इस महायुद्ध में बहुत कमजोर दिख रहे है कुछ अहम मोर्चे - संजय तिवारी


यह महायुद्ध अब अपने उभार पर है। विश्व रहेगा कि कैसे रहेगा , यह भी चिंता में शामिल हो गया है। धरती के अत्यंत शक्तिशाली भूपति भी बेहद डरे हुए हैं। राष्ट्रों के लिए अर्थ और समाज के अस्तित्व का संकट चिंता में डाल रहा है। ऐसे में भारत जैसे राष्ट्र के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह हर मोर्चे पर मजबूत रहे । लेकिन यहां तो कई मोर्चे बेहद कमजोर दिख रहे हैं। ऐसे में भारत की संस्कृति, सभ्यता और इसके अर्थ को बहुत नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके लिए सत्ता शीर्ष को बहुत तेजी से सतर्क हो जाना चाहिए। 

एक बड़े महत्वपूर्ण मोर्चे की बहुत बड़ी कमजोरी से देश रूबरू हो रहा है। विदेशों में स्थापित भारत के दूतावासों की कार्य प्रणाली ने चिंता बढ़ाई है। जब देश पिछले छह महीनों से एक खास किस्म के झंझावात झेल रहा था, जे एन यू से लगायत जामिया और अलीगढ़ तक मे बिना किसी वजह के आग लगी थी, शाहीन बाग और चौक में अनावश्यक धरने चल रहे थे, नागरिकता संशोधन के बाद से ही देश मे कुछ अंदरूनी और काफी बाहरी ताकतें लगातार भारत विरोध में जुटी थीं, दिल्ली दंगो की चपेट में थी, 54 लोग मारे जा चुके थे जिनमें दो सरकारी कर्मचारी भी थे, ऐसे माहौल में विदेशों से भारत मे पर्यटन के लिए एक खास समुदाय के लोगो को बीजा जारी करने की जल्दी क्या थी? 

यह प्रश्न आज बहुत बेचैन करने वाला है। देश जिस कठिन दौर से गुजर रहा है , हमारे प्रधानमंत्री को मन की बात में अपने लोगो से माफी मांगने की नौबत आ गयी है, ऐसे में आखिर कौन लोग हैं जो चूक पर चूक किये जा रहे हैं। वे कौन लोग हैं जिनको इस दशा का जरा भी भान नही। उन्हें क्यो नही अभी तक समझ मे आया कि बाजार और सभ्यताओं के इस अति आधुनिक महाभारत में सबसे बड़ी कीमत भारत को ही चुकानी पड़ेगी, यदि ऐसे ही चूक होती रही तो। यह तो सामान्य जानकारी की बात है कि टूरिस्ट्स बीजा से आकर कोई भी किसी मजहबी आयोजन का हिस्सा नही बन सकता लेकिन देश की छाती पर ऐसा हुआ। सवाल तो उन एजेंसियों की कार्य शैली पर भी उठा है जिनको इस प्रकार की गतिविधियों को रोकने और जानकारी देने की जिम्मेदारी होती है। 

दुख इस बात का है कि पूरे देश ने तो अपने नेता, नायक के एक एक शब्द का पालन किया है लेकिन सत्ता के शहर को ही शायद कुछ सुनाई नही पड़ा। संसद में नागरिकता कानून पास हुआ । संसद भी दिल्ली में ही है लेकिन जामिया और जेएनयू से लेकर शाहीन बाग तक सब दिल्ली में ही हुए। दंगा दिल्ली में ही हुआ। दो कर्मचारियों की बेरहमी से हत्याएं दिल्ली में ही हुई और लाखों मजदूरों का अचानक पलायन भी दिल्ली में ही हुआ। 

अब दिल्ली के केंद्र में तब्लीगी मरकज । आखिर हो क्या रहा। दिल्ली क्या भारत का हिस्सा नही रह गयी ? दिल्ली इतनी बेलगाम कैसे हो गयी ? क्या यह सब भारत की जिम्मेदारी सम्हालने वाली एजेंसियों की चूक नही है?

जिस तरह से प्रधानमंत्री ने मन की बात के माध्यम से अपनी पीड़ा व्यक्त की तथा असुविधाओं के लिए क्षमा याचना की , वह उनके बहुत बड़े मन का प्रमाण है लेकिन सत्ता की जमीन पर ही शीर्ष इतना मजबूर क्यो? यह सवाल तो हर जिम्मेदार नागरिक के मन मे उठाना स्वाभाविक है। कोरोना के इस महा समर में साथ देने के लिए सभ्यता के इतिहास में पहली बार हुआ है कि सभी मंदिरों के कपाट बंद है। सबसे बड़े आध्यात्मिक पर्व नवरात्र और राम नवमी पर कहीं कोई आयोजन तक नही। अयोध्या में परिक्रमा बंद। काशी में दर्शन बंद। शक्तिपीठो पर दर्शन बंद, गुरुद्वारों के लंगर बंद, कल, कारखाने, स्कूल, कॉलेज, विभवविद्यालय सभी कुछ बंद। फिर भी दिल्ली की एक मस्जिद में हजारों लोग जमा हुए जिनमे सैकड़ो विदेश से आये, वह भी पर्यटक बीजा लेकर। आखिर कोई न कोई है जो यह सब होने देने में सहयोग कर रहा है। जब देश मे पिछले छह महीने हर जगह यह बात खुले तौर पर कही जा रही है कि भारत मे अस्थिरता के पीछे विदेशी, बाहरी ताकतें लगी है तो ऐसे माहौल में विदेशी मुसलमानों को बीजा देकर भारत दर्शन कौन करा रहा है भाई? 

सवाल तो बहुत से हैं लेकिन ये सवाल तो सोने ही देते। देश जिस संकट से गुजर रहा है उसका आभास सभी को क्यो नही हो रहा। क्यो कुछ लोगो को सब इतना आनंददायी दिख रहा है। खास कर दिल्ली को लेकर जो सवाल पैदा हुए हैं वे बेहद डरावने हैं। जिन ताकतों ने इन सवालों को जन्म दिया है उन पर काबू पाना ही होगा वर्ना हालात बहुत बिगड़ जाएंगे। आखिर सबको यह क्यो नही दिख रहा कि दुनिया के बड़े बड़े महारथी इस युद्ध मे पछाड़ खाकर गिर पड़े है। अमरीकी सदर डोनाल्ड ट्रम्प वहां अब दो लाख मौतों की भविष्यवाणी कर खुद को ऊपर वाले के भरोसे पर ला चुके है। कनाडा के प्रधानमंत्री ने कहा है कि पहले लोगो को बचाना जरूरी है, आर्थिक गुना भाग बाद में देखेंगे। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने थक हार कर अब ईमान के सहारे देश को छोड़ दिया है। इटली में लाशें दफनाने की फुरसत नही है। एक भारत ही है जिसके नेता को अपनी संस्कृति, सभ्यता, अपने लोग और अपनी तरकीब पर यकीन है। इसीलिए वह बार बार जनता के बीच आकर अपनी बात सीधे कह रहे हैं। ऐसे में यह तबलीग और बीजा का खेल ? 

याद कीजिये पुलवामा के समय भी एक मोर्चे की लापरवाही को देश अपने 56 जवानों को गवाकर झेल चुका है। उस बार भी फंसे हुए जवानों की एयर लिफ्टिंग के अनुरोध का पत्र किसी मेज पर अनदेखी का शिकार हो गया था। हालांकि वह सब हुआ लेकिन भारी कीमत चुकाने के बाद। इस बार की चूक उससे बहुत बड़ी है। 

क्रमशः

(लेखक भारत संस्कृति न्यास के संस्थापक एवं वरिष्ठ पत्रकार है )

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