स्वामी विवेकानन्द के सपनों का भारत

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देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने स्वामी विवेकानंद के विषय में निम्न उदगार व्यक्त किये – हालांकि उनकी जड़ें भूत से ज...





देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने स्वामी विवेकानंद के विषय में निम्न उदगार व्यक्त किये –

हालांकि उनकी जड़ें भूत से जुडी हुई थीं और भारतीय प्रतिष्ठा पर उन्हें गर्व था, परन्तु जीवन से जुडी समस्याओं के प्रति उनका आधुनिक द्रष्टिकोण प्राचीन एवं वर्त्तमान भारत के बीच एक सेतु के समान था | उन्होंने खिन्न एवं हताश हिन्दू मानसिकता को सहारा दिया और इसमें आत्मविश्वास का संचार करने के साथ-साथ अपनी प्राचीन जड़ों से भी जोड़ा |

वस्तुतः स्वामी विवेकानंद भारत के उस अतीत गौरव की पुनर्स्थापना ही चाहते थे | वही उनका एकमेव स्वप्न था |

कैसे दूर करें गरीबी 

भारत के श्रमिकों के लिए स्वामी जी ने कहा – “जब कोई बड़ा काम किसी के सुपुर्द किया जाता है तो वह नायक बन जाता है | प्रशंसा की लालसा में तो कायर व्यक्ति भी जान दे सकता है और स्वार्थी अपना स्वार्थ छोड़ सकता है | परन्तु सही मायने में प्रशंसा के हकदार तो वे लोग हैं जो निःस्वार्थ और श्रद्धा से छोटे से छोटा काम भी करते रहते हैं और कोई उनकी ओर ध्यान भी नहीं देता | ये लोग हैं भारत के श्रमिक ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ |”

आज भारत की नीति भी विचित्र है | एक ओर तो गोदामों के अभाव में अनाज सड रहा है और दूसरी ओर अनेक लोग भूख से त्राहि त्राहि कर रहे हैं | त्रासदी यह है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हमारा रवैया देश की गरीब जनता के प्रति एकदम विपरीत हो गया | भारत के अर्थशास्त्री जीडीपी आंकड़ों का राग अलापते हैं तथा तेजी से बढ़ रहे शेयर बाजार की प्रशंसा करते नहीं थकते | उनके अनुसार यही विकास का पैमाना है | किन्तु दूरदराज के ग्रामीण अंचल में रहने बाले तो आज भी आत्महत्याएं कर रहे हैं | किसानों की आत्महत्याओं का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा और कृषि कार्य छोड़ने बाले कृषकों की संख्या बढ़ती जा रही है | सब को विकास के समान अवसर मिले इसके लिए स्वामी विवेकानंद का कथन था – 

“प्रत्येक पुरुष महिला और सभी को प्रभु के रूप में देखो | आप किसी की सहायता नहीं कर सकते, केवल सेवा कर सकते हो | जब भी अवसर मिले प्रभु की सेवा उसकी संतानों की सेवा के माध्यम से करो | यदि आपमें उसकी संतानों की सेवा करने की क्षमता है तो यह उसकी ही कृपा है | यह विचार अपने मन से निकाल फेंको कि किसी पर शासन करके आप उसका कुछ भला कर सकते हो | आप उस तरह अवश्य उनका कुछ हित कर सकते हो, जैसे बीज को बोने के बाद पानी व खुराक से सींचकर उसे धरती पर उगने देते हैं और फिर बड़ा होने के लिए उसे पानी व हवा उपलव्ध करवाते हैं | वह उतना ग्रहण कर लेता है जितना उसके लिए जरूरी है | फिर वह अपनी प्रकृति के अनुसार बढ़ता है |”

स्वामी जी ने आगे कहा कि – “मेरी नजर में हर वह व्यक्ति देशद्रोही है, जो भूख और अन्धकार में जी रहे लोगों की चिंता किये बिना धन खर्च कर शिक्षित हो रहा है | ये बात मैं हर उस व्यक्ति के लिए कहना चाहूंगा जिसे अपने उस धन पर गुमान है, जो उसने गरीबों का खून चूस कर इकठ्ठा किया है |”

स्वामी जी की द्रष्टि में आदर्श शिक्षा और वर्तमान स्थिति 

स्वामी विवेकानंद का नाम लेने भर से हिम्मत आती है, चित्र देखने से प्रेरणा मिलती है, उनके विचारों का अध्ययन करने से यह प्रेरणा जीवन समर्पण की बन जाती है | भारत के नौजवानों को ऐसी ही शिक्षा मिले यही विवेकानंद चाहते थे | भारत के ऊर्ध्वमुखी आध्यात्मिक चिंतन से युक्त, रक्षात्मक वृत्ति से मुक्त होकर स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्रीय चेतना का मार्गदर्शन दिया तथा भौतिक संस्कृति पर आक्रमण किया | स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात शिक्षा नीति बनाने के लिए डा. कोठारी आयोग बना | उसने शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा कि भारत का भविष्य उसके विद्यालयों में निर्मित हो रहा है | 

अमरीका के राष्ट्रपति थामस जेफरसन से पूछा गया कि उन्हें मृत्यु के बाद लोग कैसे याद रखें ? आपकी क्या इच्छा है ? उन्होंने राष्ट्रपति के रूप में याद रखने को नहीं कहा | उनका जबाब था कि मुझे बर्जीनिया यूनिवर्सिटी के संस्थापक के रूप में याद रखा जाए | यह यूनिवर्सिटी उन्होंने राष्ट्रपति पद से हटने के बाद निर्मित की थी | उनकी समाधि पर उनकी इच्छानुसार यही अंकित किया गया | इसी प्रकार भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री एपीजे अब्दुल कलाम ने भी पद से मुक्त होने के बाद शिक्षक बनने की इच्छा व्यक्त की |चीन ने प्रयास किया, व्यापक योजना बनाई | एक पुस्तक लिखी गई | “nation at school” विद्यालय में राष्ट्र है | चीन के एक राजदूत चूसी ने कहा था कि भारत ने बिना एक भी सैनिक भेजे दो हजार वर्षों तक चीन पर अपना वर्चस्व स्थापित रखा | शिक्षा के महत्व को उस चीन ने समझ लिया, किन्तु खुद भारत भूल गया | 

स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान शिक्षा संस्थाओं को खडा करने का प्रयत्न हुआ | स्वदेशी विद्यालय प्रारम्भ हुए | प. मदन मोहन मालवीय ने सराहनीय प्रयत्न कर बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी प्रारंभ की | महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक और आगरकर ने इस दिशा में यथेष्ट योगदान दिया | जन सामान्य के लिए भारतीय चिंतन के राष्ट्रभाषा प्रधान विद्यालय उस दौर में खड़े हुए | बिना किसी शासकीय अनुदान के संसाधन हीन स्थिति में समाज के सहयोग से यह कार्य संपन्न हुए | किन्तु आजादी के बाद जो होना चाहिए था वह नहीं हुआ | तमिलनाडु के शिक्षा मंत्री ने कहा कि कला, समाज शास्त्र, भूगोल आदि अनुत्पादक विषयों की आवश्यकता ही क्या है | इन्हें पाठ्यक्रम से हटा देना चाहिए | ऐसे शिक्षा मंत्री को क्या कहें ? डिग्री अर्थात जॉब का पासपोर्ट जिससे धन कमाना, धन कमाकर मौजमस्ती करना, अर्थात अनैतिकता |

देश में धर्म की, अध्यात्म की बात नहीं हो सकती क्योंकि धर्म निरपेक्षता है | यह धर्म निरपेक्षता है क्या इसे किसी ने स्पष्ट नहीं किया | किन्तु इसके चलते जीवन मूल्य मत सिखाओ | एस व्ही चव्हाण कमेटी ने राय दी कि पाठ्यपुस्तकों में सभी धर्मों के जीवन मूल्य सिखाना चाहिए | इस पर से भगवाकरण का हल्ला कर दिया गया | कहा गया कि क्या धर्माचार्य बनाना चाहते हो ? राजनीति, पत्रकारिता, व्यापार कहीं धर्म नहीं चाहिए | जबकि कृष्ण ने कहा कि काम और युद्ध में भी धर्म चाहिए | दुनिया में जो दीपक हमारे मनीषियों ने पिछले पांच हजार वर्षों में स्थापित किया, अब उसकी जरूरत नहीं | कहा जाता है कि धर्म नहीं चाहिए | धर्म मत सिखाओ |चरित्र निर्माण, मनुष्य निर्माण शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए | किन्तु आज मनी मेकिंग शिक्षा दी जा रही है, मेन मेंकिंग नहीं | चरित्र, आत्मविश्वास और श्रद्धा सिखाने के क्या पाठ्यक्रम हैं ? श्रद्धा तोड़ो यही आधुनिकता | श्रद्धाविहीन समाज यही शिक्षा है क्या, इसका विचार करने की आवश्यकता | 

स्वामी जी कहते थे कि मनुष्य के अंतर में स्थित पूर्णता की अभिव्यक्ति शिक्षा है | मनुष्य में देवत्व है, वह अमृतपुत्र है, पाप की संतान नहीं | भारत के उपनिषदों ने इस देवत्व को अनुभव कराया | यदि दीप को लोहे की पेटी में रख दिया जाए तो रोशनी कहाँ | उसका अनावरण करने पर ही प्रकाश बाहर आयेगा | 

इस साधना में वाधा है, एकाग्रता का अभाव | एक बार अमरीका में स्वामी विवेकानंद ने कुछ बच्चों को पिस्तौल से गुब्बारों पर निशाना लगाते देखा | उन्होंने भी यह करने की इच्छा व्यक्त की | बच्चों ने उपहास किया कि आपसे नहीं होगा | किन्तु स्वामी जी ने लगातार तीन निशाने अचूक लगाकर तीन गुब्बारे फोड़ दिए | बच्चों ने आश्चर्य से कहा कि आप तो बड़े तज्ञ हो | स्वामी जी ने उन्हें बताया कि उन्होंने तो पहली बार पिस्तौल को हाथ में लिया है | बच्चों ने हैरत से पूछा कि फिर आपने यह कैसे किया | स्वामी जी ने उत्तर दिया कि एकाग्रता के बल पर | बच्चों ने फिर पूछा कि यह एकाग्रता कैसे मिली तो उन्होंने जबाब दिया, चरित्र के बल पर | यही शिक्षा होना चाहिए | मनुष्य निर्माण में यह महत्वपूर्ण है | पर हमारे यहाँ लोग कहेंगे कि फिर बच्चों को विद्यालय में क्यों आश्रम में भेजो | ये पाठ्यक्रम के विषय नहीं हैं |

आज व्रह्मचर्य कहना ही मुश्किल हो गया है | डर्बिन यूनिवर्सिटी के स्टोर में कंडोम रखना पड़ते हैं | अभी हाल ही अमरीका के एक विद्यार्थी ने अपनी माँ की ह्त्या कर विद्यालय में जाकर कई छात्रों को शूट कर दिया | वहां की इकत्तीस करोड़ की आवादी में तीस करोड़ हथियार हैं | अमरीका तो अमरीका हमारे यहाँ दिल्ली यूनिवर्सिटी में आन्दोलन हुआ कि लड़का लड़की साथ रहेंगे | पाठ्यक्रम क्या, क़ानून क्या, परिक्षा क्या, मोरेलिटी क्या, गन कल्चर क्या, आज नहीं सोचेंगे तो गाँव गाँव यही हालत बनेगी | १०० साल पहले स्वामी जी ने आग्रह पूर्वक कहा था, परिवेश के साथ नहीं जोड़ेंगे तो स्वार्थी लोगों का निर्माण होगा |

कर्नाटक में एक आईएएस अधिकारी अपने परिवार के साथ रविवार की छुट्टी मनाने गाँव की तरफ गए | बच्चों ने एक खेत में पेड़ पर घोंसला देखकर उसे घर ले चलने की जिद्द की | अधिकारी ने बच्चों का दिल रखने को अपना ड्राईवर घोंसला लेने भेजा | खेत में काम करते बच्चे से ड्राईवर ने वह घोंसला माँगा किन्तु बच्चे ने इनकार कर दिया | १०-१५ रुपये का लालच देने पर भी वह वालक तैयार नही हुआ तो अधिकारी महोदय स्वयं उसके पास पहुंचे और जबरदस्ती घोंसला ले जाने की धमकी दी | उस बालक ने जबाब दिया कि मुझे मारकर ही घोंसला ले जा पाओगे | अधिकारी को हैरानी हुई तो उन्होंने उससे इसका कारण पूछा | बालक ने जबाब दिया कि घोंसले में चिड़िया के बच्चे हैं | शाम को जब इनकी माँ आयेगी तो वह कितनी दुखी होगी ? आप तो इस घोंसले को अपने घर ले जाकर रख दोगे | वहां बच्चे रोयेंगे यहाँ उनकी माँ | आई ऐएस चुपचाप वापस हो गए | बाद में उन्होंने खुद इस घटना का खुलासा उस बालक की प्रशंसा के रूप में एक समाचार पत्र में सम्पादक के नाम पत्र लिखकर किया | इसे कहते हैं परिवेश के साथ सम्बन्ध जोड़ना | पर्यावरण की शिक्षा अलग से देने की जरूरत नहीं पड़ती | जैसे उस गाँव के बालक को कभी नहीं मिली | यही स्वामी जी का कथन है |

शिष्य का गुरु गृह वास आदर्श स्थिति माना जाता था | गुरू का जीवन ज्वाजल्यमान अग्नि के समान | शिष्य के लिए रोल मोडल | जिस विषय को पढ़ाते उसके पूर्ण अधिकारी | चरित्रहीनता दूर दूर तक नहीं | विद्यार्थी के प्रति विशुद्ध प्रेम | आज भी यही शिक्षक बनने की आधार शिला है 

स्वामी विवेकानंद ने मातृभाषा के बारे में कहा कि विज्ञान, विधि, चिकित्सा की शिक्षा मातृभाषा में क्यों नहीं दी जा सकती ? स्त्री शिक्षा के बारे में कहा कि उसे इंटलेक्चुअल बनाओ पर प्यूरिटी की कीमत पर नहीं | मनुष्य निर्माण चरित्र निर्माण का आधार धर्म आध्यात्म | शिक्षा केवल कुछ लोगों के लिए नहीं | चांडालों को भी शिक्षा, केवल व्राह्मणों को नहीं | सुशिक्षित लोगों के लिए कहा, जब तक लाखों लोग अज्ञान के अन्धकार में हैं और आप ध्यान नहीं दे रहे, तो में ऐसे शिक्षित लोगों को द्रोही कहूँगा | सौ साल पहले एक सन्यासी ने इतनी गहराई से अध्ययन किया था | सामान्य लोगों की शिक्षा और उत्थान उनका स्वप्न था | अपने अपने क्षेत्र में उसे साकार करने का प्रयत्न करें | जैसा पहले दीप समान भारत था, उसे पुनः बनाएं |

औद्योगीकरण और स्वामी विवेकानंद –

सन १८९३ में स्वामी विवेकानंद की मुलाक़ात जहाज यात्रा के दौरान जमशेद जी नौसेर्वान जी टाटा से हुई | यह जहाज जापान से अमेरिका जा रहा था | स्वामी जी ने टाटा को परामर्श दिया – तुम जापान से माचिस का आयात क्यों करते हो ? यदि आप इसका उत्पादन भारत में ही करोगे तो आपको भी ज्यादा लाभ होगा और अन्य लोगों को रोजगार भी मिलेगा, साथ ही देश का पैसा भी देश में ही रहेगा |

स्वामी जी के विचारों के अनुरूप चलते हुए ही आगे चलकर टाटा ने जमशेदपुर स्टील प्लांट की आधारशिला रखी | जमशेद जी ने अपनी संपत्ति का एक भाग विज्ञान संस्थान आरम्भ करने के लिए दिया, जो आज बेंगलोर में इन्डियन इंस्टीटयूट ऑफ़ टेक्नोलोजी के नाम से प्रख्यात है | यह संस्थान खोलने के पहले उन्होंने स्वामी जी को पत्र लिखा –

प्रिय स्वामी विवेकानंद,

मुझे विश्वास है कि जापान से शिकागो की यात्रा के दौरान आप अपने सहयात्री को भूले नहीं होंगे | मुझे आज भी भारत की तपोभूमि पर विकास और इस भावना को नष्ट न कर सही दिशा देने बाले आपके विचार याद हैं |

मैंने इसी विचारधारा का समावेश भारतीय विज्ञान शोध संस्थान में किया है, जिसके बारे में आपने जरूर पढ़ा या सुना होगा | मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस तपस्वी भावना के बेहतर प्रयोग के लिए इस भावना से अभिभूत पुरुषों के लिए मठों और आश्रमों की स्थापना से अच्छा और कोई विकल्प हो ही नही सकता | जहां वे एक सादगी भरा जीवन जीते हुए प्राकृतिक व मानवीय विज्ञान की जड़ों को मजबूत बनाएं | मेरे विचार से इस प्रकार के कल्याणकारी अभियान का नेतृत्व एक सक्षम व्यक्ति के हाथों में होना चाहिए, जो देश के तपस्वी संस्कारों और विज्ञान को साथ साथ लेकर चल सके | मुझे मालूम है कि वह व्यक्ति विवेकानंद के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता | क्या आप इस मिशन की रहनुमाई करने पर विचार करेंगे ? शायद इसके लिए सबसे पहले आपको लोगों में जोश का संस्कार करना होगा, जिसके लिए हम पर्चे बाँट सकते हैं | इसके प्रकाशन पर तमाम व्यय करने में मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी |

२३ नवम्बर १८९८ 

जमशेद जी एन. टाटा 

यह पत्र स्वामी जी के कार्यों और विचारों का वास्तविक स्वरुप प्रस्तुत करता है, साथ ही उनके योगदान को भी प्रतिविम्वित करता है | देश की तात्कालिक स्थिति पर क्षोभ व्यक्त करते हुए स्वामी जी ने कहा – “फिलहाल अपने धार्मिक रीति रिवाजों को एक ओर रखकर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करो | विदेशों के लोग आपके देश से मिले कच्चे माल के दम पर अपने भविष्य को उज्वल बना रहे हैं और आप बोझ ढोने बाले जानवरों की भाँती उनका बोझ ढो रहे हैं | विदेशी लोग भारत से कच्चा माल लेकर अपनी सूझबूझ से विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन कर अपना वर्चस्व कायम कर रहे हैं, जबकि आप अपनी बुद्धि के द्वार बंद कर अपनी पुस्तैनी संपदा उन पर लुटा रहे हैं | और भोजन के लिये अन्य देशों के सामने गुहार लगाते फिरते है |”

एक स्वाभिमान संपन्न समुन्नत आत्म निर्भर भारत स्वामी जी का स्वप्न था | क्या हम उनके सपनों को साकार करने का स्वप्न अपनी आँखों में बसाना पसंद करेंगे ?


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