गुरू पूर्णिमा - पृष्ठभूमि, प्रासंगिकता और मनाने का सही तरीका !

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गुरुपूर्णिमा हजारों वर्षों से चला आ रहा हमारा पारंपरिक त्योहार है। इसे भगवान वेदव्यास के जन्म दिवस अर्थात आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाय...



गुरुपूर्णिमा हजारों वर्षों से चला आ रहा हमारा पारंपरिक त्योहार है। इसे भगवान वेदव्यास के जन्म दिवस अर्थात आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। वे ऋषि पराशर और मछुआरे की पुत्री सत्यवती के पुत्र थे। उनका जन्म एक द्वीप पर हुआ था और इसीलिए उन्हें द्वैपायन कृष्ण के नाम से भी जाना जाता है। वेद किसी एक द्वारा लिखित पुस्तकें नहीं हैं। तपस्या करने वाले ऋषियों ने अस्तित्व के सत्य को देखा, समझा जाना, और उनके द्वारा मन्त्र रूप में वह शिष्यों को दिया गया । इन मंत्रों को ही "वेद" कहा जाता है।

वेदव्यास ने इन सभी ऋचाओं (मंत्रों) को संहिता के रूप में एकत्रित किया और उन्हें विभिन्न शाखाओं के साथ चार वेदों के रूप में संपादित किया। वेद चार हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद । प्रत्येक वेद को फिर से चार भागों में वर्गीकृत किया गया है - मंत्र या संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद। उन्होंने न केवल वेदों का संपादन किया,अपितु उन्होंने कुछ परिवारों को प्रत्येक शाखा आवंटित करके वेदों की रक्षा करने की व्यवस्था भी की। उन परिवारों पर वेदों की उस शाखा की रक्षा करने की जिम्मेदारी थी। उन्होंने विभिन्न समुदायों से संबंधित परिवारों को ज्ञान की अन्य शाखाओं जैसे सर्जरी, आयुर्वेद, वास्तुकला आदि को भी आवंटित किया। इस प्रकार, प्रत्येक परिवार, समुदाय वेदों सुरक्षा करने वाला संरक्षक बन गया - ज्ञान ने हमारे देश को ज्ञानभूमि बनाया।

इस ज्ञान को पिता द्वारा पुत्र को, गुरु द्वारा शिष्य को प्रदान करने का कार्य इस प्रकार किया गया कि हमारा भारत, इतने आक्रमणों के बावजूद भी हजारों वर्षों तक ज्ञान की भूमि बना रह सका। ज्ञान, आध्यात्मिक विद्या की विशिष्ट शाखा की रक्षा करना और इसे गुरु से सीखकर आने वाली पीढ़ी को इसे देने के लिए प्रतिबद्ध होना प्रत्येक परिवार का पवित्र कर्तव्य बन गया। यह व्यास ही थे जिन्होंने इस संसार में जीवन जीने के लिए आवश्यक ज्ञान की रक्षा के लिए और ईश्वर को साकार करने के लिए इस गुरु परंपरा को प्रारंभ किया। इसलिए उनकी जयंती को गुरुपूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।

यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि हमें उन सभी गुरुओं के प्रति आभारी होना चाहिए, जिन्होंने हमें हमारे जीवन में कुछ सिखाया या जो हमारे लिए महत्वपूर्ण है, हमें उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना चाहिए । यह त्यौहार हमें यह याद दिलाने के लिए है कि हमारे परिवार को भी कम से कम कुछ ज्ञान, परंपरा, विद्या आदि की रक्षा करनी चाहिए। यह त्यौहार दूसरों में अच्छाई, परमात्मा को देखने और उनसे सीखने का भी है।

जीवन में सभी समस्याएँ इसलिए आती हैं क्योंकि हम अपने शरीर-मन परिसर को “मैं’ की भावना तक सीमित कर लेते हैं। वस्तुतः शरीर और मन तो हमारे वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए साधन हैं। यदि हम गुरुस्तोत्र के पहले पाँच श्लोकों को देखते हैं, तो ये बताते हैं कि उस गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने मुझे मेरे होने की वास्तविक स्थिति दिखाई - तत पदम दर्शितम येन तस्मै श्री गुरुवे नमः। मनुष्य मानता है कि वह एक शरीर-मन का परिसर है। लेकिन धीरे-धीरे गुरु उसे एहसास दिलाता है कि वह उस चेतना का विस्तार चक्र है जो इस ब्रह्माण्ड में चराचर - सबमें व्याप्त है। चेतना के ये विस्तार चक्र क्या है ?

चैतन्य - चेतना विभिन्न समष्टि के रूप में व्यक्त होती है। जैसे कि, एक व्यक्ति का विस्तार रूप परिवार है। यह मत समझिये कि परिवार कुछ लोगों का संग्रह है। यह चेतना है, जो परिवार के सदस्यों के रूप में प्रकट हुई है। परिवार का विस्तार रूप समाज है, समाज का विस्तार रूप राष्ट्र है, राष्ट्र का विस्तार रूप संपूर्ण सृष्टि है।

हम सभी परस्पर जुड़े हुए और अन्योन्याश्रित हैं। आत्मन हम सभी के लिए समान है। हम गुरुओं पर आते हैं - कुछ इस तथ्य को इंगित करते हैं, कुछ इसे समझाते हैं, कुछ हमें तदनुसार जीने के लिए प्रेरित करते हैं, कुछ गुरु हमें इसे महसूस करने के लिए मार्गदर्शन करते हैं। जन्म के बाद से हमारे माता-पिता, दादा-दादी, शिक्षक, संत आदि हमारे घरों में या साहित्य के माध्यम से इस भव्य सत्य का संकेत देते रहे हैं। उदाहरण के लिए, माँ बच्चे को, बड़ों, शिक्षकों, गाय, पेड़ आदि को नमस्कार करना सिखाती है, जो कि जीवित प्राणी है। वह बच्चे को किताबों, भोजन, उपकरणों आदि जैसी निर्जीव चीजों को सम्मान देना भी सिखाती है। हमारे घरों में ऐसी कौन सी प्रथाएं हैं जो बच्चे को संकेत देती हैं कि यह चराचर (चेतन और निर्जीव) दिव्य है?

कई बार हम अवसाद, आत्म-हीनता, अज्ञान, स्वार्थ, देहबुद्धि, अहंकार आदि के अंधेरे में फंस जाते हैं। ऐसे समय में जो भी हमारी मदद करता है और हमें इससे बाहर निकलने में मदद करता है और वस्तुतःहमारी आंखें खोलता है, वह गुरु, माता-पिता, दादा-दादी, दोस्त, भाई-बहन, शिक्षक, पड़ोसी आदि कोई भी हो सकते हैं। वे हमारे गुरु हैं। यदि हम अभिमानी हैं तो स्वयं नारायण हमें सिखाने आ जाएँ, तो भी हम नहीं सीख सकते। हमारे जीवन में ऐसे कौन से अवसर हैं जब किसी ने हमें बहुत अच्छी तरह निर्देशित किया और हमारी आँखें खोलीं। आइए हम उन अनुभवों को साझा करें और उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करें ।

श्लोक गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु… का अर्थ दो प्रकार से किया जा सकता है, अर्थात गुरू - ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं। गुरु हमें भगवान का दर्शन कराते हैं, अतः गुरु भगवान हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी किया जा सकता है कि भगवान ही हमारे गुरु हैं। गुरुपूर्णिमा के दिन, हम अपने आप को याद दिलाते हैं कि ईश्वर जो चराचर में व्याप्त है, वह हमें हमारे आसपास के सभी लोगों के माध्यम से सिखाता है। हमने अपने आस-पास के लोगों से क्या सीखा हैं, किससे सीखा है, यह इंसान हो सकता है, यह जानवर, पक्षी, पेड़ और यहां तक कि निर्जीव चीजें भी हो सकती हैं।

दूसरों से सीखने की यह विनम्रता, दूसरों से सीखने की यह तत्परता हर जगह ईश्वर को देखने के लिए हमारे मन को शुद्ध करती है। ईश्वर द्वारा प्रतिपादित यह चराचर हमें कई चीजें सिखा सकता है। आइए हम संकल्प लें कि चराचर से मैं प्रतिदिन कुछ न कुछ सीखूंगा।

हमारे यहाँ पुरातन काल में शिक्षक या गुरू आश्रम बनाकर रहता था तथा निस्वार्थ भाव से समाज के प्रति अपना कर्तव्य मानकर ज्ञान दान करता था ! गुरू का व्यक्तित्व, अनुभव, जानकारी, ज्ञान, चरित्र, स्वभाव हर दृष्टि से इतना श्रेष्ठ होता था कि बड़े से बड़े राजा महाराजा भी उनके सामने नतमस्तक होते थे ! शिक्षा देना केवल पढ़ाना मात्र नहीं था, व्यवहार तथा योग्यतानुसार कौशल की शिक्षा भी इसमें सम्मिलित थी ! और सबसे बड़ी बात यह कि यह कोई व्यापार या व्यवसाय नहीं था, आय का साधन भी नहीं था ! कर्तव्य बुद्धि तथा धर्म भाव से की गई एक प्रकार की तपस्या थी ! इसीलिए भारत में गुरू के प्रति पूज्य भाव था !

लेकिन समय के साथ गुरू परंपरा में क्षरण प्रारंभ हुआ, उसका सबसे पहला उदाहरण महाभारत काल में द्रोणाचार्य का है ! वे अपने एकमात्र पुत्र को दूध के लिए बिलखते हुए नहीं देख पाए और राज्य सत्ता की शरण में गए ! उनके पूर्व तक गुरू राजा की शरण में नहीं, बल्कि राजसत्ता गुरू की शरण में आती थी ! यही कारण रहा कि एकलव्य जैसी विकृति का जन्म हुआ ! उस समय के पूर्व तक छोटे बड़े का भाव या जातिगत दुराव भेदभाव भी नहीं था ! तब से ही भेदभाव रहित शिक्षा व्यवस्था खंडित हुई !

गुरू शिष्य परंपरा में राजा का पुत्र हो या निर्धन का बालक, सभी आश्रम में साथ साथ रहकर अध्ययन करते थे | ज्ञान प्राप्ति उपरांत वे अपने जीवन व समाज की संरचना करते थे | शिष्यों ने मानवीय मूल्यों को कितना धारण किया है, गुरू उसकी परीक्षा लेते थे | गुरू अपने सम्पूर्ण ज्ञान का समर्पण करता था | उसे सर्वोत्तम सुख तब मिलता था, जब उसे लगता था कि उसका शिष्य उससे एक कदम आगे निकल गया | गुरू परशुराम और शिष्य भीष्म जब किसी कारण आमने सामने आये, तब पराजित होने पर भी परशुराम गदगद हो गए | उन्होंने भीष्म को युगों युगों तक अक्षय कीर्ति का आशीर्वाद दिया | यही परम्परा भारतीय सांस्कृतिक चेतना के मूल तत्वों में से एक है |

इस परंपरा में परस्परावलंबन था, सह अस्तित्व था | गुरू शिष्य एक दूसरे के पूरक होते थे | इसका सर्वोत्तम आधुनिक उदाहरण हैं स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद | नरेन से पहली बार मिले तो उन्हें गले लगा लिया | अगली बार मिले तो अपने हाथों से उन्हें प्रसाद का भोजन कराया | उस शिष्य में उन्हें भविष्य दिख रहा था | बाद में विवेकानंद जी ने कहा कि मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मेरी माँ भुवनेश्वरी देवी मुझे भोजन करा रही हों | विवेकानंद जब मूर्तिपूजा विरोधी ब्रह्म समाज के संपर्क में आ गए तो उन्हें वहां से बापस लाने के लिए स्वामी रामकृष्ण कार्यक्रम स्थल पहुँच गए | वहां उन्हें अपमानित होना पड़ा किन्तु वे लगातार नरेंद्र से आग्रह करते रहे | नरेंद्र को उनका अपमान सहन नहीं हुआ और उनका ब्रह्म समाज से सम्बन्ध सदैव के लिए समाप्त हो गया |

गुरू को शिष्यों द्वारा दी गई दक्षिणा को समर्पण कहना अधिक उपयुक्त होगा ! शिष्य गुरू के लिए सर्वस्व समर्पित करता था | जैसे कि क्षत्रपति शिवाजी ने अपने गुरू समर्थ स्वामी रामदास को किया ! अपना सम्पूर्ण राज्य उन्हें अर्पित करने के बाद समर्थ का आदेश स्वीकार कर उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया !

द्रोण और एकलव्य प्रसंग में एकलव्य के समर्पण की तो प्रशंसा होती है, किन्तु द्रोण की आलोचना की जाती है | विचार करें तो उस घटना का एक सकारात्मक पहलू भी है | जिस प्रकार ईश्वर परीक्षा लेता है, उसी प्रकार गुरू भी शिष्य की परीक्षा लेते थे | आज भी एकलव्य को दानवीर के रूप में सब स्मरण करते हैं, यदि उक्त प्रसंग घटित नहीं हुआ होता तो एकलव्य की कीर्ति होती क्या ?

आगे चलकर तो वह शिशुपाल की सेना में भरती हुआ, जो जरासंध का दामाद और कंस का मित्र था | अतः कहा जा सकता है कि द्रोणाचार्य ने पूर्व अनुमान कर लिया था कि एकलव्य आगे चलकर दुष्ट प्रवृत्तियों का सहयोगी हो सकता है, अतः उन्होंने उसे दुर्बल करने का प्रयत्न किया !

समर्पण का अर्थ है, सम्यक अर्पण, बिना अहंकार और अपेक्षा के उत्कृष्ट मनोभाव से समर्पित होना | यद्यपि गुरू कुछ मांगता नहीं था, किन्तु उनकी इच्छा का अनुमान कर अधिकतम देने की इच्छा रहती थी शिष्य की ! चूंकि यह भुगतान नहीं समर्पण था, अतः लोंग इलायची या स्वर्ण भण्डार में कोई अंतर नहीं था ! ऐसी अनोखी थी यह परंपरा, जिसमें भाव मुख्य था, बस्तु गौण !

व्यक्ति में क्षरण हो सकता है, किन्तु विचार में तत्व में नहीं! शायद यही कारण रहा कि गुरू गोबिंद सिंह जी को कहना पड़ा कि मेरे बाद किसी को गुरू नहीं मानना ! इसलिए पूर्व के गुरुओं ने जो उपदेश दिए, उनका संकलन कर गुरू ग्रन्थ साहब को गुरू मानने का उन्होंने निर्देश दिया ! अनुयाइयों के इसका कडाई से पालन भी किया ! आज इसके परिणाम स्वरुप सारे गुरुद्वारे समाजसेवा के केंद्र के रूप में विकसित हो गए हैं !

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी ने जब गुरूपूर्णिमा उत्सव मनाना तय किया, तो अधिकाँश लोगों का भाव गुरू के रूप में उनके प्रति ही था ! किन्तु डॉ. साहब ने चिरंतन त्याग तपस्या व बलिदान के प्रतीक भगवा ध्वज को गुरू के रूप में सम्मुख रखा ! उसके पीछे भी यही भाव था कि व्यक्ति में क्षरण संभव है, किन्तु तत्व में नहीं !

इस समर्पण पर्व की महिमा अगर कुछ लोग भी अंगीकार कर पायें, हृदयंगम कर पायें तो त्यौहार सार्थक ! समर्पण धन का ही नहीं, समय का भी, और जीवन का भी ! संघ में तत्व के लिए, विचार के लिए, देश और समाज के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन खपाने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं, यह समर्पण की पराकाष्ठा है ! भावना की ही तो बात है !

समर्पण का मूर्तिमंत उदाहरण हैं राधा ! द्वारका में कृष्ण की कई रानियाँ थीं, किन्तु वे सदा गोकुल की राधा का स्मरण करते थे, इससे रानियों के मन में द्वेष था ! कृष्ण ने रानियों को शिक्षा देने के उद्देश्य से एक नाटक रचा ! वे सुबह उठे नहीं और कारण पूछने पर पेट में दर्द की शिकायत की ! वैद्य बुलाये गए, औषधि दी गई, पर दर्द होता तो ठीक होता ना ? कृष्ण का दर्द का नाटक चालू रहा ! तभी देवर्षि नारद वहां आये और भगवान की लीला का अनुमान कर रानियीं के सामने ही प्रश्न किया, भगवन आप तो सर्वज्ञ हो, आप ही बताओ कि आपका दर्द कैसे ठीक होगा ?

भगवान ने कहा कि कोई भक्त अगर अपने पाँव धोकर मुझे पिलाएगा तो ही यह दर्द ठीक होगा ! किन्तु कोई भी रानी इसके लिए तैयार नहीं हुई ! भला कौन नारी यह पाप कर नरक का भागी बनेगी ? भगवान की इच्छा जानकर नारद गोकुल गए तथा राधा जी को भगवान के कष्ट व उपचार की जानकारी दी ! राधा ने तुरंत अपने पैर धोकर उन्हें दे दिए और आग्रह किया कि जाकर जल्द कृष्ण को पिला दें ! उन्हें अपने नरकगामी होने की चिंता नहीं, अपने प्रियतम के कष्ट का ही ध्यान रहा ! यही है समर्पण !

चित्तोड़ में भामाशाह का मंदिर है | निजी जीवन में वे अतिशय कंजूस थे | बेटे अगर कुछ माँगते तो दस बार पूछते | किन्तु जब राष्ट्र को आवश्यकता हुई तो जीवन भर का संचित धन २५ हजार स्वर्ण मुद्राएँ और २५ लाख रुपये महाराणा प्रताप को सैन्य बल पुनर्गठन हेतु समर्पित कर दिए | राणा प्रताप ने कहा मैं राजा हूँ किसी से दान नहीं ले सकता | तो तर्क किया, यह दान नहीं समर्पण है | दान देने वाले का हाथ ऊंचा और लेने वाले का नीचे रहता है | जबकि समर्पण विनम्रता से चरणों में होता है |

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