पराक्रमी सिक्खों के मूल प्रेरक तत्व - गुरू नानक देव

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नानक नाम जहाज है, चढ़ै सो उतरे पार 

जो श्रद्धा कर सेंवदे, गुर पार उतारणहार 

भाई गुरुदास जी ने लिखा – 

खड़ा इकते पैर ते, पाप संगि बहु भारा होआ, 

थम्मे कोई न साधु, बिनु साधु न दिसे जग बिचि कोआ | 

धर्म एक पैर से खड़ा है, वह भी पापों के भारी भार से त्रस्त है, कोई साधू ही सहारा दे सकता है, लेकिन साधू कोई दिखता नहीं | 

सो धर्म रूपी बैल ने गुहार लगाई – 

धर्म धऊल पुकारे तले खलोआ | 

उसकी पुकार सुनकर परमात्मा ने गुरू नानक देव को जगत में भेजा – 

सुणी पुकार दातार प्रभू, गुरू नानक जग माहिं पठायो | 

तो आईये गुरू नानक देव जी का सुमिरन करें – 

प्रारंभ में तो गुरू जी की जन्मतिथि को लेकर विवाद रहा, किन्तु अब यही मान्यता है कि उनका जन्म सम्बत १५२६ में कार्तिक सुदी पूर्णिमा को हुआ | जन्म के समय अलौकिक प्रकाश के बीच बालक को रोने के स्थान पर हंसते देख दाई भी अचंभित हो गई और जब ज्योतिषी पंडित हरदयाल को बताया तो उन्होंने भी पिता कालू मेहता जी को कहा – 

संगत करहिं, तरहिं भव सागर, सकल जगत महिहोईं उजागर, 

बहुर नरन को करहिं उधारा, नाम भगति दे दान उदारा | 

गोपाल पांधे के पास पिता ने अक्षर ज्ञान को भेजा, तो पांच वर्षीय बालक ने पट्टी पर लिखकर उसे ही धर्म का सन्देश दे दिया, ननकाना साहिब में वह स्थान आज भी गुरुद्वारा पट्टी साहब के रूप में प्रसिद्ध है | 

जब पट्टी पर उपदेश लिखने की बात जानी तो पिता कालू मेहता जी ने एक पंडित बृजलाल के पास संस्कृत पढ़ने भेज दिया, वहां पढ़ते पढ़ते जब फुर्सत मिलती तो अन्य बच्चों को सप्तश्लोकी गीता पाठ सुनाते | अब पिताजी को लगा कि कुछ काम धंधे की शिक्षा दिलाई जाए, तो फारसी सीखने को मुल्ला के पास भेजा | कुछ दिन पढ़े फिर एक दिन न पढ़ते देख मुल्ला ने कारण पूछा तो बोले 

ता तू मुला ता तू काजी, जानहिं नाम खुदाई, 

जे बहुतेरा पढिया होवहिं, को रहै न भरियें पाई | 

आप भी अगर खुदा का नाम स्मरण करते हो, तभी काजी या मौलवी कहला सकते हो, क्योंकि चाहे जितना पढ़ा लिखा हो, उसे अंत में जाना ही पड़ता है | 

तो इस तरह छः वर्ष की उम्र से १५ वर्ष की आयु तक श्री नानक देव ने गुरुओं को अपनी आध्यात्मिक प्रतिभा दिखाते हुए, व्यवहारिक शिक्षा पूर्ण की | अब बारी आई कामधंधे की | पिताजी ने पहला काम सोंपा भेंस चराने का | लेकिन ये ध्यान में लगे रहे और भेंस ने जमींदार का खेत चर लिया | उसने राय बुलार से शिकायत की, कि आपके पटवारी के लडके ने मेरी खेती अपनी भेंस को चरवा दी | जब राय ने गुरू जी से पूछा तो उन्होंने कहा, पहले अपना आदमी भेजकर दिखवा तो लें कि खेत वास्तव में भेंस ने चरा भी है या नहीं ? राय बुलार ने अपना आदमी भेजा तो उसने लौटकर बताया कि खेत में तो जरा भी नुक्सान नहीं हुआ है | बेचारा जमींदार हक्का बक्का रह गया | 

दूसरे दिन फिर भेंस चराने गए तो लोगों ने आकर पिताजी को बताया कि आपके सोते हुए बेटे के सरहाने एक सफ़ेद सांप फन फैलाए बैठा है | जब लोग इकट्ठा हुए, तो सर्प गायब हो गया | परेशान मेहता कालू जी ने कहा, बेटा भेंस चराने की जगह तुम तो खेती बाडी ही संभाल लो | तो नानक देव जी ने कहा – 

मनु हाली किरसाणी करनी, सरमु पाणी तनु खेत, 

नामु बीज संतोख सुहागा, रखु गरीबी वेसु | 

भाऊ करम करि जमसी से घर भागठ देखु, 

बाबा मैया साथ न होई, 

इनि माइया जग मोहिया बिरला बूझे कोई | 

मन को हल बनाकर, शरीर के खेत को जपतप का पानी देना, संतोष का बीज डालना, सदा विनम्र रहना | अगर प्रेम की यह खेती लहलहा गई, तो वास्तविक धन दौलत से घर भर जाएगा | माता पिता कोई साथ नहीं देते, यह सांसारिक माया भी जग को केवल मोहित करती है, इस बात को कोई बिरला ही समझ सकता है | 

उनकी बातें सुनकर सीधे सादे कालू जी को लगा कि यह टालमटोल कर खेती नहीं करना चाहते, तो दुकानदारी फिर सौदागिरी, यहाँ तक कि किसी के यहाँ नौकरी करवाने की भी कोशिश की लेकिन असफलता ही हाथ लगी, तो पिताजी इन्हें इनके हाल पर छोड़कर चुपचाप अपने पटवारी के काम में लग गए | लेकिन दो तीन महीने बाद उन्होंने फिर कोशिश की और बीस तीस रुपये देकर लाहौर की तरफ भेजा और कहा कि इन्हें किसी लाभदायक काम में लगाकर, कुछ कमाकर लाना | साथ में भाई बाले को भी समझा कर भेजा | लाहौर के रास्ते में चूहड़काणे गाँव के बाहर जंगल में कुछ साधू भूखे बैठे थे, उन्हें देखकर नानक देव जी ने भाई बाले को भेजकर उन रुपयों से साधुओं के लिए खाना मंगवा दिया और भाई बाले को कहा, इससे अधिक खरा सौदा और कोई हो ही नहीं सकता | उस स्थान पर इस घटना की स्मृति में आज गुरूद्वारा खरा सौदा विद्यमान है | 

तलबंडी पहुंचकर जब भाई बाले ने मेहता जी को सारी बात बताईं, तो वे बहुत गुस्सा हुए | लेकिन जमींदार राये बुलार ने उन्हें कहा कि नानक तो भगवान का नूर हैं, उनसे कुछ कहने की जरूरत नहीं है, अगर कोई नुकसान कर भी दें, तो मुझसे ले लिया करो | विवश होकर कालू मेहता जी ने नानक देव जी को अपनी बेटी नानकी व दामाद जैराम जी के पास सुल्तानपुर भेज दिया, इस आशा में कि वे शायद इन्हें किसी काम धंधे में लगा दें | 

जैरामजी सुल्तानपुर के नबाब दौलत खान के दीवान थे, अतः उन्होंने नानक देव जी को शाही लंगर और फ़ौज को खाने पहनने का सामान देने के काम में लगवा दिया | गुरूजी जब सौदा तौलकर देते तो तेरा के आगे चौदह की गिनती बोलना भूल जाते, बस तेरा तेरा ही बोलते रहते | लोगों के पूछने पर कहा – 

नानक तेरा वाणिया, तू साहिब मैं रासि, 

हे प्रभू यह नानक तो तेरा दास है, जो आपकी तरफ से बनिया नियुक्त हुआ है, सब कुछ तेरा ही है | 

लोगों ने नबाब से गड़बड़ी की शिकायत की, कि नानक सब कुछ लुटाये दे रहे हैं,लेकिन जब जांच हुई तो हिसाब किताब बिलकुल सही निकला | काम धंधे में लगाने के बाद जैराम जी और नानकी जी ने माता पिता की सलाह से सम्बत १५४४ में नानकदेव जी का विवाह श्री मूलचंद्र खत्री की बेटी सुलखनी जी के साथ करा दिया | तेरा तेरा का जाप करते करते नानक देव अपना काम भी करते रहे | तभी एक विचित्र घटना घटी | सुल्तानपुर के पास ही बहने वाली बेई नदी में नानक देव जी प्रतिदिन स्नान करने जाया करते थे | एक दिन इन्होने जो डुबकी लगाई तो बाहर ही नहीं आये | साथ के लोगों ने जाकर जैराम जी को सूचना दी, गोताखोरों से खूब ढूंडवाया गया, पर कुछ पता नहीं चला | सबको लगा कि डूब गए, परिजन रोते कलपते रह गए | लेकिन दो दिन बाद वे घाट पर बैठे मिले | नानक देव जी घाट से घर जाने के स्थान पर दुकान पहुँच गए और वहां सबसे कह दिया, जिसको जो चाहिए ले लो | दूकान लुटाने के बाद वे फकीरी चोगा धारण कर श्मशान में जा बैठे | एक बार फिर शिकायत नबाब के पास पहुंची, फिर जांच हुई, लेकिन पता चला कि उलटे नानक देव जी के ही सात सौ साठ रुपये लेने निकल रहे हैं | नबाब ने काम करते रहने को कहा, तो जबाब दिया, अब हमें कुछ और काम करने का ईश्वरीय आदेश प्राप्त हो चुका है – 

इक ओमकार सतिनाम करता पुरखु निरभऊ निरवैरु, 

अकाल मूरति अजूनी संभ गुरप्रसादि | 

माता पिता सास ससुर बहिन बहिनोई सब रोकते रहे, पर पत्नी बच्चे को छोड़कर नानक देव तो मरदाने मरासी के साथ निकल पड़े लोक कल्याण के दृढ संकल्प के साथ, देशाटन को | इसे पहली उदासी नाम दिया गया | गुरूजी देश के कोने कोने में पहुंचे, लगातार इक्कीस साल पैदल पैदल तिब्बत से लंका तक, नागालेंड से लेकर मिश्र आदि अरब मुल्कों तक, पहाड़ों, दरियाओं, समुद्रों, जंगलों, रेगिस्तानों को लांघते हुए | 

इस यात्रा काल के कुछ प्रसंग उल्लेखनीय हैं | गुरू नानक देव कुछ समय तक गुजरांवाले जिले में एमनाबाद रुके, बहां वे केवल भोजन करने भाई लालो के पास जाते, शेष समय गाँव से आधा मील दूर कंकरों रोडियों पर ही आसन लगाकर नाम सुमिरन करते रहते | यहाँ से ही उनका नाम नानक तपा प्रसिद्ध हुआ | उन्हीं दिनों सैदपुर के पठान राजा के दीवान मलिक भागो ने ब्रह्म भोज के दौरान सबको भोजन पर बुलाया, किन्तु नानक देव नहीं गए | मलिक नाराज होगया | उसने अपना आदमी भेजकर इन्हें बुलवाया और न आने का कारण पूछा | नानक देव जी ने एक हाथ में मलिक भागो के उत्तम हलुआ पूड़ी लिए और दूसरे हाथ में लालो की सूखी बाजरे की रोटी और जोर से मुट्ठी भींची | देखने वाले दर्शक हैरान हो गए, हलुआ पूड़ी में से खून रिसने लगा और सूखी रोटी में से दूध झरता दिखा | गुरूजी ने भागो को उपदेश दिया, देखो तुमने गरीबों को सताकर कमाए धन से स्वादिष्ट भोजन बनवाया, इसलिए उसमें से खून टपक रहा है, जबकि लालो ने मेहनत की कमाई से रोटी बनाई, अतः उससे अमृततुल्य दूध झर रहा है | मालिक भागो को अपनी गलती समझ में आ गई और उसने भविष्य में गरीबों पर दया करने का प्रण लिया | 

स्थान स्थान पर साधू संतो, फकीरों से मिलते नानकदेव जी दिल्ली पहुंचे तो तत्कालीन मुस्लिम बादशाद सिकंदर लोदी ने इन्हें जेल में डलवा दिया | आरोप यही था कि आखिर कोई इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म का प्रचार कैसे कर सकता था | अन्य कैदियों के समान नानकदेव जी को भी जेल में चक्की पीसने को कहा गया | गुरूजी ने मर्दाने से कहा मर्दाने छेड़ो रवाब | मरदाने की रवाब की धुन पर गुरूजी ने एक शांत सा शब्द पढ़ा | कैदी चक्की चलाना भूल गए, जेल के संतरी भी मन्त्र मुग्ध हो गए, जेल का दरोगा भी सब काम छोड़कर इनकी बैरक के सामने आकर खड़ा हो गया | और तो और उधर से गुजरता हुआ सिकंदर लोदी भी इतना प्रभावित हुआ कि उसने तुरंत गुरूजी के सम्मुख आकर अपने गुनाहों की माफी मांगी | गुरूजी ने कहा कि गुनाह तो तभी माफ़ किये जा सकते हैं, जब पश्चाताप सच्चे मन से हो | इन गरीब साधुओं ने क्या अपराध किया है, जो इन्हें पकड़ा हुआ है | सिकंदर ने तुरंत सभी निर्दोषों को छोड़ने का आदेश दे दिया और भविष्य में किसी बेगुनाह को न सताने का प्रण लिया | 

सियालकोट का एक बड़ा अद्भुत प्रसंग है | हमजा गौस नामक एक फकीर ने गाँव बालों को डरा रखा था | एक क्षत्रिय से नाराज होकर वह एक गुफा में बंद होकर बैठ गया था यह कहकर कि चालीस दिन तक न सूरज को देखूँगा और न गुफा से निकलूंगा और उसके बाद इस गाँव को अपने श्राप से नष्ट कर दूंगा | गुरूजी ने उसके शिष्यों को कहा कि आज ही दोपहर फकीर को सूरज भी दिखेगा और वह गुफा से बाहर भी आयेगा | सब गाँव बाले गुफा के बाहर इकट्ठे होकर दम साधे दोपहर होने का इंतज़ार कर रहे थे | जैसे ही सूरज शिखर पर आया, खरबूजे की फांक की तरह पहाडी बीच में से फट गई और सूर्य की किरणे फकीर पर पड़ने लगीं, वह घबरा कर भागा कि पहाडी कहीं उसके ऊपर ही न गिर पड़े | गुरू जी ने उसे प्यार से समझाया कि किसी एक के गुनाह के बदले सारे गाँव के लिए दुर्भाव रखना ठीक नहीं है | पीर ने भूल मान ली और भविष्य में कहर की जगह मेहरबानी का भरोसा दिया | यहाँ भी गुरूद्वारा बैर साहिब के नाम से स्थापित है, जहाँ गुरू नानक देव जी ने पीर हमजा गॉस को सुमार्ग दिखाया था | 

गुरूजी सम्बत १५६५ में अपनी ससुराल के गाँव पंखों के रंधावे पहुंचकर, गाँव के बाहर एक बटवृक्ष के नीचे बैठ गए | जब श्वसुर मूले चौणे को पता चला तो वे गाँव के चौधरी अजिते रंधावे को साथ लेकर मिलने पहुंचे | अजिते की प्रेम पूर्ण विनती सुनकर गुरूजी रावी के बाएं किनारे डेरा डालकर टिक गए | बाद में चौधरी ने बहां कमरे बनवाकर जरूरत का सामान भी रखवा दिया | करोडिया के नाम से मशहूर खत्री दुनो चंद लाहौर बाले ने गुरूजी के लिए एक धर्मशाला तथा जरूरी मकान बनवा दिया और फिर गुरूजी के माता पिता, उनकी पत्नी सुलखनी तथा दोनों साहिबजादे भी बहीं रहने आ गए | गुरूजी ने अपने इस नए स्थान को नाम दिया करतारपुर | 

लगभग दो बरस करतारपुर रहने के बाद गुरू नानक देव का दूसरा देशाटन शुरू हुआ, जिसे दूसरी उदासी कहा गया | अपनी चौथी उदासी में गुरूजी काबा भी पहुंचे | उस समय का एक प्रसंग बड़ा मशहूर है | नीले कपडे पहने हुए, हाथ में आला और बगल में किताब, लोटा और नमाज पढ़ते समय बिछाई जाने वाली दरी भी पास में, इस तरह हाजियों के वेश में वे जब मक्का पहुंचे तब रात हो चुकी थी, अतः सो गए | सुबह जब उस स्थान पर साफ़ सफाई करने सेवादार आया तो बड़ा गुस्सा हुआ, बोला तू कौन काफिर है, जो काबा की ओर अर्थात खुदा के घर की ओर पैर करके सोया हुआ है | धीरज के साथ गुरूजी ने उस व्यक्ति से कहा – भाई थका मांदा पहली बार यहाँ आया हूँ, मुझे पता नहीं है कि खुदा का घर किस तरफ है, इस समय तो थकान की बजह से हिलने की भी हिम्मत नहीं है, दया करके तुम ही मेरे पैर उस दिशा में कर दो, जिधर खुदा का घर न हो | यह बात सुनकर उस शख्स ने बड़े गुस्से और हिकारत के साथ इनका पैर पकड़ कर दूसरी तरफ कर दिये | लेकिन उसने देखा कि काबा तो अभी भी गुरूजी के पैरों की तरफ ही है | उसने बार बार कोशिश की, लेकिन हर बार काबा उसे गुरूजी के पैरों की तरफ ही दिखाई दिया | वह हैरान होकर गुरूजी के पैरों पर गिर पड़ा और माफी माँगने लगा | 

भाई गुरुदास जी ने उनकी मक्का यात्रा का वृतांत इस प्रकार लिखा है – 

बाबा फिरि मक्के गइआ नील बसन धारे बनवारी, 

आसा हथि किताब कछि, कूजा वांग मुसलाधारी | 

बैठा जाई मसीत विचि, जिथै हाजी हजि गुजारी, 

जा बाबा सुता राति नौ, बलि महराबे पाई पसारी | 

जीवनि मारी जति दी फेहडा, सुत्ता कुफर कुफारी, 

लतां बलि खुदाईबे किऊं, करि पईआ होई बजिगारी | 

टंगो पकडि घसीटिया फिरिया, मक्का कला दिखारी, 

होई हैरान करेनि जुहारी, होई हैरान करेनि जुहारी | 

१५७७ में मक्का के बाद गुरूजी मदीना, फिर ईरान, तुर्किस्तान और काबुल भी गए | पेशावर से नौशहरे के बीच गाँव हसन अबदाल के बाहर जब एक पहाडी के पास बैठे | उसी पहाडी पर बली कंधारी नामक एक फ़क़ीर भी रहता था, जिसने तपस्या द्वारा कई सिद्धियाँ पाई हुई थीं | पहाडी की चोटी पर ही पानी का एक चश्मा था, जिससे पानी लेने हेतु गुरूजी ने मरदाने को भेजा | लेकिन बली कंधारी ने पानी नहीं लेने दिया | उलटे बोला – अपने पीर से कहो कि अगर ताकत है तो अपना नया चश्मा निकाल ले | मरदाने ने आकर गुरू जी को बताया, तो गुरूजी ने उनसे एक पत्थर हटाने को कहा | जैसे ही पत्थर हटा, वहां से एक चश्मा फूट पड़ा, पानी की धार बह निकली | इतना ही नहीं तो पहाड़ी के ऊपर वाला चश्मा सूख गया | गुस्से से लाल पीले हुए कंधारी ने पहाडी की एक चट्टान गुरूजी पर धकेल दी | चट्टान पूरे वेग से लुढ़कते हुए नानक देव जी की तरफ आ रही थी, पर वे निर्विकार अपने स्थान पर शांत बैठे थे | जैसे ही चट्टान गुरूजी के नजदीक आई, बैठे बैठे ही अपने हाथ का पंजा फैलाकर उसको ऐसे रोक दिया, मानो वह कोई फूलों की लता हो | कंधारी के होश फाख्ता हो गए, वह समझ गया कि उससे गलती हुई है, नीचे आकर पैरों पर गिरने में ही उसने अपनी भलाई समझी | 

गुरूजी द्वारा हाथ के पंजे से रोका गया वह पत्थर आज भी गुरुद्वारा पंजा साहब में देखा जा सकता है | 

आईये दिल से बोलें – 

जो बोले सो निहाल – सत श्री अकाल

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