पुष्यमित्र शुंग (भाग 2) - अश्वमेध यज्ञ

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राज्याभिषेक के पूर्व हुए पुष्यमित्र के विवाह समारोह में केवल नगर के कुछ चुनिन्दा और विश्वस्त लोगों को ही आमत्रित किया गया था | लेकिन...



राज्याभिषेक के पूर्व हुए पुष्यमित्र के विवाह समारोह में केवल नगर के कुछ चुनिन्दा और विश्वस्त लोगों को ही आमत्रित किया गया था | लेकिन उन लोगों में से भी एक ने उनकी ह्त्या का प्रयत्न किया | दरअसल मृतक राजा ब्रहद्रथ के तीन विवाह हुए थे, उनमें से दूसरी रानी सौम्या के पिता वीरभद्र मगध की सेना में ही सेनानायक के पद पर थे | ब्रहद्रथ के मारे जाने के बाद अन्य रानियों के समान सौम्या को भी राजमहल खाली करना पड़ा तथा वह बौद्ध धर्मगुरू के मठ में जाकर भिक्षुणी हो गई | लेकिन मन में प्रतिशोध की ज्वाला धधकती रही | उसने ही बादरायण की सलाह पर अपने पिता के घर जाकर तब तक अनशन किया, जब तक कि पिता ने पुष्यमित्र की ह्त्या के षडयंत्र में शामिल होने की स्वीकृति नहीं दे दी | 

अब समस्या यह थी कि पिता वीरभद्र को तो विवाह समारोह में निमंत्रित ही नहीं किया गया था, अतः एक व्यापारी का अपहरण किया गया, और उसके निमंत्रण पत्र पर वीरभद्र विवाह समारोह में शामिल हुआ | लेकिन सौम्या की माँ को ही यह गतिविधि पसंद नहीं आई और उसको लगा कि बेटी के कारण यह तो मेरे सुहाग के प्राणों पर संकट आ गया है | उसने जाकर वधू अरुंधती को इस षडयंत्र की जानकारी दे दी, साथ ही अपने पति की जीवन रक्षा की प्रार्थना भी की | परिणाम स्वरुप विवाह समारोह में भेंट देते समय जैसे ही वीरभद्र ने एक कटार से पुष्यमित्र पर प्रहार करना चाहा, सजग अरुंधती ने उसका हाथ पकड़ लिया | आनन फानन में सैनिकों ने आक्रमण कारी को गिरफ्त में ले लिया | 

डेमेट्रियस को पराजित कर न केवल मगध की सीमाओं से, बल्कि समूचे आर्यावर्त से बाहर खदेड़ने वाले महानायक पुष्यमित्र के राज्यारोहण समारोह में सभी राजाओं को आमंत्रित किया गया | विदर्भ, आंध्र और कलिंग को छोड़कर शेष सभी राजा समारोह में सम्मिलित भी हुए | विदर्भ की राजधानी साकेत पर डेमेट्रियस द्वारा किये गए हमले के दौरान पुष्यमित्र द्वारा की गई सहायता के बावजूद वहां के राजा के मन में पुष्यमित्र के प्रति सद्भाव नहीं था | विदर्भ चन्द्रगुप्त व अशोक के काल में मगध साम्राज्य का ही अंग था, किन्तु बाद में जब कमजोर शासक बने तो उसने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया था | पुष्यमित्र की बढ़ती शक्ति को देखकर राजा यज्ञसेन को भय था कि कहीं उसे राज्यच्युत न होना पड़े | 

खैर राज्यारोहण समारोह के बाद महर्षि पतंजलि ने सभी उपस्थित राजाओं के साथ चर्चा की | महर्षि ने राजाओं से कहा कि हिमालय से हिन्द महासागर तक फैला यह देश भौगोलिक व सांस्कृतिक द्रष्टि से एक है | यहाँ के निवासियों का जीवन दर्शन एक समान है | अतः विदेशी आक्रमणकारियों से बचने के लिए सबको एकता के सूत्र में बंधकर रहना अत्यावश्यक है | एक सूत्र का अर्थ यह नहीं है कि सब एक ही राजा के अधीन हो जाएँ | आचार्य चाणक्य के मार्गदर्शन में चन्द्रगुप्त मौर्य व सम्राट अशोक के कार्यकाल में सब नरेश उन्हें कर देते थे और उनकी आज्ञा का पालन करते थे | किन्तु इस व्यवस्था के चलते राज्यों की स्वतंत्रता कम हो गई थी | अतः आज समय की मांग है कि देश के सभी राजा अपने आप में स्वतंत्र हों, किन्तु किसी एक पर भी यदि कोई बाहरी शत्रु आक्रमण करे, तो सभी एक योग्य राजा के नेतृत्व में मिलकर उसका मुकाबला करें, ताकि कोई विधर्मी विदेशी शत्रु हम पर शासन करने न आ पाए | मेरा प्रस्ताव है कि देश में पुनः पूर्वकाल की चक्रवर्ती राजा वाली प्रथा चलाई जाए | महर्षि द्वारा प्रतिपादित चक्रवर्ती राजा और सम्राट के अंतर की व्याख्या इतनी स्पष्ट थी कि किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई | मगध राज्य को चक्रवर्ती राज्य की उपाधि देने हेतु अश्वमेध यज्ञ की योजना भी उसी सभा में सुनिश्चित हो गई | 

इधर देश को सुरक्षित और समर्थ बनाने की कार्य योजना चल रही थी तो बादरायण इन राष्ट्रपुत्रों को नीचा दिखाने की अपनी उधेड़बुन में जुटे हुए थे | विधवा रानी सौम्या और उसके पिता को प्राणदंड के स्थान पर देश निकाला दिया गया, क्योंकि मां ने ही पुष्यमित्र की हत्या की योजना को बताकर नई महारानी से दया याचना की थी | किन्तु सौम्या के मन का दुर्भाव समाप्त नहीं हुआ था | यह परिवार मगध की सीमा के बाहर विदर्भ राज्य में रहने लगे | वहां के राजा यज्ञसेन ने भी वीरभद्र को मगध का दुश्मन मानकर उसे अपनी सेवा में ले लिया | 

नियत समय पर अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ हुआ और विधि विधान से अश्व को छोड़ा गया | सभी राजाओं को यह सन्देश भी भेज दिया गया कि मगध राज्य ने यवनों को देश से बाहर निकालकर यह सिद्ध कर दिया है कि यह राज्य देश और समाज का नायक बनने योग्य है | जो भी राज्य इस बात से सहमत हैं उन्हें हमारा समर्थन करते हुए अश्व को अपनी सीमा से सकुशल जाने देना चाहिए | अश्व की रक्षा हेतु मात्र दस सैनिक साथ रहेंगे | असहमत राज्य चाहें तो अश्व को पकड़ सकते हैं, उनसे अश्व छुडाने हेतु हम सेना भेजेंगे | इस सन्देश के प्रतिउत्तर में देश के अधिकाँश राज्यों से वधाई सन्देश प्राप्त हुए, केवल उन्हीं तीन राज्यों ने उत्तर नहीं दिया, जो राज्याभिषेक में भी सम्मिलित नहीं हुए थे | 

अश्व निर्विघ्न सभी राज्यों में घूमता रहा किन्तु जब वह विदर्भ में आया तो एक रात अकस्मात गायब हो गया | विदर्भ के कुटिल राजा में सीधे चुनौती देने की तो हिम्मत नहीं थी, किन्तु वह मगध के प्रयत्नों को भी असफल करना चाहता था, अतः उसने बौद्ध महाप्रभु बादरायण की सम्मति से सौम्या के पिता वीरभद्र को अश्व चुराने की जिम्मेदारी दी और कहा कि अश्व को एक स्थान पर सुरक्षित रखा जाए | अगर युद्ध हो और विदर्भ की पराजय होती दिखे तो अश्व को मार दिया जाए | 

विदर्भ की सीमा में अश्व के गायब होने का समाचार मिलने पर राजा यज्ञसेन से पूछा गया, तो योजनानुसार उसने अनभिज्ञता जता दी और जबाब भेजा, हमने अश्व को पकड़ा नहीं है, वह कहाँ है यह हमें ज्ञात नहीं है, हम उसकी पहरेदारी करने को बाध्य नहीं थे |इस उत्तर के पहुँचने पर मगध की सेना ने विदर्भ पर तीन ओर से हमला कर दिया, प्रत्येक सैन्यदल पचास पचास हजार सैनिकों का था तभी यज्ञसेन का भतीजा माधवसेन भी मगध सेनापति से आकर मिल गया व उसके सहयोग से न केवल विदर्भ की सेना पराजित हुई, बल्कि यज्ञ का अश्व भी सकुशल मिल गया | युद्ध में षडयंत्रकारी राजा यज्ञसेन व अश्व चुराने वाला वीरभद्र भी मारा गया | विदर्भ का हश्र देखकर आंध्र व कलिंग राज्य ने भी मगध को चक्रवर्ती स्वीकार कर लिया | मगध का सहयोगी माधव सेन अब विदर्भ का राजा बन गया | 

यज्ञ सफलता पूर्वक संपन्न हुआ | पूर्णाहुति पर महर्षि पतंजलि ने सभी उपस्थित नरेशों को नवयुग के आगमन की वधाई देते हुए कहा कि हम बौद्धमत को भी भारत की अनेक जीवन मीमांसाओं में से एक मानते व उसका आदर करते हैं | प्रत्येक व्यक्ति को अपना मार्ग चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता है | परन्तु सम्पूर्ण समाज को किसी भी एक जीवन मीमांसा को अपनाने के लिए बलपूर्वक विवश नहीं किया जा सकता | राज्य संचालन में तो यह किया जाना कतई व्यवहारिक नहीं है | ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हम भारतवासियों को सुमति और शक्ति दे, जिससे हम अपने देश को स्वतंत्र, सबल और समृद्ध बनाने में सफल हों | 

आईये हम भी ईश्वर से वही प्रार्थना करें, क्योंकि वह सार्वकालिक सर्वाधिक उपयुक्त प्रार्थना है |

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पुष्यमित्र शुंग (भाग 2) - अश्वमेध यज्ञ
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