राष्ट्रवाद , राष्ट्रीयता और राष्ट्र - डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी

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संघ प्रमुख माननीय मोहन भागवत के राष्ट्रवाद शब्द को लेकर दिए गए वक्तव्य के बाद इस विषय पर चर्चा होना स्वाभाविक है क्योंकि इसी शब्द को लेक...



संघ प्रमुख माननीय मोहन भागवत के राष्ट्रवाद शब्द को लेकर दिए गए वक्तव्य के बाद इस विषय पर चर्चा होना स्वाभाविक है क्योंकि इसी शब्द को लेकर संघ या भाजपा विरोधी लोग नाजी और फासीवादी होने के आरोप लगाते रहते हैं। राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को अब वास्तव में बहुत सलीके से समझ लेने की आवश्यकता है। यहां अंग्रेजी के दो शब्दों का उलेख करना आवश्यक लगता है। एक है nationalism दूसरा है nationality, और फिर एक तीसरा शब्द है nation यानी राष्ट्र ।

भारत वर्ष हमारा राष्ट्र है। भारतीयता हमारी पहचान है। भारतवाद जैसा कोई आकार नही बनता। हैम भारतीय हैं । भारतीयता ही हमारी पहचान है। इसलिए यदि मोहन भागवत जी ने भारत और भारतीयता, राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात कही है तो यही सही है। यह तो भाषाई कमजोरी और पश्चिमी अनुवाद परंपरा है जिसने राष्ट्रवाद जैसी उक्ति दी।

राष्ट्र की परिभाषा एक ऐसे जन समूह के रूप में की जा सकती है जो कि एक भौगोलिक सीमाओं में एक निश्चित देश में रहता हो, समान परम्परा, समान हितों तथा समान भावनाओं से बँधा हो और जिसमें एकता के सूत्र में बाँधने की उत्सुकता तथा समान राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाएँ पाई जाती हों। राष्ट्रवाद के निर्णायक तत्वों मे राष्ट्रीयता की भावना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रीयता की भावना किसी राष्ट्र के सदस्यों में पायी जानेवाली सामुदायिक भावना है जो उनका संगठन सुदृढ़ करती है।राष्ट्रवाद की अवधारणा 

राष्ट्रवाद शब्द चौहदवी सदी में तब पहली बार अस्तित्व में आया जब फ्रांस में पहली बार जॉन आफ आर्क ( सैंट जॉन) ने नारा दिया ” फ्रांस फ्रांसीसीयो के लिऐ” और उसने अंग्रेजो की सत्ता के खिलाफ फ्रांस के लोगो को जागृत किया. 

उपनिवेशिक काल में ये अवधारणा यूरोप से होती हुई दूनियां भर में फैल गई जिसका मुख्य कारण था यूरोपीय ताकतों द्वारा अपने उपनिवेश देशो का आर्थिक शोषण और वहाँ के नागरिको के साथ दोयम या अमानवीय व्यव्हार रहा, लोगो को महसूस हुआ की हमारी इस दशा का कारण विदेशी शासन है जिसे दूर किऐ बिना इस अन्याय से छुटकारा नहीं मिल सकता , इससे पहले जब भी कभी एक शासक को हटा कर दूसरा शासक आया तो वो उसी देश का होकर रह गया मगर यूरोपीय सिर्फ उन देशो और वहाँ के लोगो का उपयोग करने आऐ, जिससे लोगो के मन में ये धारणा पैदा हो गई कि ये शासक तो विदेशी है . जर्मनी के एकीकरण के बाद यूरोप में जर्मनी एक बड़ी शक्ति के रूप मे उभरा पर तब तक दूनिया भर में ब्रिटेन तथा अन्य देशो ने कब्जा कर लिया था. We want space under the Sun के नारे के साथ जर्मनी भी उपनिवेश हासिल करने की होड़ में लग गया, इस होड़ की वजह से यूरोपीय देश कई यूद्धो में उलझ गऐ और दो विश्वयूद्ध भी दूनिया को सहने पड़े. यूरोपीय शक्तिया क्षीण हुई और उपनिवेश देशो को स्वशासन का अवसर मिला । भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में देखा जाऐ तो ब्रिटिश काल से पहले राष्ट्र की अवधारणा नजर ही नही आती, सदीयों तक विदेशी हमलावर यहाँ आते रहे और फिर यहीं के होकर रह गऐ, जैसे मुस्लिम हमलावर शासक यहीं बस गऐ और भारतीय मुसलमान कहलाऐ, इस से पहले शक, कुषाण तथा और भी जितने हमलावर आऐ वे भारतीय होकर ही रह गऐ, विभिन्न राजाओ में आपसी संघर्ष और अधिकाधिक क्षेत्र को अपने आधीन करने की लालसा तो थी पर जनता के मन में कोई राष्ट्रवाद जैसी चीज नही थी, क्षेत्रवाद सदैव चरम पर रहा. औरंगजेब जैसे कुछ बहुत कट्टर मुस्लिम शासको के दूसरे धर्म पर किऐ गऐ जुल्मो के कारण प्रजा में असंतोष बढ़ा और यही अंसतोष उन के साम्राज्य के पतन का कारण बनें, पर जब ब्रिटिश भारत के शासक बने उन्होने भारत व भारतीय लोगो को हेय दृष्टि से देखा, यहीं से भारतीय राष्ट्रवाद का जन्म हुआ और विभिन्न प्रांतो, धर्मो और विभिन्न भाषाओ को बोलने वाले लोग एक साथ आजादी के संघर्ष में साथ आये, धर्म के आधार पर एक देश पाकिस्तान का जन्म हुआ और दूनिया के इतिहास में पहली बार एक देश की सीमा के साथ ही लोग भी बंट गए।भारतीय सविंधान ने देश को धर्मनिरपेक्ष देश का दर्जा दिया, भारत भारतीयो के लिए। अब यकीनन भारतीयता की ही बात होनी चाहिए। यही हमारी राष्ट्रीयता है और पहचान भी।

(लेखक सुप्रसिद्ध शिक्षाविद और उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के सदस्य है)

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राष्ट्रवाद , राष्ट्रीयता और राष्ट्र - डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी
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