क्रांतिदूत

नेहरू जी की गुमनाम आदिवासी संथाल पत्नी !



यह कहानी है एक ऎसी महिला की, जिसे आदिवासी संथाल समाज ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पत्नी तो घोषित किया, किन्तु साथ साथ समाज से बाहर शादी करने के आरोप में समाज से बहिष्कृत कर गाँव से बाहर भी कर दिया |

गत वर्ष 'दैनिक भास्कर' के धनवाद झारखंड एडीशन में यह कहानी प्रकाशित भी हुई थी | 58 साल से जवाहर लाल नेहरू की पत्नी होने के आरोप में समाज के बहिष्कार और गांव निकाले की सजा भुगत रही इस 75 वर्षीय महिला का नाम है – बुधनी |

बुधनी की कहानी दर्शाती है कि हमारे नेतागण अपनी छवि बनाने के लिए, जो कुछ नाटक नौटंकी करते हैं, उसके कारण कई बार कैसे मासूम जिंदगियां तबाह और बर्बाद हो जाती हैं | दर-दर की ठोकरें खाने के बाद, यह संथाल महिला अब अकेले रहती है। 

बुधनी की दुर्दशा शुरू हुई 6 दिसंबर 1959 को । पश्चिम बंगाल के एक गांव में दामोदर वैली कॉरपोरेशन (डीवीसी) द्वारा एक बाँध का निर्माण करवाया गया | वहां ही मजदूरी करती थी बुधनी |

बाँध का निर्माण पूर्ण हुआ, तो उसका उद्घाटन करने स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पधारे | उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि डैम का उद्घाटन किसी मजदूर के हाथों हो | और दुर्भाग्य से 17 साल की बुधनी को इस काम के लिए चुना गया | नेहरू जी पर तो उस समय हीरो बनने का बुखार चढ़ा हुआ था, तो वे बुधनी से उदघाटन करान पर ही संतुष्ट नहीं हुए, बल्कि उनके स्वागत को जो हार लाया गया, वह भी उन्होंने बिना आगा पीछा सोचे बुधनी के हाथों में थमा दिया । बस, फिर क्या था, ये घटना बुधनी की जिंदगी में तूफान ले आई।

समाज ने निकाला, अफसर ने रखैल बनाया

उसी रात गांव में संथाली समाज की पंचायत बैठी। बुधनी को कहा गया कि पहली बात तो यह कि पंडित नेहरू ने उसे माला दी है, इसलिए आदिवासी परंपरा के मुताबिक वो अब उनकी पत्नी हो गई है। और दूसरी यह कि पंडित नेहरू आदिवासी नहीं है, इसलिए एक गैर आदिवासी से शादी रचाने के आरोप में उसे जाति और गांव से बाहर निकाला जाता है । 

वो उस वक्त मजदूरी करती थी। कुछ समय तो जैसे तैसे वो अकेले वहीं नौकरी करती रही, लेकिन 1962 में उसे वहां से भी निकाल दिया गया । इसके बाद वह बंगाल छोड़कर बिहार (अब झारखंड) आ गई। सात सालों तक दरदर की ठोकरें खाते भटकती रही। 

फिर एक प्रोजेक्ट में ऑफिसर सुधीर दत्ता ने उसे अपना लिया, किन्तु शादी नहीं की | तीन बच्चों की मां बनाने के बाद दत्ता साहब भी संसार से विदा ले गए ।

राजीव गांधी से मिलने पर मिली नौकरी

1985 में तत्कालीन पीएम राजीव गांधी को बुधनी-नेहरू के किस्से की जानकारी मिली, तो उन्होंने महज इतनी औपचारिकता दिखाई कि बुधनी को मिलने बुलाया । इस मुलाक़ात से मात्र इतना हुआ कि दामोदर वैली कॉरपोरेशन ने उसे पुनः नौकरी पर रख लिया | अब वो रिटायर हो चुकी हैं। उसने बताया कि गांव से निकाले जाने के कई सालों बाद वो अपने घर गई थी। वे अब भी पर्व-त्योहार पर गांव जाती हैं। पर आज भी परिवार के सदस्यों को छोड़ अन्य किसी से बात नहीं होती। समाज के लोगों की आंखों में न तो कोई अपनापन है ना ही कोई सम्मान | 

वो कहती हैं- "मैं चाहती हूं कि कोई राहुल गांधी से कहकर मेरे लिए घर बनवा दे। मेरे बेटे को नौकरी दिलवा दे, ताकि बची ज़िंदगी आराम से गुजर जाए।"

पर राजीव जैसी सामान्य संवेदना भी राहुल में कहाँ, जो अपनी इस आदिवासी पड़नानी की सुध लें ?

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