परमेश्वर और विज्ञान - राजेश्वर खरे

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संपूर्ण सृष्टि जड़ और चेतन दोनों पदार्थों से मिलकर बनी है , यदि हम गंभीरता से सोचें तो पूर्ण रूप से कोई भी पदार्थ जड़ या चेतन नहीं ...



संपूर्ण सृष्टि जड़ और चेतन दोनों पदार्थों से मिलकर बनी है , यदि हम गंभीरता से सोचें तो पूर्ण रूप से कोई भी पदार्थ जड़ या चेतन नहीं है बल्कि उसमें कुछ ना कुछ जड़ता भी है और कुछ चेतनता भी है ।पदार्थ की जड़ता में चेतनता की कितनी मात्रा
है इस प्रकार उस पदार्थ को हम जड या चेतन के रूप में समझते हैं । यदि उसमें चेतन तत्व की मात्रा अधिक है तो वह पदार्थ चेतन कहा जाता है और यदि उसमें जड़ता अधिक है तो उसे हम जड़ पदार्थ कहते हैं । संपूर्ण रूप से यदि कोई चेतन पदार्थ है तो वह है केवल परमात्मा । किसी पदार्थ की चेतनता का अर्थ उसमे अंतर्निहित उर्जा से अवधारित होता है ।
यदि हम पदार्थों का विश्लेषण करें तो प्रत्येक पदार्थ सूक्ष्म कणों से मिलकर बनता है । इन सूक्ष्म कणोँ को हम अणु के नाम से जानते हैं यदि अणुओं को विभाजित किया जाए तो वह परमाणु में विभाजित हो जाते हैं । संसार का प्रत्येक पदार्थ इन्हीं परमाणुओं से मिलकर बना है ,जो कुछ भी दृश्य और अदृश्य है वह सभी परमाणुओं से मिलकर ही बनते हैं । परमाणु की संरचना का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है की परमाणु में भी तीन प्रकार के कण हैं जिन्हें हम इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के नाम से जानते हैं । विग्यान के अनुसार न्यूट्रॉन और प्रोटॉन परस्पर मिलकर परमाणु के केंद्र में स्थित होते हैं और इलेक्ट्रॉन निरंतर इस न्यूक्लियस के चक्कर काटते रहते है , किन्तु यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इलेक्ट्रॉन को चक्कर काटने के लिए प्रारम्भ मेआवश्यक ऊर्जा कहां से आती है इस ऊर्जा का क्या रहस्य है । संपूर्ण सृष्टि परमाणुओं से मिलकर बनी है इसलिए प्रत्येक परमाणु के लिए इलेक्ट्रॉन को संचालित करने के लिए एक अदृश्य आवश्यक ऊर्जा की आवश्यकता होती है यह ऊर्जा कहां से आती है कैसे काम करती है यह विज्ञान के लिए अभी रहस्य है ।
अध्यात्म मैं इन सब प्रश्नों का उत्तर प्राप्त हो सकता है जो भी अब तक प्रमाणों के आधार पर ज्ञात है उसे हम विज्ञान के नाम से जानते हैं परंतु जिन बातों का हमें कोई प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है उसे हम ऐसा नहीं कह सकते कि वह नहीं है , उसे नकार नहीं सकते , केवल इतना कहा जा सकता है कि पता नहीं वह है या नहीं है । अध्यात्म में ऐसी सब बातों पर विचार किया गया और विचारों तथा अनुभव के उपरांत कई अवधारणाएं दी गई हैं । जिन्हें प्राचीन ग्रंथों में बताया गया है , यदि उन ग्रंथों का ठीक प्रकार से अध्ययन हो सके तो हमें बहुत से ऐसे प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है कि जिन प्रश्नों का उत्तर अभी विज्ञान नहीं दे पा रहा , लेकिन कालांतर में विज्ञान भी उनका उत्तर उत्तर देने में समर्थ हो सकेगा ।
वैज्ञानिकों ने जुलाई 2014 में अद्भुत और विशाल प्रयोग किया उस प्रयोग से यह पता लगा कि इन सूक्ष्म कणों में एक कण ऐसा भी है जिसके विषय में अब तक कोई ज्ञान नहीं था जिसे गॉड पार्टिकल अथवा हिग्स बोसोन कण कहा गया , भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस के नाम पर यहां बोसोन शब्द जोड़ा गया है । गॉड पार्टिकल के कारण ही कणों में मात्रा की अवस्थापना होती है , यदि इन कणों में कोई मात्रा नहीं होती तो यह कण ना तो परस्पर विलयन (fusion) करेंगे और ना विखन्डन (fission )करेंगे और यदि करेंगे भी तो उनसे किसी नवीन पदार्थ की निर्मिति नहीं हो सकती है , इसलिए गॉड पार्टिकल एक अत्यंत महत्वपूर्ण अन्वेषण है यह सृष्टि के सभी पदार्थों में उपस्थित रहता है । गॉड पार्टिकल की अनुभूति तो होती है परंतु वह दृश्य नहीं होता इसके पश्चात भी वह सभी स्थानों पर उपस्थित रहता है इसलिए इसे गॉड पार्टीकिल कहा गया है । इससे यह स्पष्ट होता है की संपूर्ण सृष्टि में एक ऐसी ऊर्जा है जिसकी उपस्थिति भी सब जगह है और अनुभूति भी , लेकिन उसको अभी तक ठीक प्रकार से विज्ञान नहीं समझ पाया है । इससे यह स्पष्ट है कि यही एक परमेश्वर की निर्मिति है जिससे परम चेतनता की अवधारणा प्रमाणित होती है । नास्तिक जनों का कहना है कि ईश्वर एक कल्पना ही है क्योंकि वह ना तो दिखाई देता है और वह कहां रहता है उसके गुण क्या है इस संबंध में कोई प्रमाण नहीं है इसलिए ईश्वर का होना सही नहीं है । यहां मैं यह कहना चाहता हूं कि ऐसे ही अनेकों वस्तुएं हैं पदार्थ है जो ना तो दिखाई देते हैं और उनके विषय में अधिक जानकारी भी नहीं है और वह कहां रहते हैं इसकी भी कोई कल्पना नहीं है लेकिन केवल इस आधार पर क्या उनकी उपस्थिति को नकारा जा सकता है जैसे लकड़ी में आग कहां होती है , ठहरे हुए जल में कहां तरलता होती है विद्युत के तारों में दौड़ती हुई विद्युत कहां दिखाई इत्यादि ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे उनकी उपस्थिति की कल्पना की जा सकती है इसलिए यदि नास्तिकों को ईश्वर दिखाई नहीं देता है तो इस कारण ईश्वर को नकारा नहीं जा सकता है । जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं कि चेतनता की चरम अवस्था ऊर्जा होती है और ऊर्जा से ही सारा ब्रह्मांड संचालित होता है । कुछ विशेष परिस्थितियों में द्रव्यमान और ऊर्जा परस्पर परिवर्तित हो सकते हैं जिसको विज्ञान में निम्न समीकरण द्वारा दर्शाया गया है ।
E=mc×c
यहां E ऊर्जा का संकेतक है और m द्रव्यमान का, तथा c से प्रकाश का वेग इंगित किया गया है । इस प्रकार ऊर्जा और द्रव्यमान परस्पर एक दूसरे में रूपांतरित होते रहते हैं और नवीन पदार्थों का निर्माण और विनाश होता रहता है।
मेरे विचार से सृष्टि के पूर्व केवल ऊर्जा ही इस ब्रह्मांड मैं थी और उसी ऊर्जा के कारण अन्य पदार्थों की निर्मिति हुई इसीलिए हम कहते हैं की संपूर्ण ब्रह्मांड के निर्माता परमेश्वर ही हैं । श्रीमद भागवत में भगवान ने स्वयं कहा है कि -
श्रीभगवानुवाच
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम ।
पश्चादहम् यदेतच्च योअवशिष्येत सोअस्म्यहम् ।।

" प्रारम्भ मे ( सृष्टि के पूर्व ) मैं ही सत्तारूप मे यह सत् (स्थूल) , असत् (सूक्ष्म)और परम(अव्यक्त प्रकृति ) कुछ भी नहीं था । वर्त्तमान मे जो भी है वह मैं ही हू ।और प्रत्यक्ष के बाद जो शेष रह जाता है वह भी मैं ही हू ।"
हर आत्मा में परमात्मा का वास होता है ऐसा सब लोग कहते हैं इस कथन को यह विश्लेषण पूर्णरूप से प्रमाणित करता है क्योंकि जब जड तत्त्व मे भी ईश्वर का अंश है तो फिर चेतन तत्व में तो कोई संदेह ही नहीं रह जाता । क्योंकि परम ऊर्जा को हम परमेश्वर के नाम से जानते हैं । इस प्रकार हिंदू दर्शन के अनुसार कहा जाता है कि हर कण-कण में शंकर हैं इसका अर्थ यही है कि प्रत्येक परमाणु में ईश्वर की उपस्थिति गॉड पार्टिकल के रूप में निहित रहती है , इसलिए हर कण-कण में शंकर की अवधारणा प्रमाणित होती है । हिंदू धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि जो कुछ भी दृश्य और अदृश्य है वह सब ईश्वर का ही रूप है और अन्य सब मिथ्या है या वह माया के स्वरूप हैं , और माया केवल व्यक्ति को भरमाती है और उसकी कोई स्वयं स्थिति नहीं होती है इस कथन की पूरी तरह से पुष्टि ऊपर के विश्लेषण से होती है । गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में परमेश्वर के विषय में लिखा है कि
बिनु पग चले सुने बिनु काना ,
कर बिन कर्म करै बिधि् नाना ।
आनन रहित सकल रस भोगी ,
बिन वाणी वक्ता बड़ि जोगी ।।
हिंदू दर्शन के अनुसार ईश्वर की अनुभूति अनेकों स्वरूपों में की जा सकती है यह आपकी स्वयं की आस्था और मान्यता के ऊपर निर्भर करता है इसलिए हिंदुओं में परमेश्वर का स्वरूप एक निश्चित नहीं है यह व्यक्ति की स्वयं की चेतना का स्तर और आस्था पर निर्भर करता है । आप किस स्तर की उर्जा तक पहुंच सके हैं या आपकी योग्यता तथा आपकी दृष्टि ईश्वर के किस स्वरूप का दर्शन करना चाहती है उसको ईश्वर उसी स्वरूप में दिखाई दे सकता है क्योंकि ईश्वर एक परम ऊर्जा का स्वरूप है और ऊर्जा परस्पर रूपांतरित होती रहती है इसलिए किसी के हनुमान जी आराध्य होते हैं , किसी को राम , किसी को कृष्ण , और किसी को दुर्गा अथवा शिव । कहने का तात्पर्य है कि जिस व्यक्ति की जैसी इच्छा और भावना तथा ऊर्जा का स्तर होता है उसी प्रकार उसे ईश्वर की अनुभूति हो जाती है , इससे यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर केवल एक ही है लेकिन उसकी अनुभूति किसी भी रूप में अथवा अनेकों रूप में हो सकती है, इससे सगुण या साकार ब्रह्म की स्थिति की पुष्टि होती है । यदि परमेश्वर को हम मूल स्वरूप में पहचाने जो परम ऊर्जा का समुच्चय है तो उससे निराकार ब्रह्म की अवधारणा स्पष्ट होती है । गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहां है कि
" जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी " इसलिए हिंदू दर्शन के अनुसार बहु-देव -दर्शन मिथ्या नहीं है। हिंदू धर्म अथवा भारत का आध्यात्मिक दर्शन पूर्णरूप से विज्ञान पर आधारित है ,ज्यो ज्यो विज्ञान आगे बढ़ रहा है त्यो त्यो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की ही पुष्टि पूरी तरह से हो रही है । 

लेखक परिचय - प्रस्तुत आलेख के लेखक श्री राजेश्वर खरे पूर्व प्रशासनिक अधिकारी व मीसाबंदी रहे हैं | वर्तमान में झांसी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग संघचालक हैं | 

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