एकलिंग के दीवान – बप्पा रावल

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सीमा से बाहर जाकर भी केसरिया फहराया,  भरत भूमि की पावन रज का जिसने मान बढ़ाया,  ईरान और अफगान सभी को जाकर जिसने जीता ।  टूट...



सीमा से बाहर जाकर भी केसरिया फहराया, 

भरत भूमि की पावन रज का जिसने मान बढ़ाया, 

ईरान और अफगान सभी को जाकर जिसने जीता । 

टूट पड़ा था यवनों पर वो बप्पा रावल चीता । 

इस्लाम की स्थापना के बाद अरबी मुस्लिमों ने तत्कालीन फारस अर्थात आज के ईरान को जीतने के बाद से ही भारत पर आक्रमण करने प्रारम्भ कर दिए थे। बहुत वर्षों तक तो वे पराजित होते रहे, लेकिन अन्ततः राजा दाहिर के काल में सिंध को जीतने में सफल हो गए। उनकी आंधी सिंध से आगे भी भारत को निगलना चाहती थी, किन्तु बप्पा रावल एक सुद्रढ़ दीवार की तरह उनके रास्ते में खड़े हो गए जिन्होंने पराजित राज्यों को एकजुट कर एक अजेय शक्ति खड़ी की। उन्होंने अरबों को कई बार हराया और उनको सिंध के पश्चिमी तट तक सीमित रहने के लिए बाध्य कर दिया, जिसे आजकल बलूचिस्तान के नाम से जाना जाता है। 

इतना ही नहीं उन्होंने आगे बढ़कर गजनी पर भी आक्रमण किया और वहां के शासक सलीम को बुरी तरह हराया। उन्होंने गजनी में अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया और तब चित्तौड़ लौटे। आइये गांधार, खुरासान, तूरान और ईरान तक अपनी विजय दुंदभी बजाने वाले बप्पा रावल के जीवन पर एक नजर डालें - 

बात सन 716 की है | मेवाड़ के दक्षिण में स्थित ईडर नामक एक राज्य पर शासन करने वाले राजा नागादित्य के दुराचरण से नाराज होकर भीलों ने उसकी हत्या कर दी। रानी जो चित्तोड़ के मौर्य शासक मानमोरी की बहिन थी, वह तो अपने पति के साथ सती हो गई, किन्तु अपने तीन वर्षीय पुत्र कालभोज की रक्षा करने और पालने पोसने की जिम्मेदारी एक विधवा ब्राह्मणी तारा को सोंप गई । क्रुद्ध भीलों से इस शिशु की प्राण रक्षा करने के लिए तारा उसे लेकर भांडेर नामक किले पर पहुंची, जहाँ रहने वाले भील बच्चों के साथ खेलते – रहते - अतिशय सामान्य स्थिति में काल भोज का पालन पोषण हुआ । कुछ वर्षों बाद तारा को लगा कि श्यामवर्णी भीलों के बीच गौरांग तरुण भोज को लोग संदेह की नजर से देखने लगे हैं, तब वह उसे लेकर नागदा पहुँच गई, जहाँ भोज को एक ब्राह्मण परिवार में शरण मिली | 

अन्य बच्चों के साथ वह गाय चराने जाया करता था | लेकिन तभी एक चमत्कारिक घटना घटी | जिन गायों को वह चराता था, उनमें से श्यामा नामक एक गाय ने अकस्मात दूध देना बंद कर दिया | गाय के मालिक को लगा कि कहीं यह बालक तो उसका दूध नहीं पी जाता चराते समय | स्वाभाविक ही इस शंका की जानकारी मिलने पर भोज को बहुत दुःख हुआ और उसने गाय पर नजर रखनी शुरू की | उसने देखा कि चरते चरते वह गाय अकस्मात जंगल में कहीं जा रही है | भोज ने गाय का पीछा किया और देखा कि वह गाय भीषण बियाबान जंगल में बनी एक गुफा में जा रही है | जैसे ही भोज उस गुफा में प्रविष्ट हुआ, एक दिव्य सन्यासी ने मुस्कुराकर उसका स्वागत कुछ इन शब्दों में किया – आगए एकलिंग के दीवान, मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था | 

इन सन्यासी का नाम था हरित सन्यासी | गाय गुफा में पहुंचकर शिवलिंग का दुग्धाभिषेक करती थी अर्थात शिवलिंग पर उसके थनों से दूध अपने आप प्रवाहित होने लगता था | शीघ्र ही इस घटना की जानकारी अन्य लोगों को भी हो गई तथा भोज पर हरित सन्यासी की कृपा है, यह जानकर उसके प्रति आत्मीयता और सम्मान भी बढ़ गया | अब उसे गाय चराने के स्थान पर शिक्षा दी जाने लगी | समय गुजरता गया | वह तरुणावस्था से युवावस्था में प्रवेश ही कर रहा था, तभी तारा को एक सर्प ने काट लिया | अब तक भोज तारा को ही अपनी मां ही समझता था, किन्तु मरणासन्न तारा ने उसे उसकी वास्तविकता बताई तथा कहा कि वह अपने मामा के पास चित्तोड़ चला जाए | 

ये वो समय था जब हिंदुस्तान पर अरब लुटेरों के हमले का डर बना हुआ था. अरब के लुटेरे शासकों ने मिस्र, स्पेन और ईरान को भी जीत लिया था. अब ईराक का शासक अल हज्जाज अकूट संपदा से भरे पड़े हिंदुस्तान पर अपनी निगाह टेढ़ी किए हुए था. उसने सिंध पर छोटे-मोटे हमले करने शुरू कर दिए, लेकिन पराजित होता रहा | बाद में अल हज्जाज के भतीजे और दामाद मुहम्मद बिन कासिम ने भी कई बार हमले किये, लेकिन दाहरसेन की सेना से उसे भी हार ही मिली. तब कासिम ने षडयंत्र रचा और दाहरसेन की सेना में अपने सिपाहियों को महिलाओं के वस्त्र पहनाकर भेज दिया. धोखे और फरेब की यह चाल सफल रही और वीरता पूर्वक लड़ते हुए दाहरसेन ने अपने प्राणों की आहूति दे दी. 

इसके बाद तो अरबों के आक्रमण बिन कासिम के बाद भी होते रहे | राजस्थान के अधिकांश राज्यों को पराजय का सामना करना पड़ा | उस समय चित्तौड़ पर मौर्यवंश के मानमोरी शासन करते थे, जो अरब आक्रमणकारियों के सामने एकदम कमजोर सिद्ध हो रहे थे | उसी दौर में कालभोज ने चित्तोड़ में प्रवेश किया और राजा से मिलकर अपना परिचय दिया | उनका भानजा जीवित है, यह जानकर मामा और मामी स्वाभाविक रूप से अत्यंत प्रसन्न हुए और भोज को अपने सेना में महत्वपूर्ण स्थान दिया | 

अंग्रेज इतिहासकार कर्नल टाड ने इसके आगे का प्रसंग कुछ इस प्रकार वर्णित किया है – 

जब मुस्लिम आक्रान्ताओं ने मेवाड़ पर हमला किया तो कालभोज अपनी सेना के साथ विदेशी आक्रांता से भूखे शेर की भांति जा भिड़ा। उसकी वीरता को देखकर मौर्य राजा मानसिंह और उसके सभी सामंत भौंचक्के रह गये। जीतने के बाद भी वह रूका नही और जैसलमेर, जोधपुर व सौराष्ट्र के राजाओं को एकजुट कर वह सीधे गजनी की ओर बढ़ गया । ये सभी राजवंश मुहम्मद बिन कासिम से पराजित हो चुके थे | इस संयुक्त अभियान में भोज ने गजनी के तत्कालीन शासक सलीम को न केवल परास्त किया, बल्कि उसकी लड़की से विवाह कर वापस लौटे । 

जब भोज वापस चित्तौड़ लौटे तो उन्होंने इस दौरान प्राप्त अपार सम्पदा मुक्त हस्त से आमजन में लुटा दी | जनता के लिए यह एक नया अनुभव था, तब तक किसी राजा ने ऐसी दरियादिली नहीं दिखाई थी | आमजन ने प्यार से उसे अपने पालनहार पिता को दिया जाने वाला संबोधन दिया – बप्पा | उस दिन से आज तक सब उन्हें बप्पा रावल के नाम से ही जानते हैं, उनका असली नाम भोज तो मानो कहीं गुम ही हो गया | उनकी लोकप्रियता देखकर व अपनी कमजोरी से शर्मिंदा राजा मानमोरी एक रात को महल छोड़कर संभवतः सन्यासी हो गए और दूसरे दिन महारानी ने दरबार में उनकी अंतिम इच्छा सभी सामंतो और सरदारों को बताई कि वह राजकाज की जिम्मेदारी बप्पा रावल को दे गए हैं | 

राज्यारोहण किसी कुंवारे व्यक्ति का नहीं होता, अतः जिस नागदा में कालभोज रहे थे, वहां के राजा ने अत्यंत प्रसन्नता पूर्वक अपनी पुत्री का विवाह उनके साथ कर दिया | राज्याभिषेक के समय उनका राजतिलक किसी पुरोहित ने नहीं, बल्कि उनके एक बाल्यकाल के साथी भील नवयुवक ने अपना अंगूठा चीरकर किया | उसके बाद तो यह प्रथा ही हो गई | चित्तौड़ के हर नरेश का राजतिलक इसी प्रकार होता रहा | महाराज बप्पा रावल के विजय अभियान उसके बाद भी जारी रहे | उन्होंने कंधार काश्मीर, ईराक, ईरान, तूरान और अफगानिस्तान आदि को जीतकर उन पर शासन किया और वहां के शासकों की कन्याओं से विवाह किये। भविष्य के आक्रमणों की सुरक्षा हेतु उन्होंने सीमा पर सैनिक छावनी भी स्थापित की, जिसे रावल पिंडी नाम दिया गया | पाकिस्तान के इस शहर को तो हम सब जानते ही हैं | 

जिस हरित ऋषि ने सबसे पहले उन्हें एकलिंग का दीवान संबोधन दिया था, उनके आश्रम के पास ही आज भगवान एकलिंग जी का भव्य मंदिर विराजमान है | उदयपुर के उत्तर में कैलाशपुरी स्थित इस मन्दिर का निर्माण 734 ई. में बप्पा रावल ने करवाया | बप्पा रावल का देहान्त कहाँ हुआ, यह विवाद का विषय है, क्योंकि उनकी समाधि नागदा तथा कश्मीर दोनों जगह बताई जाती है । 

अब आप बताईये कि क्या बप्पा का पराक्रम मोहम्मद बिन कासिम से कहीं कम है ? फिर क्या कारण है कि भारत में बिन कासिम द्वारा सिंध के राजा दाहिर को हराने का प्रसंग तो पढ़ाया जाता है, किन्तु बप्पा रावल के विजय अभियानों की चर्चा ही नहीं होती | 

प्रजा बत्सल देश रक्षक बप्पा रावल की यह गाथा अब सोशल मीडिया की जन पत्रकारिता के युग में जन जन तक पहुंचे, इस आशा और विश्वास के साथ सभी बंधुओं का सादर अभिवादन | नमस्कार |

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