परघर में जो घात लगाए, उसको युगों-युगों जलना है - गीतिका वेदिका

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दशहरा अर्थात विजयादशमी या आयुध-पूजा सनातन के प्रमुख त्योहारों मे से एक जो कि अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया ...



दशहरा अर्थात विजयादशमी या आयुध-पूजा सनातन के प्रमुख त्योहारों मे से एक जो कि अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। रावण दहन कितना उचित है अथवा अनुचित इसका विश्लेषण करने के पूर्व समझना होगा कि यह मनाया क्यों जाता है? 

दशहरा असत्य पर सत्य की विजय है। बुन्देलखण्ड प्रान्त में इसी दिन से 'दशरय की राम राम' आरम्भ हुई। कहना न होगा कि इस दिन रावण नहीं रहा बस राम हो गए। अर्थात बुराई पर भलाई का प्रादुर्भाव हुआ। भगवान राम ने समस्त पृथ्वीलोक पर त्राहि मचाने वाले रावण का वध किया। और कहा जाता है कि देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाने लगा। इस दिन आयुधपूजन का भी विधान है।

राम के परिप्रेक्ष्य में कहा जाए तो वनवास की अवधि में अवध नरेश दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र राम, पुत्रवधु सीता और कनिष्ठ पुत्र लक्ष्मण माता-पिता की आज्ञा से वन में निवास करने गए। पंचवटी में अपनी कुटिया बना कर तीनो कंदमूल फल और जंगल में उपलब्ध संसाधनों के सहारे जीवन व्यतीत कर रहे थे तथा वन में साधु सन्यासियों की सेवा में रहकर आतताइयों से उनकी रक्षा कर उनके यज्ञादि को सुचारू सुरक्षा दे रहे थे कि कामभावना से प्रेरित होकर दक्षिण अवस्थित लंका नरेश रावण की बहन शूर्पणखा ने माया से सुन्दरी रूप धर राम को विवाह का प्रस्ताव दिया। एक पत्नीव्रत राम ने प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया तब वह उनके छोटे भाई लक्ष्मण के पास पहुँची। उन्होंने भी अपनी पत्नी के प्रति निष्ठावान होने की बात कही तब वह क्रोध में आकर अपने वास्तविक राक्षसी रूप में आकर सीता को खाने दौड़ी तब रक्षात्मक स्वरूप में दण्ड देने के लिये लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए। वह इसी रूप में अपने भाई रावण के पास गयी अपनी व्यथा कह सुनाई तथा रावण को सीता के रूप के प्रति दिग्भ्रमित कर दिया ताकि वह अपने प्रतिशोध को पूरा कर सके। वासना में भरकर रावण ने छल से अपने मामा मारीच को स्वर्णमृग बना कर भेजा। सीता ने राम से वह मृग लाने को कहा। राम मृग के पीछे गए। मृग उन्हें दूर ले गया। राम का बाण लगते ही वह मायावी राम की आवाज़ में वन में सीता को पुकार लगाने लगा। सीता पति के कदाचित अनिष्ट की आशंका से व्यथित होकर लक्ष्मण को राम के सहयोग के लिये जाने का आदेश देने लगीं। यद्यपि लक्ष्मण को भान था कि उनके बड़े भइया किसी भी शक्ति का सामना अकेले कर सकते हैं लेकिन स्त्री की पति के अनिष्ट की आशंका किन्ही भी भान से अधिक होती है सो लक्ष्मण को जाना पड़ा। लक्ष्मण जानते थे वनाञ्चल आसुरी शक्तियों से भरा पड़ा है सो सुरक्षा हेतु उन्होंने एक शक्तिरेख खींच दी जिसे लक्ष्मणरेखा के नाम से जाना जाता है। सीता तो इसके पार आ सकती थीं किंतु कोई राक्षस अथवा मानव इसे पार नहीं कर सकता था। लक्ष्मण के जाने के बाद रावण ने सीता से साधु वेश धरकर भिक्षायाचना की। भारतवर्ष में साधुओं को ससम्मान भिक्षा देने का रिवाज है। सो सीता ने उसे भिक्षा देने के फल और जो भी कुटी में था, अर्पित किया। वह सीता को स्पर्श नहीं कर सकता था। अस्तु उसने रेखा से बन्धी भिक्षा न लेने के नियम का बहाना बनाया। साधु द्वार से बिना भिक्षा लिए न जाये इस कारण सीता को बाहर आना पड़ा और रावण सीता को हर के लंका ले गया। तत्पश्चात राम ने वन के जीव तथा वनवासियों के सहयोग से सेना बनाकर लङका पर चढ़ाई कर दी। अपनी पत्नी को राक्षस के चंगुल से मुक्त करा कर भाई सहित अपनी राजधानी को गमन किया और युगों तक मर्यादापुरुषोत्तम राम के रूप में आदर्श राज्य स्थापित कर निशंक राज्य किया।

इसे वर्तमान की प्रासंगिकता के रूप में देखें तो टीकमगढ के कवि व अभिनेता राज राजेश्वर की पँक्तियाँ एक कटु सत्य कहती हैं- 

'इक समाज की संरचना है

घर है बाहर औ' अंगना है
परघर में जो घात लगाए
उसको युगों-युगों जलना है।
यह समाज जिसमें स्त्री, बालक और वृद्ध को निर्भय होकर विचरण का अधिकार है। ऐसी कोई मान्यता नहीं होनीं चाहिए कि स्त्री की देखभाल के लिये घर पर एक पुरुष स्थायी रहे। क्योंकि स्त्री रखरखाव की वस्तु नहीं अस्तु उसकी अपनी स्वायत्तता है। जीविकोपार्जन अथवा किसी कार्य हेतु पुरूष को जाना ही होता है। ऐसे में एक घर की स्त्री को अकेला समझ कर कोई भी परपुरुष उसे पाने की आकांक्षा करे तो यह समाज का नीचतम स्वरूप है। हर देश के समाज के लिये यह अवधारणा कलङ्क है। आज देश में स्त्रियां-बालिकायें महानगरों में अकेली रहकर अपने अस्तित्व को मजबूत कर रहीं हैं। स्त्री सेना में है, मेडिकल में है, पुलिस में है, शिक्षा में है एवं चाँद पर भी अपनी पहुँच बना कर अपनी गरिमा को एक इकाई के रूप में दृढ़ता से स्थापित कर रही है। तब उसके साथ उसके पिता-भाई-पुत्र-पति का साथ न होना उसकी असुरक्षा न समझा जाये। क्योंकि वह एक इकाई है न कि असुरक्षित सम्पूरक। 

इस व्यवस्था को तोड़ने वाला निश्चित ही लोलुप, व्यभिचारी, असभ्य, दुराचारी, नराधम और असंयमित जैसे न जाने कितने शब्दों की संज्ञाओं को धारण करने वाला होगा? ऐसे व्यक्ति समाज में न रहने योग्य हैं। ये समाज की शुचिता को भंग कर न केवल स्वयं की मर्यादा तोड़ते हैं बल्कि देशकाल से परे उन सभी रूपों की पात्रता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं जिन्हें उन्होंने अपने अवांछित कार्य सिद्धि के लिए दुरुपयोग किया है। जैसे रावण ने साधु का रूप रख कर आजतक सभी साधुओं को संशय के घेरे में रखा। आज भी लोग साधु-सन्यासी पर विश्वास करने से कतराते हैं। तब समाज/राजा का नैतिक दायित्व हो जाता है कि वह ऐसे व्यक्तियों को समुचित दण्ड दे और युगों-युगों पर वह दण्ड न्याय के रूप में समाज में समरसता स्थापित करे।

निश्चित ही रावण दहन एक सांकेतिक प्रक्रिया है जिसका होना न केवल उचित है बल्कि एक स्वस्थ समाज की संकल्पना है। यद्यपि रावण प्रकाण्ड विद्वान, महापण्डित, महाज्ञानी, संगीतज्ञ, और साहित्यसृजक भी माना जाता है। शिव ताण्डव स्त्रोत रावण की रचना कही जाती है। इतने गुण होने पर भी एक ऐसा दुस्साहस सारे गुणों के प्रभाव नष्ट कर यदि समाज में कलंकित कर दे तो ऐसे व्यक्ति के लिये उचित दण्ड का ही प्रावधान है। दण्ड भी ऐसा कि समस्त समाज देखे और ऐसी पुनरावृत्ति करने की सोचे भी नहीं। ऐसी ही स्थति पर गोस्वामी तुलसीदास का एक दोहा दृष्टव्य रहेगा-
"इमि कुपंथ पग देत खगेसा।रह न तेज तन बुधि बल लेसा।"
अर्थात कुमार्ग पर पाँव रखते ही शरीर में बुद्धि बल और तेज लेशमात्र भी नहीं रह जाता है। अस्तु कुमार्गियों के न्यायसंगत उदाहरण रावण का दहन शतप्रतिशत उचित ही है।

गीतिका 'वेदिका'
टीकमगढ़ (म. प्र.) की जानी मानी साहित्यकार व अभिनेत्री हैं
लेखन विधाएँ - गीत-नवगीत, गज़ल, छंद, लघुकथा
samrpyami@gmail.com , 9826079324 

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क्रांतिदूत: परघर में जो घात लगाए, उसको युगों-युगों जलना है - गीतिका वेदिका
परघर में जो घात लगाए, उसको युगों-युगों जलना है - गीतिका वेदिका
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