प्रकृति के सन्देश को समझते श्री आदित्यनाथ योगी जी साधुवाद - दिवाकर शर्मा

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यूरोप का सूरज डूबने जा रहा !! यूनान मिश्र रोमां सब मिट गए जहाँ से, कोई बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ! यह पंक्तियाँ आज कोरो...


यूरोप का सूरज डूबने जा रहा !!
यूनान मिश्र रोमां सब मिट गए जहाँ से,
कोई बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी !

यह पंक्तियाँ आज कोरोना काल में और भी अधिक स्पष्ट रूप से सत्य सिद्ध होती प्रतीत हो रही हैं | मध्य युग में पूरे यूरोप पे राज करने वाला रोम अर्थात इटली नष्ट होने के कगार पे आ गया, मध्य पूर्व को अपने कदमो से रौंदने वाला ओस्मानिया साम्राज्य अर्थात ईरान, सऊदी, टर्की अब घुटनो पर हैं, जिनके साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, उस ब्रिटिश साम्राज्य के वारिस बकिंघम पैलेस में कैद हैं ! जो स्वयं को आधुनिक युग की सबसे बड़ी शक्ति समझते थे, उस रूस के बॉर्डर सील हैं, जिनके एक इशारे पर दुनिया के नक़्शे बदल जाते हैं, जो पूरी दुनिया के अघोषित चौधरी माने जाते हैं, उस अमेरिका में लॉक डाउन है और जो आने वाले समय में सब को निगल जाना चाहता था, वो चीन, आज मुँह छिपाता फिर रहा है और सब की गालियां खा रहा है।

एक छोटे से जीव ने घरो में कैद कर दिया, एक जरा से परजीवी ने विश्व को घुटनो पर ला दिया ! न एटम बम काम आ रहे न पेट्रो डॉलर ! मानव का सारा विकास एक छोटे से जीवाणु से सामना नहीं कर पा रहा ! उस जीवाणु का, जिसे संभवतः इन तथाकथित महाशक्तियों में से ही एक ने पैदा किया, दूसरों पर प्रयोग करने के लिए | और अब सारा विश्व विवश होकर अपना रहा है, भारतीय तौर तरीकों को | उस भारत के तौर तरीके, जिसका ये लोग सदियों तक अपमान करते रहे, जिसे रोंदते रहे, लूटते रहे। 

सूक्ष्म एवं परजीवियों से मनुष्य का युद्ध नया नहीं है, ये तो सृष्टि के आरम्भ से अनवरत चल रहा है, और सदैव चलता रहेगा, इस से लड़ने के लिए के लिए हमने हर हथियार खोज भी लिया था, मगर आपके अहंकार, आपके लालच, स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की हठ धर्मिता ने सब नष्ट कर दिया।

अंततः सभी इस तथ्य को स्वीकार करेंगे ही करेंगे कि इस आपदा से लड़ने का एक ही तरीका है और वह है पुरातन भारतीय जीवन शैली | वह जीवन शैली, जिसे सांसारिक वैभव को त्यागकर आंतरिक शांति की खोज करने वाले भारतीय ऋषि मुनियों, महावीर, गौतम बुद्ध ने बताया था और विश्व बंधुत्व का सन्देश दिया था | 

जीवहिं जीव अहारा का सिद्धांत नहीं, जीव में शिव को देखने वाले लोग थे भारतवासी । किन्तु दुर्भाग्य तो देखिये कि कोई विश्व विजेता बनने के लिए तक्षशिला को तोड़ कर चला गया, कोई सोने की चमक में अँधा होकर सोमनाथ लूट कर ले गया, तो कोई खुद को ऊँचा दिखाने के लिए नालंदा की किताबो को जला गया, किसी ने बर्बरता को जिताने के लिए शारदा पीठ के टुकड़े टुकड़े कर दिये, तो किसी ने अपने झंडे को ऊंचा दिखाने के लिए विश्व कल्याण का केंद्र गुरुकुल परंपरा को ही नष्ट कर दिया, और आज करुण निगाहों से देख रहे हैं, उसी पराजित, अपमानित, पद दलित, भारत भूमि की ओर |

विनाशकाल तो अभी शुरू हुआ है, जैसे जैसे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी, ग्लेशियरो की बर्फ पिघलेगी, और आज़ाद होंगे लाखो वर्षो से बर्फ की चादर में कैद दानवीय विषाणु, जिनका न आपको परिचय है और न लड़ने की कोई तैयारी, ये कोरोना तो झांकी है, चेतावनी है, उस आने वाली विपदा की, जिसे आपने जन्म दिया है । ग्लोबल बार्मिंग भी तो आधुनिक भौतिक वाद की ही देन है | औद्योगिक क्रांति और ग्लोबल इकोनॉमिक्स संसार को अंत के मुहाने पे ले आयी है !

क्या आप जानते हैं, इस आपदा से लड़ने का तरीका कहाँ छुपा है ?

मार्ग उन्ही नष्ट हुए हवन कुंडो से निकलेगा, जिन्हे कभी आपने अपने पैरों की ठोकर से तोड़ा था। आपको उसी नीम और पीपल की छाँव में आना होगा, जिसके लिए आपने हमारा उपहास किया था। आपको उसी गाय की महिमा को स्वीकार करना होगा, जिसे आपने अपने स्वाद का कारण बना लिया। उसी चन्दन तुलसी को मस्तक पर धारण करना होगा, जिसके लिए कभी हमारे मस्तक धड़ से अलग किये गए थे | शहरी चकाचोंध से दूर होकर ग्रामीण सरलता की ओर आना ही एकमात्र उपाय सिद्ध होगा |

ये प्रकृति का न्याय है और इसे सभी को स्वीकारना होगा। अभी तो जीने की चाह में हाथ जोड़कर अभिवादन करना आपने शुरू कर दिया है, खाने से पहले, खाने के बाद ही नहीं तो दिन में दस बार हाथ धोना शुरू कर दिया है, हाइजीनिक कारणों से ही सही एक दूसरे का झूठा खाना बंद कर दिया है | ये वे ही बातें हैं, जिनको लेकर आप भारतवासियों का मजाक बनाया करते थे | किन्तु अब बहुत जल्दी भारत की छांव में पूरी तरह आपको आना पड़ेगा |

"सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,
मा कश्चिद् दुःख भाग् भवेत्"

कोरोना लॉक डाउन का तात्कालिक प्रभाव ही सही, भौतिकवादिता का सूरज डूबता दिख रहा है, कलकल बहती नदियाँ स्वच्छ होने लगीं हैं, वनों की अंधाधुंध कटाई बंद प्राय है, मोटर कारों और फैक्ट्रियों का काला धूंआं पर्यावरण का विनाश नहीं कर रहा है, इसे स्थाई बना दीजिये तो ही मानव बचेगा, अन्यथा तो पुराण वर्णित महाप्रलय आएगा ही आयेगा, उसे कौन रोक पायेगा ? 

शायद प्रकृति के इस सन्देश को समझकर ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री आदित्यनाथ योगी ने महानगरों से वापस लौटे मजदूरों को ग्रामीण उनके अपने अंचल में काम दिलाने और वापस महानगरों में जाने से रोकने की पहल की है | वे निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं | देश के शेष मुख्यमंत्रियों को भी उनका अनुशरण करना चाहिए | इससे निश्चय ही बड़े बड़े कारखानों के सम्मुख बंद होने का खतरा उत्सेपन्न होगा, किन्तु उससे भी दीर्घकालीन लाभ ही होगा | जहाँ एक ओर पर्यावरण प्रदूषण पर लगाम लगेगी, बहीं दूसरी ओर बड़े औद्योगिक घरानों को महानगरों के स्थान पर नगरों और कस्बों में लघु उद्योग स्थापित करने को विवश होना पड़ेगा | अगर अब ग्रामीण जनों के नगरों की ओर भागने के स्थान पर, महानगरों के बड़े लोग गाँवों की ओर रुख करने को विवश हों, तो यह तो भारत के दीर्घकालीन हित में ही सिद्ध होगा |

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क्रांतिदूत: प्रकृति के सन्देश को समझते श्री आदित्यनाथ योगी जी साधुवाद - दिवाकर शर्मा
प्रकृति के सन्देश को समझते श्री आदित्यनाथ योगी जी साधुवाद - दिवाकर शर्मा
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