ब्ल्यू क्राफ्ट डिजिटल फ़ौंडेशन के सीईओ श्री अखिलेश के ओर्गेनाईजर में प्रकाशित एक अंग्रेजी आलेख के अंशों पर आधारित अगर किसी कांग्रेसी...
ब्ल्यू क्राफ्ट डिजिटल फ़ौंडेशन के सीईओ श्री अखिलेश के ओर्गेनाईजर में प्रकाशित एक अंग्रेजी आलेख के अंशों पर आधारित
अगर किसी कांग्रेसी से पूछें कि क्या 2019 में मोदी फिर से जीत
सकते हैं, तो वह कुछ आशा तो कुछ निराशा से जबाब देगा । निराशा इसलिए क्योंकि, मीडिया लगातार उन्हें दिलासा देता रहा, इसके बाबजूद वे न केवल 2014
में हारे, बल्कि उसके बाद एक एक करके कई राज्य उनके हाथ से निकल गए । उन्हें
गुजरात में बड़ी आशा थी कि लगातार दो दशकों से अधिक समय तक सत्ता में रहने के कारण
वहां भाजपा के खिलाफ असंतोष होगा, किन्तु वहां भी नतीजा वही रहा – ढाक के तीन पात
| उत्तर प्रदेश में तो गठबंधन बनाकर लड़ने के बाबजूद न केवल सूपड़ा साफ़ हो गया,
बल्कि हालत इतने बदतर हो गए कि आगामी लोकसभा चुनाव में न तो समाजवादी पार्टी और न
ही बहुजन समाज पार्टी उन्हें साथ रखना चाहती । इतना भीषण अपमान ? और फिर उत्तर
पूर्व में भी केसरिया रंग छा गया, यहां तक कि बामपंथ का गढ़ कहे जाने
वाले त्रिपुरा में भी भाजपा सरकार बन गई । मई 2018 में कर्नाटक चुनाव में भी बीजेपी
न केवल सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, उसका वोट प्रतिशत भी जबरदस्त बढ़ा ।
लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस को आशा है, तो क्यूं कर? चूंकि कांग्रेस के अलावा केंद्र में कोई भी पार्टी दुबारा सत्ता
में नहीं आई है । 77 में जनता पार्टी का प्रयोग विफल रहा और महज तीन साल में ही
अपने अंतर्विरोधों से वह गिर गई । 1989, 1996 और 1997 में भी यही कुछ देखने
में आया । 1999 में पहली बार वाजपेई सरकार पूरे पांच साल चली, किन्तु 2004 दुबारा
नहीं जीत पाए । साईनिंग इण्डिया की उस असफलता के कारण कांग्रेस को उम्मीद है कि
मोदी भी 2019 में उसी प्रकार असफल सिद्ध होंगे ।
उनका मानना है कि अब मोदी और बीजेपी के पुराने मुद्दे घिस घिस कर भोंथरे
हो गए हैं, अतः लोग अपने पुराने ढर्रे पर लौट आयेंगे | देश में राष्ट्रवाद या
हिंदुत्व की तुलना में जाति, भाषा, क्षेत्र या साम्प्रदायिक विचारधारायें
ही अधिक प्रभावी हैं, अतः “भाजपा विरुद्ध सब” का महागठबंधन आसानी से मोदी युग का
समापन कर सकता है । फिर यह जाना परखा फार्मूला है, जिसके आधार पर 2004 में सोनिया
गांधी ने सफलता पाई थी | अतः राहुल गांधी भी 2019 में इसी आधार पर सफलता के मंसूबे
संजो रहे हैं ।
इनका उद्देश्य और रणनीति साफ़ है कि लोगों को विकास और सुशासन के
मुद्दों पर एकजुट होने देने के स्थान पर, उन्हें उनकी जातियों में विभाजित रखा जाए
| महागठबंधन का उद्देश्य जाति रेखाओं को गहरी कर प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में
बीजेपी के खिलाफ एक बड़ा समूह बनाना है। उत्तर प्रदेश और बंगाल की प्रारम्भिक
सफलताओं के बाद भी इस योजना में कई छिद्र हैं, जिनके कारण मोदी विरोधियों की आशाओं
पर तुषारापात हो सकता है ।
सबसे पहला कारण तो खुद मोदी ही हैं | उन्हें चुनौतियों को अवसर में
बदलना आता है । उनका पूरा सार्वजनिक जीवन चुनौतियों से भरा पड़ा है । 2012 के
गुजरात विधानसभा चुनाव में, कांग्रेस ने लाखों लोगों के लिए मुफ्त घर बनाने का वादा किया था,
लेकिन किसी ने अपनी प्रतिबद्धता नहीं बदली और चुनाव पूर्व के वायदों पर रत्ती भर
भी भरोसा नहीं किया ।
इसी प्रकार 2014 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले शिवसेना के
साथ संबंधों का टूटना भी मोदी-शाह मॉडल के लिए वाटरलू माना गया, लेकिन वहां भी बीजेपी
फिर से जीत गई। मोदी की हार की आशा संजोये बुद्धिजीवियों और पत्रकारों ने कहना
शुरू किया कि जनता में कांग्रेस के प्रति नाराजगी के कारण उसे पराजित करना आसान है, लेकिन मजबूत क्षेत्रीय दल भाजपा को पराजित कर सकते हैं, लेकिन उत्तर
प्रदेश के चुनाव परिणामों ने उनका यह आंकलन भी गलत सिद्ध कर दिया ।
फिर कहा गया कि गैर-हिंदी बेल्ट में भाजपा अस्तित्वशून्य है,
किन्तु उत्तर पूर्व के अधिकांश राज्यों, यहाँ तक कि अल्पसंख्यक बहुल त्रिपुरा और नागालैंड
में भी भाजपा सत्ता में है।
अतः यह आशा करना कि महागबंधबंधन की संयुक्त कार्य योजना भाजपा के
लिए वाटरलू साबित होगी, अभी बहुत जल्दबाजी होगी । हाँ यह रणनीति केवल उक्त
श्रृंखलाओं में नवीनतम है।
अब एक अहम सवाल कि कांग्रेस कहाँ से सफल हो सकती है ? बंगाल में मतदाता
तृणमूल के मुकाबले किसे वोट करेंगे ? क्या कांग्रेस वहां शून्य नहीं है ? ऐसे में
तृणमूल भी कांग्रेस को घांस क्यूं डालेगी ? उत्तर प्रदेश में बसपा और समाजवादी तो
मिल रहे हैं, किन्तु कांग्रेस को अंगूठा दिखा रहे हैं । महाराष्ट्र में शरद पंवार
ने जिस प्रकार तीसरे मोर्चे की बकालत शुरू की है, उससे वहां भी कांग्रेस किनारे
लगती ही दिख रही है । कर्नाटक की खिचडी में तो अभी से कंकर पत्थर दिखने लगे हैं ।
अगर महागठबंधन बन भी गया तो उसका नेता तो स्वनामधन्य राहुल जी ही
होंगे | और अधिक अधिकाँश चुनाव क्षेत्रों में उनकी कार्य योजना सफल भी हो गई, और
भाजपा के विरुद्ध एक ही उम्मीदवार सामने आया तो यह स्थिति भी संभवतः भाजपा के लिए
अधिक सुविधाजन होगी | क्योंकि मतदाता के दिमाग में किसी भी तरह का भ्रम या संदेह
नहीं रहेगा । उसे निर्णय करना होगा कि वह किसे देश का प्रधान मंत्री देखना चाहता
है ? मोदी को या राहुल गांधी को ? ममता या मायावती के उम्मीदवार तो अपने गढ़ों में
शायद जीत भी सकते हैं, किन्तु गांधी को प्रधान मंत्री बनाने के लिए वोट करेंगे, यह
एक पेचीदा सवाल है?
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