लोकसभा चुनाव अर्थात छद्म धर्म निरपेक्षता के नाम पर हिंदूद्रोही मानसिकता को सबक सिखाने का अवसर !

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आजादी के बाद से ही भारत के तथाकथित सेक्यूलर नेता हिंदुत्व पर लगातार और अकारण प्रहार करते रहे हैं |  1946 में वन्दे मातरम को राष्ट्र...



आजादी के बाद से ही भारत के तथाकथित सेक्यूलर नेता हिंदुत्व पर लगातार और अकारण प्रहार करते रहे हैं | 
1946 में वन्दे मातरम को राष्ट्रगान बनाने का विरोध, 
1949 से लगातार अयोध्या में राम मंदिर बनाने का विरोध (जो अभी तक नहीं बन पाया है), 
1951 में डॉ. अंबेडकर के कॉमन सिविल कोड का विरोध, 
1975 में समुदाय विशेष के विरोध के कारण नसबंदी अभियान को केवल हिन्दुओं पर थोपना, 
1987 में शाहबानों केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियाँ उड़ाते हुए अलग कानून बनाना, 
2004 में मुसलमानों को आंध्रप्रदेश में आरक्षण का वादा, 
2006 में यह बयान कि देश के संसाधनों पर पहला हक़ मुसलमानों का है, 
2007 में मक्का ब्लास्ट के वास्तविक आतंकियों को छोड़कर भगवा आतंकवाद जैसे घिनौने और झूठे शब्द का ईजाद, 
2010 में अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से यह कहना कि मुस्लिम आतंकवादियों से बड़ा खतरा देश के हिन्दू है, 
2016 में उत्तराखंड में प्रत्येक शुक्रवार 90 मिनट के लिए मुसलमानों को अतिरिक्त अवकाश देने का निर्णय, 
2016 में बेशर्मी की सभी हदें पार करते हुए हिन्दुओं के आराध्य मर्यादापुरुषोत्त्तम श्री राम की तुलना तीन तलाक और हलाला से करना .....
कुछ ऐसे उदाहरण है जिसके माध्यम से इन कथित सेक्यूलर नेताओं का हिंदुत्व विरोधी चेहरा समय समय पर सामने आता रहा है | 

लेकिन कितना बड़ा मजाक है कि पूरे 5 साल तक हिन्दुओं की आस्थाओं को तार तार करते, साफतौर पर खुलेआम बशर्मों की तरह यह कहते कि "हिंदुत्व में उनका विश्वास नहीं है", चुनाव आते ही ये ही नेता हिन्दू वोटों के लिए मंदिर मंदिर भटकते है | यह वही नेता है जो हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्री राम के अस्तित्व को कभी नकारते थे, रामसेतु के साथ महाभारत एवं रामायण को काल्पनिक बताते थे, एक समुदाय विशेष की "सीक्रेट मीटिंग" कर अपनी पार्टी को समुदाय विशेष की पार्टी कहते थे | 

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वर्ष 2014 में हिन्दुओं ने भी लोकसभा चुनाव एवं उसके बाद उप्र के विधानसभा चुनाव में एकजुट होकर मतदान करना प्रारम्भ किया | यह लगातार होने वाले अपमान और उपेक्षा की प्रतिक्रिया स्वरुप ही हुआ | अपने विरुद्ध रचे जा रहे षड्यंत्रों को जान कर, हिन्दुओं ने एकजुट होकर देश को तोड़ने वाली विचारधारा के विरुद्ध जो प्रहार किया वो आज इतिहास बन चुका है | हिन्दुओं की एकजुटता से भयभीत वह नेता जो पानी पी पी कर हिंदुत्व को कोसते थे, हिन्दू आतंकवाद जैसे शब्दों का अविष्कार करते थे, कुछ समय पूर्व खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण साबित कर मंदिर मंदिर ढोक लगाने को मजबूर हुए | किन्तु जैसे ही इन गिरगिटिया नेताओं को लगा कि हिन्दू उनके झांसे में नहीं आ रहे हैं, उन्होंने पुनः चोला बदल लिया और उनका वास्तविक हिंदुत्व विरोधी चेहरा पुनः जनता के सामने आने लगा, क्योंकि छद्म वेश ज्यादा समय तक टिक नहीं सकता, भेड़ की खाल में भेड़िया पहचान ही लिया जाता है | 

भोपाल में बीते शुक्रवार को कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह के समर्थन में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने मंच से ही रामायण और महाभारत का उदाहरण देते हुए हिन्दुओं को हिंसक कह डाला | येचुरी ने मंच से कहा कि "रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों से सिद्ध होता है कि हिन्दू भी हिंसक हो सकते है"| येचुरी के इस बयान से भले ही कांग्रेस और दिग्विजय सिंह यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे है कि वे कांग्रेस के नेता नहीं है | तो भी कांग्रेस से हर हिन्दू पूछना चाहता है कि येचुरी उनके मंच पर क्या कर रहे थे ? जब वे कोंग्रेसी मंच से यह सब कुछ बोल रहे थे तब उन्हें किसी ने रोका क्यों नहीं ? क्यों खुद दिग्विजय सिंह मंच पर मूकदर्शक बन कर बैठे रहे ? क्या उनकी चुप्पी को उनकी मौन सहमति नहीं माना जाना चाहिए ? क्या कांग्रेस और उसके नेताओं की नज़रों में हिन्दुओं की कोई कीमत नहीं है ? क्या उनकी नज़रों में सिर्फ और सिर्फ सत्ता की ही कीमत है, जिसके लिए यह कुछ भी कहेंगे, कुछ भी करेंगे ?

येचुरी जैसे नास्तिक जानते ही क्या हैं रामायण और महाभारत के विषय में ? क्या दुष्ट और दानवों का संहार करना कम्युनिष्ट मानसिकता के लोगों के लिए हिंसा है ? क्या जिन कौरवों ने भरी सभा में एक अबला नारी को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया, उनको वैसे ही बचाया जाना चाहिए था जैसे मानवाधिकार के नाम पर संसद पर आतंकी हमले के मास्टर माइंड अफजल गुरु को फांसी की सजा से बचाने के लिए आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खुलवाया था ? जिस रावण ने एक अबला नारी सीता का अपहरण कर हजारों निरपराध साधु संतों का रक्त बहाया, क्या उसको ठीक उसी तरह से गले लगा लेना चाहिए था, जिस तरह से आपकी विचारधारा से प्रभावित नेता आतंकियों की फसल उगाने वालों को गले लगाते है ? 

क्या कहना चाहते हो मिस्टर येचुरी ? क्या यह कि पूरे विश्व में निर्दोष लोगों का रक्त बहा रहे आतंकवादी मासूम है | शर्म आनी चाहिए ऐसे नेताओं को जो आतंकवादियों और नक्सलियों को क्रांतिकारी बताते है, आतंकवादियों को 'ओसामा जी और हाफिज साहब' जैसे सम्मानित शब्दों से अलंकृत करते है | अब समय है जनता तय करे कि भारत का भविष्य किन हाथों में सौंपना है | अब समय आ गया है जब जाति और क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर, न्याय और सत्य का पक्ष लेते हुए मतदान किया जाए | अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमारी यही गलती ऐसे लोगों की हिम्मत बढाती है और वे हमारे ही मान बिंदुओं पर प्रहार करते है | यह तब तक होता रहेगा जब तक हम अपने मत की कीमत नहीं समझेंगे | याद रखिये कि आज हम अपने मत के बलबूते पर देश को विभाजित करने वाली शक्तियों को पराजित कर सकते है | 

लोकसभा चुनाव के चार चरण पूर्ण हो चुके है, तीन चरण ही शेष है | हम अपने मत का उचित उपयोग कर आने वाले भारत का निर्माण करने जा रहे है | यह हमें तय करना है कि हमें भारत का भविष्य किन लोगों के हाथों में सौपना है | उनके जो हिन्दुओं को हिंसक और आतंकवादी सिद्ध करने पर तुले हुए है? जो अमेरिका में जाकर कहते है कि पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवादी संगठन जैश ए मोहम्मद से कहीं ज्यादा हिन्दू आतंकवाद खतरनाक है ? जो देशद्रोह के कानून को समाप्त कर भारत के टुकड़े टुकड़े करने के सपने दखने वाली गैंग को अभय देना चाहते है ? जिन्होंने राम भक्तों पर गोलियां चलवाई, उ.प्र. में दंगे कराकर हिन्दुओं को अपने घरों से पलायन के लिए मजबूर किया ? जो जाती, वर्ग, भाषा, क्षेत्र के नाम पर बांटकर हिन्दुओं को कमजोर करना चाहते है ? या फिर ..........

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क्रांतिदूत: लोकसभा चुनाव अर्थात छद्म धर्म निरपेक्षता के नाम पर हिंदूद्रोही मानसिकता को सबक सिखाने का अवसर !
लोकसभा चुनाव अर्थात छद्म धर्म निरपेक्षता के नाम पर हिंदूद्रोही मानसिकता को सबक सिखाने का अवसर !
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