स्वाधीन भारत का पहला आतंकी हिन्दू को बताने वालो इतिहास पढो, स्वामी श्रद्धानंद की हत्या करने वाला कौन था ? - संजय तिवारी

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भारत वर्ष अब स्वाधीन हो रहा है। अभी तक की सांस्कृतिक पराधीनता से कुछ मुक्त होता से दिख रहा है। वर्ष 2014 में संसद की देहरी को दंडवत ...



भारत वर्ष अब स्वाधीन हो रहा है। अभी तक की सांस्कृतिक पराधीनता से कुछ मुक्त होता से दिख रहा है। वर्ष 2014 में संसद की देहरी को दंडवत करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जब मैंने सम्राट लिखा था तब बहुत आलोचना हुई थी । आज मैं दावे के साथ के साथ चक्रवर्ती सम्राट लिख रहा हूँ। जिसे जितनी आलोचना करनी है वह करे। अब उस आलोचना का कोई अर्थ नही। जो सूरज उगता हुआ दिख रहा है वह केवल भारत मे ही नही चमकने वाला। दुनिया उसकी आहट महसूस कर रही है। भारत के भीतर कुछ पराजित युद्ध सैनिक रह गए हैं जिनको नरेंद्र मोदी का निजी जनाधार भी नही दिख रहा। उन्हें नही दिख रहा कि किस प्रकार से नई पीढ़ी अपने सम्राट को यशवान बनते देखना चाहती है। उन्हें नही दिख रहा कि इस नरेंद्र मोदी की नई सेना में कोई जाति या मजहब नही है। इस आंधी ने जातियों, पंथों, संप्रदायों की हर सीमा तोड़ दी है। यह नई जमात नए सनातन भारत की मजबूती के लिए अपनी ऊर्जा दे रही है। इसमें कोई दिखावा नही है। जिसे भरोसा नही है वह हर शहर में चौराहों पर सुबह सुबह लगने वाले जांगर चौक यानी दिहाड़ी कमाने के लिए जुटने वाली जमात से बात कर के देख ले। किसी सवाल का जवाब उनकी जबान में अब मोदी ही हैं। अबकी मोदिये के हवा बा , यही जवाब है उनका। इसमें सभी जातियों के जांगर बेचवा लोग हैं। जिन्हें समीकरण और गुना भाग नही आता। सीधे बोलते है। मोदी अइहें। 

यह पूरे समाज के सात से आठ प्रतिशत की ऐसी मतदाताओं की जमात है जिसमे जाति या वर्ग भेद नही है। जिनमे छात्र भी है, पहली बार वोट देने जा रहे किशोर भी हैं और नितांत निचले पायदान पर खड़े मजदूर भी। इनकी गणना कोई सर्वेयर नही करता। विश्वास न हो तो उन मुस्लिम किशोरियों से कभी बात कीजिये जो खुद के पैरों पर खड़ा होना चाहती है। जो फतवो की जंजीर तोडना चाहती है। जो अपने कुनबो मे लगातार उत्पीड़न और यातनाये देख रही हैं। मतदान केंद्र उनके लिए आजादी के प्लेटफॉर्म बन चुके है। 

यह 6 से 8 फीसदी की जमात बहुत बड़ी निर्णायक भूमिका निभा रही है । इस बार चुनाव में पंडितो की सारी गणना इसी जमात ने फैल किया है। अभी हो सकता है किसी को इस पर भरोसा न हो लेकिन 23 मई को सब साफ हो जाएगा। खासकर खुद को समाज का सबसे बड़ा आईना बताने वाले हमारे पत्रकार मित्रो को तभी भरोसा होगा जो अभी तक मोदी की सरकार बहुत जोड़ तोड़ से बन जाने की भविष्यवाणियां बांच रहे थे। 

वास्तव में इस चक्रवर्ती सम्राट की कार्यशैली को शायद अभी तक कुछ लोग या तो समझ नही सके या समझना नही चाहते। नरेंद्र मोदी को इस बार 2014 से बड़ा जनादेश चाहिए। नए भारत के निर्माण के लिए यह बहुत जरूरी है। और उनको देश की नई जमात ऐसा ही प्रचंड बहुमत देने जा रही है। सनातन भारत के निर्माण की यही बुनियाद बनेगी। कोई कमल हासन नही तय करेगा कि पहला आतंकवादी कौन है। तब ऐसे कमल हसानो को अपने वास्तविक इतिहास को पढ़ने और जान लेने की मजबूरी भी होगी। तब किसी टाइम मैगजीन को the great divider लिखने की आवश्यकता नही पड़ेगी। यह बैखलाई हुई जमात देखिएगा कैसे अपनी बिलो में घुसती है। जिनमे से बहुत तो ऐसे भी होंगे जो इसी सम्राट के दरबारी बन पाने का जुगाड़ तलाशेंगे। 

वैसे कमल हासन को शायद ठीक से पढ़ाना पड़ेगा। उसे यह भी बताना पड़ेगा कि तुम जिस जमात से आते ही उस पैगम्बर के परिवार की सुरक्षा एक सनातन सम्राट ने ही दी थी जिसके लिए तुम्हारे मोहम्मद बिन कासिम सरीखे आतंवादी ने उस राजा दाहिर का कत्ल किया और साथ मे तुम्हारे हुजूर के परिवार का भी। तुम्हारी जमात की नीचता की यह पराकाष्ठा इतिहास में दर्ज है। आगे की भी सुनो।

देश का प्रथम आतंकवादी अब्दुल रशीद था । यह भी इतिहास में दर्ज है । पहले पढ़ो ,फिर आगे की बात करो।स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती को कौन नही जानता है इनसे बढ़ सेक्युलर समाजसेवी राष्ट्रभक्त ,हिन्दुत्वसेवक भारत की राजनीति में बिरले ही मिलेंगे ।गांधी की हत्या पर चर्चा तो होती है पर इस महापुरुष पर क्यों नही ?

गोडसे को प्रेरणा यही से मिली थी ।सारांश है ध्यान से पढ़े व मनन करे हर क्रिया की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। 23 दिसंबर, 1926 को अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम ने धोखे से गोली चलाकर स्वामी जी की हत्या कर दी. 

यह युवक स्वामी जी से मिलकर इस्लाम पर चर्चा करने के लिए एक आगंतुक के रूप में दिल्ली स्थित उनकी हत्या के दो दिन बाद अर्थात 25 दिसम्बर, 1926 को गोहाटी में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में जारी शोक प्रस्ताव में जो कुछ कहा वह स्तब्ध करने वाला था । गांधी के शोक प्रस्ताव के उद्बोधन का एक उद्धरण इस प्रकार है

“मैंने अब्दुल रशीद को भाई कहा और मैं इसे दोहराता हूँ. मैं यहाँ तक कि उसे स्वामी जी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता हूँ. वास्तव में दोषी वे लोग हैं जिन्होंने एक दूसरे के विरुद्ध घृणा की भावना पैदा किया. इसलिए यह अवसर दुख प्रकट करने या आँसू बहाने का नहीं है.“

यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वेछा एवं सहमति के पश्चात पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मलखान राजपूतों को शुद्धि कार्यक्रम के माध्यम से हिन्दू धर्म में वापसी कराई. शासन की तरफ से कोई रोक नहीं लगाई गई थी जबकि ब्रिटिश काल था. अब्दुल रशीद को भाई मानते हुए उसे निर्दोष कहा.

इतना ही नहीं गांधी ने अपने भाषण में कहा, … मैं इसलिए स्वामी जी की मृत्यु पर शोक नहीं मना सकता.… हमें एक आदमी के अपराध के कारण पूरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए।

मैं अब्दुल रशीद की ओर से वकालत करने की इच्छा रखता हूँ.“ उन्होंने आगे कहा कि “समाज सुधारक को तो ऐसी कीमत चुकानी ही पढ़ती है.स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या में कुछ भी अनुपयुक्त नहीं है. 

अब्दुल रशीद के धार्मिक उन्माद को दोषी न मानते हुये गांधी ने कहा कि “…ये हम पढ़े, अध-पढ़े लोग हैं जिन्होंने अब्दुल रशीद को उन्मादी बनाया. स्वामी जी की हत्या के पश्चात हमें आशा है कि उनका खून हमारे दोष को धो सकेगा, हृदय को निर्मल करेगा और मानव परिवार के इन दो शक्तिशाली विभाजन को मजबूत कर सकेगा.“ (यंग इण्डिया, दिसम्बर 30, 1926)।

बात यही खत्म नही होती। जिस प्रकार से भारत वर्ष को सताया और लूट गया है अब उस पूरी कहानी का खुलासा भी बहुत जरूरी है। नई जमात को यह सब जान लेना बहुत आवश्यक है। खुद को पंडित बताकर भारत के भाग्य विधाता बन कर 70 वर्षो तक एक साम्राज्य चलाने वाले विधर्मी परिवार के सत्ता संस्थापक की गाथा भी सुन लो। बिपिन खुराना सावरकर लिखते है- जवाहरलाल नेहरू की ऐतिहासिक भूलों, अदूरदर्शिता और मूर्खताओं की सज़ा, जो हम आज तक भुगत रहे हैं।

1. कोको आइसलैंड - 1950 में नेहरू ने भारत का 'कोको द्वीप समूह' (Google Map location
-14.100000, 93.365000) बर्मा को गिफ्ट दे दिया। यह द्वीप समूह कोलकाता से 900 KM दूर समंदर में है। बाद में बर्मा ने यह द्वीप समूह चीन को दे दिया, जहाँ से आज चीन भारत पर नजर रखता है।

2. काबू वैली मणिपुर - नेहरू ने 13 Jan 1954 को भारत के मणिपुर प्रांत की काबू वैली मित्रता के तौर पर बर्मा को दी। काबू वैली का क्षेत्रफल लगभग 11,000 वर्ग किमी है और कहते हैं कि यह कश्मीर से भी अधिक खूबसरत है।आज बर्मा ने काबू वैली का कुछ हिस्सा चीन को दे रखा है। चीन यहां से भी भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देता है।

3. भारत - नेपाल विलय - 1952 में नेपाल के तत्कालीन राजा त्रिभुवन विक्रम शाह ने नेपाल के भारत में विलय का प्रस्ताव नेहरू के सामने रखा। लेकिन नेहरू ने ये कहकर उनकी बात टाल दी कि इस विलय से दोनों देशों को फायदे की बजाय नुकसान ज्यादा होगा। यही नहीं, इससे नेपाल का पर्यटन भी खत्म हो जाएगा। जबकि असल वजह ये थी कि नेपाल जम्मू कश्मीर की तरह विशेष अधिकार के तहत अपनी हिन्दू राष्ट्र की पहचान को बनाये रखना चाहता था, जो कि नेहरू को मंजूर नहीं था ।

4. सुरक्षा परिषद स्थायी सीट- नेहरू ने 1953 में अमेरिका की उस पेशकश को ठुकरा दिया था, जिसमें भारत को सुरक्षा परिषद ( United Nations) में स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने को कहा गया था। नेहरू ने इसकी जगह चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की सलाह दे डाली। चीन आज पाकिस्तान का हमदर्द बना हुआ है। वह पाक को बचाने के लिए भारत के कई प्रस्तावों को सुरक्षा परिषद में नामंजूर कर चुका है। वह तो भला हो नरेंद्र मोदी का जिनकी ताकत ने चीन को झुकने पर मजबूर किया है।

5. जवाहरलाल नेहरू और लेडी मांउटबेटन - लेडी माउंटबेटन की बेटी पामेला ने अपनी किताब में लिखा है कि नेहरू और लेडी माउन्टबेटन के बीच अंतरंग संबंध थे। लॉर्ड माउंटबेटन भी दोनों को अकेला छोड़ देते थे। लोग मानते हैं कि ऐसा कर लॉर्ड माउंटबेटन ने जवाहर लाल नेहरू से अनेक राजनैतिक निर्णय करवाए थे, जिनमें कश्मीर में युद्ध विराम व सयुंक्त राष्ट्र के
हस्ताक्षेप का निर्णय भी शामिल है।

6 पंचशील समझौता- नेहरू चीन से दोस्ती के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक थे। 1954 में उन्होंने चीन के साथ पंचशील समझौता किया और तिब्बत को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता दे दी। इससे हमारा आध्यात्मिक केन्द्र, स्वर्ग से सुंदर कैलाश-मानसरोवर चीन के कब्जे में चला गया 1962 में इसी चीन ने भारत पर हमला किया और चीन की सेना इसी तिब्बत से भारत की सीमा में दाखिल हुई।

7. 1962 भारत चीन युद्ध - चीनी सेना ने 1962 में भारत को हराया था। हार के कारणों को जानने के लिए भारत सरकार ने ले. जनरल हेंडरसन और कमान्डेंट ब्रिगेडियर भगत के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी।
दोनों अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में हार के लिए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया था। रिपोर्ट के अनुसार नेहरु ने धोखेबाज़ चीन पर आंख बंद कर भरोसा कर सेना का आधुनिकीकरण नहीं होने दिया । आयुध कारखाने बंद कर दिये गए, जिससे सेना के पास आधुनिक हथियारों का अभाव हो गया, सैनिक साजो-सामान का अभाव हो गया, जिसके कारण सेना की हार हुई ।चीनी सेना जब अरुणाचल प्रदेश, असम, सिक्किम तक अंदर घुस आई थी, तब भी नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते हुए भारतीय सेना को चीन के खिलाफ एक्शन लेने से रोके रखा। परिणाम स्वरूप हमारे कश्मीर का लगभग 1,40,000 वर्ग किमी भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया, इसमें कैलाश पर्वत, मानसरोवर और अन्य तीर्थ स्थान आते हैं।

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क्रांतिदूत: स्वाधीन भारत का पहला आतंकी हिन्दू को बताने वालो इतिहास पढो, स्वामी श्रद्धानंद की हत्या करने वाला कौन था ? - संजय तिवारी
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