एक माचिस इम्पोर्टर कैसे और क्यूं बना भारत का महान उद्योगपति ?

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स्वामी विवेकानंद, जमशेदजी टाटा, बाबा रामदेव



आज के सोशल मीडिया काल में यह कोई ढका छुपा तथ्य नहीं है कि हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड ब्रिटेन के दो भाईयों “लीवर ब्रदर्स” की कंपनी है जिन्होंने अपनी कम्पनी महज इसलिए शुरू की थी, ताकि गुलाम भारत में रहने वाले अंग्रेजों के लिए नहाने के साबुन मुहैय्या कराये जा सकें | वे केवल इंग्लेंड से मंगाकर साबुन सप्लाई करते थे, बनाते फनाते कुछ नहीं थे | किन्तु 1898 में सबसे पहले मेरठ में इन भाईयों ने नहाने का साबुन बनाने की फेक्ट्री लगाई, जोकि सिर्फ अंग्रेजों को और राजे महाराजाओं को ही दिया जाता था, यह आम जनता के लिए मुहैया नहीं था । यहाँ तक कि ब्रिटिश सेना में भी जो हमारे भारतीय सैनिक थे उन्हें हर महीने एक साबुन ही दिया जाता था.! 

शायद इसीलिए देश की तात्कालिक स्थिति पर क्षोभ व्यक्त करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था – “फिलहाल अपने धार्मिक रीति रिवाजों को एक ओर रखकर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करो | विदेशों के लोग आपके देश से मिले कच्चे माल के दम पर अपने भविष्य को उज्वल बना रहे हैं और आप बोझ ढोने बाले जानवरों की भाँती उनका बोझ ढो रहे हैं | विदेशी लोग भारत से कच्चा माल लेकर अपनी सूझबूझ से विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन कर अपना वर्चस्व कायम कर रहे हैं, जबकि आप अपनी बुद्धि के द्वार बंद कर अपनी पुस्तैनी संपदा उन पर लुटा रहे हैं | और भोजन के लिये अन्य देशों के सामने गुहार लगाते फिरते है |” 

सन १८९३ में स्वामी विवेकानंद जब पानी के जहाज द्वारा जापान से अमेरिका जा रहे थे, तभी संयोग से उनकी भेंट जमशेद जी नौसेर्वान जी टाटा से हुई | उन दिनों तक टाटा जापान से माचिस मंगाकर भारत में बेचते थे | स्वामी जी ने टाटा को परामर्श दिया – तुम जापान से माचिस का आयात क्यों करते हो ? यदि आप इसका उत्पादन भारत में ही करोगे तो आपको भी ज्यादा लाभ होगा और अन्य लोगों को रोजगार भी मिलेगा, साथ ही देश का पैसा भी देश में ही रहेगा | 

स्वदेशी के इस विचार का प्रस्फुरण होने के बाद तो टाटा ने स्वदेशी उत्पादों की झडी लगा दी | स्वामी जी के विचारों के अनुरूप चलते हुए ही आगे चलकर टाटा ने जमशेदपुर स्टील प्लांट की आधारशिला रखी | जमशेद जी ने अपनी संपत्ति का एक भाग विज्ञान संस्थान आरम्भ करने के लिए दिया, जो आज बेंगलोर में इन्डियन इंस्टीटयूट ऑफ़ टेक्नोलोजी के नाम से प्रख्यात है | यह संस्थान खोलने के पहले उन्होंने स्वामी जी को पत्र लिखा – 

प्रिय स्वामी विवेकानंद, 

मुझे विश्वास है कि आप जापान से शिकागो की यात्रा के दौरान परिचित हुए अपने इस सहयात्री को भूले नहीं होंगे | मुझे आज भी भारत की तपोभूमि पर विकास हेतु सही दिशा देने बाले आपके विचार स्मरण हैं | 

मैंने इसी विचारधारा का समावेश भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में किया है, जिसके बारे में आपने जरूर पढ़ा या सुना होगा | मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस तपस्वी भावना के बेहतर प्रयोग के लिए इस भावना से अभिभूत पुरुषों के लिए मठों और आश्रमों की स्थापना से अच्छा और कोई विकल्प हो ही नही सकता | जहां वे एक सादगी भरा जीवन जीते हुए प्राकृतिक व मानवीय विज्ञान की जड़ों को मजबूत बनाएं | मेरे विचार से इस प्रकार के कल्याणकारी अभियान का नेतृत्व एक सक्षम व्यक्ति के हाथों में होना चाहिए, जो देश के तपस्वी संस्कारों और विज्ञान को साथ साथ लेकर चल सके | मुझे मालूम है कि वह व्यक्ति विवेकानंद के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता | क्या आप इस मिशन की रहनुमाई करने पर विचार करेंगे ? शायद इसके लिए सबसे पहले आपको लोगों में जोश का संस्कार करना होगा, जिसके लिए हम पर्चे बाँट सकते हैं | इसके प्रकाशन पर तमाम व्यय करने में मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी | 

२३ नवम्बर १८९८ 

जमशेद जी एन. टाटा 

यह पत्र स्वामी जी के कार्यों और विचारों का वास्तविक स्वरुप प्रस्तुत करता है, साथ ही उनके योगदान को भी प्रतिविम्वित करता है | एक स्वाभिमान संपन्न समुन्नत आत्म निर्भर भारत स्वामी जी का स्वप्न था | स्वामीजी के विचारों के अनुरूप चलते हुए टाटा ने मैसूर के शासक कृष्‍णा राजा वाडियार से मुलाकात की और उनसे कहा कि आप एक स्वदेशी साबुन फैक्ट्री लगाएँ और एक फैक्ट्री मैं लगाता हूँ। साबुन का फार्मूला मैं आपको देता हूँ। तब मैसूर के राजा ने 1916 में बेंगलुरु में मैसूर सैंडल सोप कंपनी की स्थापना की और पहला स्वदेशी साबुन भारत में बना। मगर उस समय प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था इसलिए इसकी बिक्री 1918 में हुई..! 

इस साबुन की खासियत है कि इससे अगर एक बार कोई नहाले तो 2 दिन तक इस साबुन की महक उसके शरीर से नहीं जाती है, क्योंकि यह चंदन से बना साबुन है और आज भी ब्रिटेन की महारानी इसी साबुन से नहाती हैं। यह भारत का लग्जरी शाही साबुन है..! 

प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में त्वचा संबंधी रोग फैला था, इसी को ध्यान में रखकर 1918 में ही जमशेद जी टाटा ने केरल में नीम का साबुन बनाया, उसका नाम बाद में हमाम पड़ा । जमशेद टाटा ने उस वक्त यह साबुन गरीबों को मुफ्त बांटे थे ताकि वह बीमारी से ठीक हो जायें। 

मैसूर सैंडल सोप और टाटा द्वारा निर्मित हमाम साबुन उस वक्त ही भारत में इतने ज्यादा बिके कि लीवर ब्रदर्स कंपनी को लाखों रुपए का नुकसान हुआ । यहाँ तक कि यह दोनों साबुन इतने प्रसिद्ध हुए कि भारत से एक्सपोर्ट होने लगे.! 

जमशेद टाटा दूरदर्शी व्यक्ति थे। वे भारत को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। एक बार की बात है कि जमशेद जी टाटा विदेश गए थे तो उन्हें होटल में नहीं रुकने दिया गया, क्योंकि वे काले भारतीय थे, जबकि होटल गोरे अंग्रेज का था। मजबूरी वश उन्हें विदेश में सड़क पर सोना पड़ा। 12 दिन विदेश में रुकने के बाद भारत आकर उन्होंने सबसे पहला काम किया होटल बनाने का, जो मुंबई में आज भी ताज होटल के नाम से विख्यात है.! यह देश का पहला होटल था, जिसमें बिजली थी, हर कमरे में पंखे अमेरिका से मंगवा कर लगाए थे.! 

भारत में पहली कार भी जमशेद जी टाटा ने ही खरीदी थी और भारत में पहला आवागमन का साधन बस और ट्रक टाटा ने ही भारत को दिया है। जमशेद जी टाटा ने टाटानगर में स्टील बनाने का कारख़ाना भी लगाया था। इस शहर का नाम आज उन्हीं के नाम पर “जमशेदपुर” है और बोलचाल में टाटानगर भी कहा जाता है। इसके अलावा नागपुर में हिंदुस्तान की पहली स्वदेशी कपड़ा मिल 1885 में प्रारंभ की जो एम्प्रेस मिल के नाम से जानी जाती है। टाटा ग्रुप द्वारा स्थापित सारी फ़ैक्टरी आज भी चल रही है। कोई भी बंद नहीं हुई। समय समय पर टेक्नॉलजी का नवीनीकरण जरूर किया जाता है। लेकिन इसके कारण भी टाटा ग्रूप अपने किसी कर्मचारी को नहीं निकलता है ना ही छटनी करता है। यही टाटा ग्रूप की ख़ास विशेषता है। 

टाटा परिवार के द्वारा किये गए कई कार्यों में से एक मुंबई का “जे जे हॉस्पिटल” भी है। यह 1838 में बना भारत का दूसरा मेडिकल कालेज और हॉस्पिटल है। इस हॉस्पिटल को 169 साल हो गए हैं। इसे “जमशेदजी जिजिभोय” ने बनवाया था। इसलिए इसे “JJ” Hospital कहते है। 

आज लोग चाहे बाबा रामदेव का कितना भी मजाक क्यूं न उड़ाएँ, मगर यह सत्य है कि जमशेद जी टाटा के बाद विदेशी कंपनियों को टक्कर रामदेव बाबा ने ही दी है। जब भी भारत पर संकट आता है तब भारत के व्यापारी और भारतीय कंपनियां ही मदद के लिए आगे आती हैं। क्योंकि वे इस देश को प्यार करते हैं, इसे अपना मानते हैं | अतः आप सभी से विनती है कि स्वदेशी अपनाएं और भारत को आत्मनिर्भर बनाने में सहयोग करें। 

जय हिन्द 

जय भारत

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क्रांतिदूत: एक माचिस इम्पोर्टर कैसे और क्यूं बना भारत का महान उद्योगपति ?
एक माचिस इम्पोर्टर कैसे और क्यूं बना भारत का महान उद्योगपति ?
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