आदत के मुताबिक दिग्विजय ने किया भोपाल के इतिहास और डॉ. शंकर दयाल शर्मा जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अपमान ?

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आज के समाचार पत्रों में दिग्विजय सिंह का एक बयान सुर्ख़ियों में है -  " आपको मालूम होना चाहिए कि विभाजन के समय जब लोग भोपाल छोड़कर ...

आज के समाचार पत्रों में दिग्विजय सिंह का एक बयान सुर्ख़ियों में है - 

" आपको मालूम होना चाहिए कि विभाजन के समय जब लोग भोपाल छोड़कर जा रहे थे तब भोपाल नवाब ने सबको रोका था " | 

साफ़ है कि या तो दिग्विजय सिंह को विभाजन के समय भोपाल का इतिहास मालूम नहीं है या फिर केवल मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की दृष्टी से वे इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने पर आमादा है | क्योंकि  सचाई तो यह है कि भारत की आजादी के बाद भोपाल का नबाब तो हैदराबाद के नबाब के साथ मिलकर पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच एक गलियारा बनाना चाहता था | इसी कारण विभाजन के पश्चात् भी भोपाल से मुस्लिमों का पलायन न के बराबर हुआ | जिन्ना ने तो बाकायदा भोपाल को पाकिस्तान में विलय करने का न्योता भी दिया | यही नहीं जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तान में सेक्रेटरी जनरल का पद भी देने की बात कही | 

सारे देश में 15 अगस्त को भारतीय तिरंगा फहराया गया, पूरा देश स्वतंत्र हो गया, लेकिन भोपाल आजाद हुआ ३० जून 1949 को | 

भारत की आजादी और भोपाल 

माउंटबेटन की भारत को आजादी देने एवं पाकिस्तान बनाने की घोषणा के बाद सबसे अहम् सवाल जो उपजे वह यह थे कि कितने देश आजाद होने जा रहे है २ या ५६५ ? दरअसल उस वक़्त भारत में सभी छोटे बड़े मिलकर ५६५ रजवाड़े थे ! इन रियासतों पर अंग्रेजों का परोक्ष शासन था ! इन राजाओं की अपनी स्वयं की फौज, स्वयं की पुलिस, स्वयं का क़ानून एवं स्वयं की करेंसी थी ! इन्होने ब्रिटेन की गुलामी स्वीकार कर ली थी ! जिसे पैरामाउंटसी कहते थे ! अब पैरामाउंटसी ख़त्म हो रही थी ! अब रियासतें स्वतंत्र थी ! इससे भारत को आजादी तो मिल रही थी पर देश बिखर रहा था ! इस बात का फायदा मुहम्मद अली जिन्ना उठाना चाहता था ! जिन्ना रियासतों को बगावत करने के लिए उकसा रहा था, जिससे हिन्दुस्तान हमेशा कमजोर राष्ट्र रहे ! 

इसी दौरान भारत में खून खराबे का दौर उग्र रूप पकड़ चुका था | कोलकता में ही 5000 लोगों का क़त्ल कर दिया गया ! यह वारदातें तब से ही शुरू हो गयी जब भारत को आजादी मिली ही नहीं थी ! बड़े राजाओं को भारत की लोकशाही से डर लग रहा था ! वे अपने राज्य को आजाद देश बनाना चाह रहे थे ! राजाओं की सत्ता को भारत में शामिल करने हेतु इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सटेंशन (रियासतों के विलीनीकरण) का कार्य शुरू हुआ ! सभी राजा महाराजाओं को सबसे पहले इन्ही कागजातों पर हस्ताक्षर करने थे !

11 जून १९४७ को त्रावनकोर नामक राज्य ने स्वयं को आजाद संप्रभुता से संपन्न देश बनाने की घोषणा कर दी ! 12 जून को हेदराबाद ने विरोधी सुर उठाये और वहां के निजाम ने 15 अगस्त के बाद स्वयं को आजाद होने की घोषणा कर डाली ! हैदराबाद के अलग होने का मतलब था “सम्पूर्ण दक्षिण भारत का सम्बन्ध उत्तर भारत से टूट जाना “ !

किन्तु
धीरे धीरे सरदार बल्लभ भाई पटेल ने सभी सियासतों को भारत में विलय के लिए तैयार कर लिया सिवाय जम्मू काश्मीर, जूनागढ़, भोपाल और हैदराबाद के | यह वह रियासतें थी जो आजादी के महज ३ दिन पूर्व तक भारत का हिस्सा नहीं थी | फरवरी १९४८ में भारत सरकार के द्वारा जूनागढ़ में रायशुमारी भी की गयी ! इस रायशुमारी में हिन्दुस्तान के पक्ष में एक लाख उन्नीस हजार वोट आये जबकि पाकिस्तान के पक्ष में सिर्फ इक्यानवे | अतः जूनागढ़ भारत का हिस्सा बन गया |


जूनागढ़ के भारत में शामिल हो जाने से ही भारत की मुश्किलें समाप्त नहीं हुई थी ! भारत के बीचों बीच एक रियासत थी भोपाल ! भोपाल के नवाब ने तय किया कि या तो वो आजाद रहेंगे या पाकिस्तान में शामिल हो जायेंगे !

भोपाल के भारत में विलय को लेकर दबाब निर्मित करने के लिए हिंदू नवयुवकों ने प्रजा मंडल के नाम से एक संगठन बनाया, जिसमें सर्व श्री चतुरनारायन मालवीय, अक्षय कुमार जैन, भाई रतन कुमार जैन, ठाकुर माधो सिंह, मास्टर लाल सिंह, लक्ष्मी नारायण सिंघल, महीपाल पथिक, प. उद्धव दास मेहता आदि प्रमुख थे ! 

३० जनवरी १९४८ को महात्मा गांधी की ह्त्या के बाद नबाब को हिंदुओं को कुचलने का बहाना मिल गया ! घरों की अपमानजनक तलाशी तथा थोड़ा भी संदेह होने पर सामान जब्ती आदि कृत्य किये गए ! भोपाल शहर में ही लगभग सौ लोग गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस दिए गए ! सर्व श्री उद्धवदास मेहता, बाबा साहब नातू, दिगंबर राव तिजारे, नेमीचंद कक्कड, शरद कुमार बेनर्जी, माणक चंद चौबे, भैयाजी कस्तूरे, मदनलाल शर्मा, ऋषभ चंद मुणोत, शिवचरण लाल भैय्यन, नानूराम दादा, जुगल किशोर भार्गव, बिट्ठल दास शर्मा “गुरू” सीहोर, नरेंद्र चौरसिया, फूलचन्द्र जयपुरिया, मंगली प्रसाद चौरसिया, प्रभाकर बडनेरकर, पांडुरंग वैद्य, सुभाष रेखडे, गोपीकिशन गुप्ता, बाबूलाल बंसल आदि अनेकों कार्यकर्ता वन्दी बनाए गए ! 

गिरफ्तार लोगों के परिवार जनों को अनेकों प्रकार से प्रताडित किया गया ! महिलाओं को पूछताछ के नाम पर पुलिस जुमेराती बाजार लेकर आई तथा बहां उन पर ठन्डे पानी की तेज धार आधे घंटे तक डाली गई ! १० माह जेल जीवन की यातना सहन करने के बाद नवंबर १९४८ में इन कार्यकर्ताओं की रिहाई संभव हुई ! किन्तु कुछ समय बाद ही भोपाल के भारत में विलय की मांग को लेकर आंदोलन और तीव्र हुआ ! ९ दिसंबर १९४८ को सत्याग्रह प्रारंभ हुआ | संघ स्वयंसेवक तथा कांग्रेस के सर्व श्री मास्टर लालसिंह ठाकुर, रामकिशन जी, डा.शंकर दयाल शर्मा, रामचरण राय वकील, ठाकुर माधव सिंह, के.एन. प्रधान, अक्षय कुमार जैन, जमुना प्रसाद मुद्गल, कपूर भाई आदि साथ साथ गिरफ्तार हुए !

अंततः १३ अप्रेल  १९४९ को सरदार वल्लभ भाई पटेल की चेतावनी के सम्मुख घुटने टेक कर नबाब हमीदुल्ला खां ने भारत महासंघ के विलय पत्र पर हस्ताक्षर किये ! उनके साथ गुजरात में जूनागढ़ तथा हैदरावाद के निजाम ने भी अंतिम रूप से अपनी अपनी रियासतों के भारत में विलय को स्वीकृति दी ! वस्तुतः जन दबाब ही उन्हें इस हेतु वाध्य कर सका, जिसे निर्मित करने में संघ स्वयंसेवकों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा ! अप्रैल के दूसरे सप्ताह में प्रजामंडल के बंदी कार्यकर्ता भी मुक्त हुए ! भोपाल के देशभक्त बहुसंख्यक हिन्दुओं के जबरदस्त आन्दोलन ने भोपाल नवाब को अंततः विवश कर दिया और उसने सरदार पटेल को पत्र लिखा  –
“पटेल जी, में इस बात पर अब ज्यादा पर्दा नहीं डाले रखना चाहता हूँ कि जब विवाद चल रहा था तब अपनी रियासत को आजाद बनाए रखने के लिए मैंने तमाम कोशिशें की ! अब मैंने हार को मान लिया है और में आपको यकीन दिलाता हूँ कि में पहले जितना कट्टर दुश्मन था अब उतना ही करीबी दोस्त रहूँगा !” 
सरदार पटेल ने भी इस पत्र का जवाब देते हुए लिखा –
“प्रिय हमीदुल्लाह, में ऐसा हरगिज नहीं मानता कि आपके भारतीय साम्राज्य के साथ शामिल होने के निर्णय से आपकी हार हुई है और हमारी जीत ! आखिरकार विजय तो सत्य और उचित की हुई है और इसके लिए हमने अपनी अपनी भूमिका निर्वाहन की है !” आपका बल्लभ भाई पटेल 

और इस प्रकार स्थानीय लोगों के लम्बे संघर्ष और सरदार बल्लभ भाई पटेल के सख्त तेवरों के बाद आखिर 30 जून १९४९ को भोपाल रियासत का भारत में विलय संभव हो पाया था | 

और दिग्विजय सिंह उस भोपाल के नबाब का महिमा मंडन कर रहे हैं, धिक्कार है | नबाब का महिमा मंडन भोपाल की आजादी के लिए जूझने वाले डॉ. शंकर दयाल शर्मा व के. एन. प्रधान जैसे स्वतंत्रता सेनानी कांग्रेसियों का भी अपमान है |

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क्रांतिदूत: आदत के मुताबिक दिग्विजय ने किया भोपाल के इतिहास और डॉ. शंकर दयाल शर्मा जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अपमान ?
आदत के मुताबिक दिग्विजय ने किया भोपाल के इतिहास और डॉ. शंकर दयाल शर्मा जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अपमान ?
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