सृजन की संस्कृति है भारतीयता - संजय तिवारी

भारत की संस्कृति वस्तुतः सृजन की संस्कृति है . यह जोड़ने की कला जानती है . जोड़ना ही सिखाती है और जोड़ जोड़ कर बहुत बड़ा बनाने की सीख भी देती है . बिना जोड़े या जुड़े कुछ भी बड़ा नहीं बन सकता . परमाणु से अणु. अणु से कोशिका , कोशिका से उत्तक , उत्तक से अंग, अंग से शरीर , शरीर से परिवार ,परिवार से समाज , समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व समुदाय तक के गठन की सांस्कारिक विधि है भारतीयता . इसमे कोई भी , कुछ भी अलग नहीं है .सभी एक दूसरे से जुड़े है . केवल मनुष्य ही नहीं अपितु प्रकृति के प्रत्येक अवयव . सभी का एक दूसरे से अन्योन्याश्रित सम्बन्ध भी है , बिलकुल सगे की तरह . कोई किसी से जुदा नहीं है .सभी को मिल कर ही सृष्टि के संचालन का दायित्व है . सृष्टि में मनुष्य के सीधे सम्बन्ध स्थापित कराती भारतीय संस्कृति की यही सबसे बड़ी विशेषता भी है . यहाँ हरेक अवयव को बराबर का सम्मान है . मिटटी के एक कण से लेकर सभी वनस्पतियों, नदियों , पर्वतो ,तालाबो , पोखरों , खेत , खलिहान , जंगल , झीलों , झरनों , कीट पतंगों आदि समस्त प्राकृतिक अवयव इसकी मूल अवधारण में सामान रूप से शामिल है .सृष्टि में कुछ भी ऐसा नहीं जिसका इस संस्कृति में समायोजन और महत्व न हो .

वस्तुतः भारतीय संस्कृति की वैश्विक अवधारण लोगो को तब समझ में आने लगी है जब पश्चिम के कथित बुद्धिजीवियो ने दुनिया को सिमटते देखा है . उनकी आँखे तब खुली है जब तकनीक के विकास के साथ उन्होंने दुनिया को वास्तव में एक गाव ही पाया है . जब आज उनको यह दिखाई पड़ने लगा है की वास्तव में दुनिया तो बहुत छोटी है . इसके किसी कोने से किसी कोने में आज सेकेंडो में बात हो रही है . लोग एकदूसरे से आमने सामने होकर मिल रहे है और बात कर रहे है तब उन्हें भारत की उस उक्ति की सचाई का आभास हो रहा है जिसमे वैश्विकता सदियों से विराजमान है . विश्व वन्धुत्व की भारतीय अवधारणा के तत्व अब पश्चिम को भी सच जान पड़ते है . भारतीय सनातन संस्कृति तो आदिकाल से ही विश्व के कल्याण की कामना करती रही है . यहाँ के प्रत्येक वांग्मय का सन्देश ही विश्व कल्याण के लिए रहा है क्योकि जब से हमारी संस्कृति है, तब सृष्टि में केवल मनुष्य ही होता था . उसमे तब कोई हिन्दू, मुसलमान, यहूदी , इसाई आदि नहीं होता था . यह तो प्रामाणिक सत्य है की दो हजार साल से ही धरती पर इसाइयत है . केवल 1400 साल पहले ही इस्लाम आया है . यह तो इस्लाम और इसाइयत के अध्येताओ को भी जानने का विषय है कि जब उनके मज़हब नहीं थे तब भी यह दुनिया थी . तब भी धरती पर मनुष्य रहता था . तब आखिर उस मनुष्य की कोई न कोई संस्कृति , सभ्यता जरूर रही होगी . .इन सभी सवालो के जवाब केवल भारत और भारतीयता के पास ही है .दुनिया की कोई और ऐसी जगह या सभ्यता है ही नहीं जो इन प्रश्नों का उत्तर दे सके .

भारतीय संस्कृति की सहिष्णु प्रकृति ने उसे दीर्घ आयु और स्थायित्व प्रदान किया . संसार की किसी भी संस्कृति में शायद ही इतनी सहनशीलता हो, जितनी भारतीय संस्कृति में है. भारतीय चाहे किसी देवी - देवता की आराधना करें या न करें, पूजा-हवन करें या न करें, आदि स्वतंत्रताओं पर धर्म या संस्कृति के नाम पर कभी कोई बन्धन नहीं लगाये गए. इसीलिए प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रतीक सनातन धर्म को धर्म न कहकर कुछ मूल्यों पर आधारित एक जीवन-पद्धति की संज्ञा दी गई और इसका अभिप्राय किसी धर्म विशेष के अनुयायी से न लगाकर भारतीय से लगाया गया। भारतीय संस्कृति के इस लचीले स्वरूप में जब भी जड़ता की स्थिति निर्मित हुई तब किसी न किसी महापुरुष ने इसे गतिशीलता प्रदान कर इसकी सहिष्णुता को एक नई आभा देने का प्रयास किया . भारतीय संस्कृति की सहिष्णुता एवं उदारता के कारण उसमें एक ग्रहणशीलता की प्रवृत्ति को विकसित होने का अवसर मिला। वस्तुत: जिस संस्कृति में लोकतन्त्र एवं स्थायित्व के आधार व्यापक हों, उस संस्कृति में ग्रहणशीलता की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से ही उत्पन्न हो जाती है. और यह ग्रहण करने की हमारी ताकत वास्तव में हमारे लिए वरदान साबित हुई . हमारी इस ताकत का ही नतीजा है कि अनेक हमलो और आक्रमणों के बावजूद भारत और भारतीयता आज भी विश्व को मार्गदर्शन देने की अवस्था में है . ऐतहासिक तथ्यों से ज्ञात होता है कि भारत में इस्लामी संस्कृति का आगमन भी अरबों, तुर्कों और मुग़लों के माध्यम से हुआ। इसके बावजूद भारतीय संस्कृति का अपना ही अस्तित्व बना रहा , साथ ही नवागत संस्कृतियों से कुछ अच्छी बातें ग्रहण करने में भी भारतीय संस्कृति ने संकोच नहीं किया। ठीक यही स्थिति यूरोपीय जातियों के आने तथा ब्रिटिश साम्राज्य के कारण भारत में विकसित हुई ईसाई संस्कृति पर भी लागू होती है। यद्यपि ये संस्कृतियाँ अब भारतीय सभ्यता का ही अभिन्न अंग है, फिर भी ‘भारतीय इस्लाम’ एवं ‘भारतीय ईसाई’ सभ्यताओं का स्वरूप विश्व के अन्य इस्लामी और ईसाई धर्मावलम्बी देशों से कुछ भिन्न है। इस भिन्नता का मूलभूत कारण यह है कि भारत के अधिकांश मुसलमान और ईसाई मूलत: भारत भूमि के ही निवासी हैं। सम्भवत: इसीलिए उनके सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक आचरण में कोई परिवर्तन नहीं हो पाया और भारतीयता ही उनकी पहचान बन गई. आज दुनिया के अन्य देशो में जब भी भारत से कोई मुसलमान समुदाय से जाता है तो उसकी पहचान हिन्दू मुसलमान या भारतीय मुसलमान के रूप में ही की जाती है .

दरअसल जिस भौतिकता को आधार बनाकर पश्चिम की सभ्यताओ का विकास हुआ उस निरी भौतिकता से उपजी बेचैनी ने पश्चिम को तबाह कर दिया है . अब उन्हें भारत के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे तत्वों में कुछ नया दिखता है और लगता है की यहाँ से शान्ति के द्वार मिल सकते है . क्योकि हमारी आश्रम व्यवस्था के साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थों ने ही भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता के साथ भौतिकता का एक अदभुत समन्वय कर दिया . हमारी संस्कृति में जीवन के ऐहिक और पारलौकिक दोनों पहलुओं से धर्म को सम्बद्ध किया गया . धर्म हमारे यहाँ दायित्व है . इसे उन सिद्धान्तों, तत्त्वों और जीवन प्रणाली को कहते हैं, जिससे मानव जाति परमात्मा प्रदत्त शक्तियों के विकास से अपना लौकिक जीवन सुखी बना सके तथा मृत्यु के पश्चात जीवात्मा शान्ति का अनुभव कर सके . शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है, यह अमरता मोक्ष से जुड़ी हुई है और यह मोक्ष पाने के लिए अर्थ और काम के पुरुषार्थ करना भी जरूरी है. इस प्रकार भारतीय संस्कृति में धर्म और मोक्ष आध्यात्मिक सन्देश एवं अर्थ और काम की भौतिक अनिवार्यता परस्पर सम्बद्ध है. आध्यात्मिकता और भौतिकता के इस समन्वय में भारतीय संस्कृति की वह विशिष्ट अवधारणा परिलक्षित होती है, जो मनुष्य के इस लोक और परलोक को सुखी बनाने के लिए भारतीय मनीषियों ने निर्मित की थी. सुखी मानव-जीवन के लिए ऐसी चिन्ता विश्व की अन्य संस्कृतियाँ नहीं करतीं.

आज दुनिया के सामने यदि कोई संकट है तो वह केवल सभ्यताओ के संघर्ष का है . ईसाइयत हो या इस्लाम या कोई और सभ्यता , इन सबने अपने अस्तित्व के साथ ही वर्चस्व की ऐसी जंग छेड़ी है जिसने दुनिया को अशांत कर दिया है . दुनिया की अशांति की जड़ो में जाइए तो सबकुछ साफ साफ़ दिख जाता है . भारतीयता के अलावा विश्व के हर पंथिक सभ्यता ने विश्व को अशांत ही किया है क्योकि उनका लक्ष्य कभी भी भारतीयता की तरह विश्व के कल्याण का नहीं रहा है . वे तो धरती पर खुद को स्थापित करने की जुगत में ही लगे रहे है .उन्होंने कभी यह सोचने तक की जहमत नहीं उठाई की उनकी हरकतों से प्रकृति, मनुष्य और इस सृष्टि का कितना अहित होने वाला है . वे बिना सोचे बिचारे केवल खुद की स्थापना में मशगूल रहे . यहाँ तक की भयंकर लूटपाट , मारकाट , और युद्ध भी किये और आज भी कर रहे है . उन्होंने कभी कोई ऐसी शिक्षा प्रणाली तक नहीं विक्सित होने दिया जिसमे जगत के कल्याण की बात हो . उनकी कोशिश हमेशा केवल संकीर्ण विचारधाराए बनाने और उसी अनुरूप पीढ़िया तैयार करने की रही . इस बारे में किसी का नाम लेकर समझाने की जरूरत नहीं है क्योकि आज के इस तकनीकी और सूचना के युग में बहुत कुछ लोग देख और सुन रहे है .

जिन लोगो को अब दुनिया समझ में आ रही है उनको भारत और भारतीयता भी समझ में आने लगी है .वे इस तथ्य को बखूबी समझाने लगे है की अगर भारतीयता , जिसे भारत की संस्कृति कहा जाता है , यदि उसको अंगीकार नहीं किया गया तो दुनिया नष्ट हो जायेगी .संघर्षो और युद्धों से किसी का भला नहीं होने वाला .युद्ध न तो कभी विकल्प था और न कभी हो सकता है लेकिन इसका यह भी तात्पर्य नहीं कि अनैतिकता और अधार्मिकता को बढ़ने दिया जाय और हम तमाशबीन बने रहे . ऐसा नहीं है क्यों की हमारी संस्कृति इस बात की भी गवाह है की आज से पांच हज़ार साल पहले जब समाज और सत्ता अधर्म के मार्ग पर चल रहे थे , अनैतिकता इतनी बढ़ चुकी थी की राजपरिवार के एक पक्ष के लोग अपने ही परिवार के दूसरे पक्ष की बहू के शरीर से उसका वस्त्र भरी सभा में उतार रहे थे तब उस युग के महानायक को युद्ध ही विकल्प दिखा . तब उसने ऐसा युद्ध कराया की वह अनैतिक सभ्यता सदा के लिए ही ख़त्म हो गयी और नए सिरे से न्याय का शासन स्थापित हुआ .

ठीक है कि उस न्याय के शासन के बाद हमने पांच हज़ार साल से ज्यादा समय की यात्रा कर ली है . आज का मनुष्य उस समय की अवधारणाओ को जितना संचित रख सका है उससे ज्यादा भूल चूका है , लेकिन केवल भारतीय संस्कृति के सनातन तवा है जो अभी भी हमारे पास सुरक्षित है . यह भी तथ्य है की इतनी लम्बी यात्रा के दौरान इस संस्कृति पर भी सभ्यताओ की परतो की कुछ मोती , कुछ मैली धूल की परत जैम गयी है . इस परत के कारण ही भारत की धरती पर पिछले ढाई हज़ार वर्षो में कई बार कई ऐसे महापुरुषों ने यह प्रयास किया की इस परत को साफसुथरा कर के भारत की मूल आत्मा को विक्सित होने दिया जाय लेकिन दुर्भाग्य यह हुआ की जिन जिन ने ऐसे शोधन के प्रयास किये उन्ही के अनुयायियों ने एक नए पंथ का की निर्माण कर दिया . हर बार इसे नयी नयी पूजा पद्धतियों से जोड़ने की ऐसी कोशिशे हुई की पूरी अवधारणा ही दायित्व वाले धर्म से पूजा वाले धर्म के रूप में स्थापित हो गयी . प्रचलन ऐसा बिगड़ा की भारत की मानवीय संस्कृति को भी एक पंथ या मज़हब जैसा देखा जाने लगा . हमारी सनातनता को इन अज्ञानी लोगो ने नष्ट करने की खूब कोशिश की . उसे पूजा पद्धति बनाने का प्रयास हुआ . आज भी बहुत से लोग अज्ञानतावश इसे एक पूजापद्धति मानने की गलती कर बैठते है और इसी को सत्ता लोलुप राजनीति के अलमबरदार अपना हथिया भी बनाने की कोशिश करते है .यह वास्तव में समय का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की जिस भारतीयता को लेकर आज पूरा पश्चिम चौधियाया हुआ है , हमारे देश के भीतर उसको लेकर पंथिक बहसे हो रही है .

आज विश्व हमारी तरफ आशा भरी निगाह से देख रहा है .अब उसकी समझ में यह तथ्य आ चूका है कि भारतीयता को अपनाए बिना कोई समाधान संभव नहीं है . आज की नयी नयी खतरनाक बीमारियों के इलाज के लिए वह भारतीय शास्त्र खंगाल रहा है . आज मन की अशांति को दूर करने के लिए वह भारत के योग और आध्यात्म को अपना रहा है .जीवन को सुगम बनाने के लिए वह भारत के शास्त्रों का खोज खोज कर अध्ययन कर रहा है . जीवन की अवधारणा को समझाने और जीवन प्रबंधन के लिए वह गीता के श्लोको के सही अर्थ तलाश रहा है . भारतीय वांग्मय और चिंतन में वह डूबना चाहता है . अब वह भारत को सपेरो और मदारियों का देश नहीं मानता . उसे इस धरती पर केवल भारत से ही जीवन की उम्मीद मिल रही है . यह बात केवल आज की भी नहीं है , पश्चिम में अब तक जितने भी बड़े दार्शनिक , विचारक , साहित्यकार , लेखक और वैज्ञानिक हुए है , सभी ने यह माना है कि विश्व का हित केवल भारतीयता ही कर सकती है .

प्रख्यात इतिहासकार और प्राचीन भारत के इतिहास पर सबसे बड़ा शोध कर अद्भुत भारत नामक ग्रन्थ के रचयिता ए एल वाशाम स्वयं स्वीकार कर चुके है कि भारत की धरती कोई सामान्य धरती नहीं है , इस धरती ने ही मनुष्य को संस्कृति दी है और आने वाले समय में विश्व को यदि कही से कुछ दिशा मेलने की उम्मीद है तो सिर्फ भारत से ही है . भारत और भारतीय संस्कृति ही विश्व की प्रत्येक सभ्यताओं का मार्गदर्शन करा पाने में सक्षम है.


संजय तिवारी
अध्यक्ष, भारत संस्कृति न्यास, नयी दिल्ली
९४५०८८७१८६

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