अगस्त 1992 में इलाहबाद बैंक के मैनेजर हंसराज सिंह को अगवा किया, और 24 दिन बाद उनकी रिहाई हुई... 

ये सारे प्रकरण ऐसे हैं जिनमें सरकार ने आतंकी संगठनों से सौदे की जानकारी सार्वजनिक नहीं की... 

रुकिये...अभी चिट्ठा पूरा नहीं हुआ है...
इतना सब करने के बाद भी कांग्रेस का मन नहीं भरा...तो कांग्रेस ने अपने इतिहास का सबसे घिनौना कृत्य किया... 

28 मई 2010 के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री शिवराज पाटिल कार्यकाल में एक ऐसे आतंकी को बिना किसी दबाव और बिना किसी शर्त छोड़ा जिसने एक झटके में हमारे सुरक्षा बलों के 7 जवानों और एक नागरिक की बेरहमी से हत्या कर दी...

28 मई 2010 को देश की जम्मू, श्रीनगर, आगरा, वाराणसी, नैनी (उत्तर प्रदेश), और तिहाड़ जेल से शाहिद लतीफ के साथ 25 और आतंकी वाघा बॉर्डर से पाकिस्तान भेजे...और कार्यवाही के लिये बहाना यह बनाया कि पाकिस्तान से संबंध सुधारने की पहल की गई है...

और इस संबंध सुधार प्रक्रिया में पाकिस्तान ने हमारे कितने सैनिक या नागरिक छोड़े आप अनुमान लगा सकते हैं?
0...हां एक भी भारतीय नागरिक को पाकिस्तान ने उस समय रिहा नहीं किया... 

28 मई 2010 को छोड़े गए शाहिद लतीफ (जो कि मसूद अजहर का बेहद करीबी है) ने ही पठानकोट एयरबेस पर हमले की साजिश रची और उसे अंजाम दिया... 

इन अपहरणों के इतिहास का जिक्र हजरत बल दरगाह काण्ड के बिना अधूरा है | 15 अक्टूबर 1993 को 18 आतंकी श्रीनगर की हजरत बल दरगाह पर कब्जा जमाकर बैठ गए और 80 लोगों को बंधक बना लिया | 

सशस्त्र बल के 1700 जवानों ने दरगाह को घेर लिया और लगातार 32 दिन तक समझौता वार्ता चलती रही | इस दौरान लगातार दरगाह में बिरयानी व लजीज खाना इन आतंकियों को भेजा जाता रहा | आतंकियों के होंसले कितने बुलंद थे, इसका प्रमाण यह है कि स्वीडिश फोटोग्राफर गर्ट होलमर्ट्ज हजरतबल पहुंचे तो आतंकियों ने दरगाह के प्रवेश द्वार पर बेखौफ होकर तस्वीरें खिंचवाईं। 

अंत में उन सबको सुरक्षित निकलने दिया गया और समझौता क्या हुआ, यह अज्ञात है | यह पढकर कितना शर्मनाक लगता है कि उनमें से एक आतंकी ने 2013 में दैनिक भास्कर को इंटरव्यू दिया – 

32 दिनों तक हम हजरतबल में थे। मैं ऑपरेशन बालाकोट आतंकी संगठन के लिए काम करता था। मेरा कोड नेम अली था। 17 और मुजाहिद मेरे साथ दरगाह में थे। हमारे लोग बाहरी चबूतरे और मीनार पर चौकीदारी करते थे। 

गुरुवार का दिन था। रात साढ़े दस बजे सुरक्षाबलों ने दरगाह को घेर लिया था। हमारे पास बहुत कम बंदूकें थीं। सेना का मुकाबला करने लायक नहीं थीं। हम फोन के जरिए सेना को धोखा देते रहे। कहते- एक साल तक मुकाबले के लायक हथियार है हमारे पास। 

हमने कहा, सेना ने अगर कदम अंदर रखा तो फायरिंग करेंगे। आईईडी बिछाने का नाटक भी किया। दान पेटी को ढंक कर ऐसा रखा जैसे आईईडी लगाई हो। तीन बंदूकें मीनार पर रखी थी। बाहर 1700 फौजी थे। हमने शर्त रखी पहले दो पाकिस्तानियों को सरहद पार छोड़ के आओ तब बाहर निकलेंगेे। सेना जुबैर और शाहिद को सरहद पार छोड़कर आई। उड़ी के रास्ते। इसके बाद 6-7 दिनों तक नागरिकों को बारी-बारी से छोड़ते रहे। हम आखिर में निकले और घर गए। हमने कुछ टूटे हथियार सरेंडर किए। अधिकतर वहीं छिपा दिए। उन्हें बाद में आकर ले गए। 

ख़ास बात यह कि यह व्यक्ति जहांगीर अहमद बट आराम से श्रीनगर में कारपोरेट कारोबारी बनकर ऐश की जिन्दगी गुजारता रहा | 

कश्मीर के तत्कालीन डिवीजनल कमिश्नर वजाहत हबीबुल्लाह ने ने दैनिक भास्कर को बताया – 

सरकार ने आतंकियों से बात करने की जिम्मेदारी मुझे दी थी। सरकार को डर था कि अगर आतंकियों ने दरगाह या यहां रखे हजरत मोहम्मद की दाढ़ी के पवित्र बाल को नुकसान पहुंचाया तो दंगे हो सकते हैं। 1963 में ऐसा हो भी चुका था। पवित्र अवशेष के गायब होने की अफवाह से हुए दंगों में 32 लोग मारे गए थे। प्रधानमंत्री नरसिंह राव के मन में 1984 के स्वर्ण मंदिर और 1992 के बाबरी मस्जिद हादसे की वजह से ज्यादा डर बैठा था। चार राज्यों में चुनाव होने वाले थे। इसीलिए मुझे साफ कहा गया कि कुछ भी करो लेकिन दरगाह को नुकसान न हो। 23 अक्टूबर से 2 नवंबर 1993 तक रोज दरगाह जाता। आतंकियों से मुलाकात करने। एक कांस्टेबल ने बताया था कि दरगाह में 40 हथियारबंद आतंकी हैं। वह आतंकियों से मिला हुआ था। जानबूझकर आतंकियों की संख्या अधिक बताई। ताकि सेना चढ़ाई करे और दरगाह को नुकसान हो। आईबी और मिलिट्री इंटेलिजेंस के बीच तालमेल नहीं था। आईबी ने उनसे बात करने के लिए दरगाह के भीतर टेलीफोन चालू रखा। लेकिन आतंकी इससे सीमापार बैठे आकाओं से बात करते रहे। देश-विदेश के मीडिया से भी। पर इसकी जानकारी मिलिट्री इंटेलिजेंस को नहीं थी। 

दैनिक भास्कर की लिंक – 


अब पाठक महोदय विचार करें कि देश की दिशा क्या होना चाहिए ? 
क्या आतंकवादियों को बिरयानी खिलाकर आतंकवाद से निबटने की तत्कालीन नीति उचित थी ? 
या वर्तमान सरकार की कुशल व्यूह रचना ठीक है जिसमें आतंक की जड़ पर प्रहार किया जा रहा है ? 
देश सुरक्षित तो हम सुरक्षित !
2019 का चुनाव व्यक्तियों का चुनाव नहीं - बल्कि नीतियों का चुनाव है !

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